स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त करें ---
.यह बात मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव से लिख रहा हूँ कि इस समय परमात्मा की एक विशेष कृपा हम सभी मनुष्यों पर है। हमारा लोभ और अहंकार हमें इसकी अनुभूति नहीं होने देता। जब तक हम स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त नहीं करते, तब तक उनकी कृपा की अनुभूति हमें नहीं हो सकती।
.
हम भगवान से अपने लोभ और अहंकार की पूर्ति के लिए ही ही प्रार्थना करते हैं। ऐसी प्रार्थना हमें और भी अधिक बंधनों में बांधती है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें अपनी चेतना में वीतराग होना पड़ेगा। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति को वीतरागता कहते हैं। परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए हमें स्थितप्रज्ञ होना होगा। हमारी प्रज्ञा परमात्मा में निरंतर स्थित हो, इसे स्थितप्रज्ञता कहते हैं।
.
परमात्मा की गहन और दीर्घ ध्यान-साधना --- सूक्ष्म जगत में प्रवेश का पासपोर्ट है। यह भौतिक जगत तो बहुत छोटा है। सूक्ष्म जगत बहुत अधिक विराट है। हमारी सर्वप्रथम आवश्यकता परमात्मा के प्रति एक अहैतुकी परमप्रेम (भक्ति) की जागृति है, फिर आगे के द्वार खुलते हैं। हम रुपया-पैसा और भोग-विलास की सामग्री प्राप्त करने की ही प्रार्थना भगवान से करते हैं, और दूसरों को ठगते हैं, --- यह हमारा लोभ है जो नर्क का मुख्य द्वार है। दूसरों को ठगने के लिए हम भगवान को अपना सहभागी (Partner) बनाने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं, लेकिन हमें यह पता नहीं होता कि हम उनसे स्वयं को नर्क में डालने की ही प्रार्थना कर रहे हैं।
.
नित्य सायं और प्रातः, यदि हो सके तो हर समय प्रेमपूर्वक भगवान का स्मरण करें, उन्हें अपनी चेतना में निरंतर रखें, और उन्हें अपने जीवन की हरेक क्रिया का कर्ता बनायें। उनकी कृपा निश्चित रूप से होगी। आप सब जन्मजात महान आत्माओं को नमन !!
.
ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२४
No comments:
Post a Comment