Monday, 27 July 2026

कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---

 कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---

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सभी पर परमात्मा की यह परम कृपा और आशीर्वाद हो। प्रातःकाल उठते ही सभी प्राणी निज चेतना को परमात्मा में स्वतः ही लीन पायें। परमात्मा ही हमारा स्वभाव बन जाये। लघुशंकादि से निवृत्त होकर तुरंत परमात्मा के ध्यान में बैठ जायें --- कमर सीधी, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में, और चेतना कूटस्थ में। जीवन में हर चीज प्रतीक्षा कर सकती है, लेकिन परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती।
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हमारे नेत्र शिवनेत्र हों, हमारी देह शिवदेह हो, हमारे भाव शिवभाव हों, हमारी चेतना शिवचेतना हो। हम स्वयं परमशिव हो जायें। मेरी कूटस्थ चेतना अब इस शरीर में न होकर सर्वव्यापी है। सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारा विश्व ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप में मेरा शरीर है। मैं यह नश्वर देह नहीं, परमशिव हूँ। मैं साँस ले रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस ले रही है; मैं साँस छोड़ रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस छोड़ रही है। सृष्टि का हर प्राणी मेरे इस विराट स्वरूप का भाग है। सारी सृष्टि मेरे माध्यम से परमात्मा की उपासना कर रही है।
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कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर सभी चक्रों को भेदती हुई परमशिव में विलीन हो गई है। परमात्मा स्वयं अपने नाद का श्रवण कर रहे हैं। सारा अस्तित्व परमशिव है। परमशिव से अतिरिक्त कुछ भी अन्य नहीं है। सभी जीवों का कल्याण हो रहा है, सभी को आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। इस परमशिवभाव में मैं निरंतर हर समय स्थित रहूँ। परमात्मा से पृथक मेरा कोई अस्तित्व न हो।
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२३

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