श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं ---
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श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं। जिनमें सतोगुण प्रधान है, उन्हें ही भक्तियोग और ज्ञानयोग की बातें समझ में आयेंगी। जिन में रजोगुण प्रधान है, वे सिर्फ कर्मयोग को ही समझ पायेंगे। जिन में तमोगुण प्रधान है, वे कभी भी किसी भी परिस्थिति में गीता को नहीं समझ पायेंगे। उनके लिए यह "जैसे को तैसा" करने से अधिक कुछ भी नहीं है।
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ऐसे ही आध्यात्म में प्रवेश सिर्फ उन्हीं का हो सकता है जिनमें सतोगुण प्रधान है। जिनमें रजोगुण प्रधान है वे जप-तप तो कर सकते हैं, लेकिन ध्यान-साधना उन्हें सिद्ध नहीं होगी। जिनमें तमोगुण प्रधान है वे बाहरी पूजा-पाठ ही कर सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।
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ब्रह्मज्ञान/ वेदान्त का विषय तो सिर्फ अति उच्च स्तर के विरक्त संत-महात्माओं और साधकों के लिए ही है, सामान्य व्यक्ति के लिए नहीं। कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं।
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ऐसे ही भक्ति (भगवान से परमप्रेम) की बातें तो सभी करते हैं, लेकिन दो लाख में से कोई एक व्यक्ति ही भक्त होता है। भक्ति के नाम पर जो कुछ भी होता है, वह भगवान की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि उनके माध्यम से उनके ऐश्वर्य (सामान) की प्राप्ति के लिए होता है। भगवान तो एक साधन हैं जिनके माध्यम से सांसारिक उपलब्धियाँ/वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं। उसी को लोग भक्ति बोलते हैं। भक्त की पात्रता क्या होती हैं, इसे हमारे धर्मग्रन्थों में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है, लेकिन कोई समझना नहीं चाहता। याचक (भिखारी) बनना कोई भक्ति नहीं है। गीता में इसे व्यभिचार बताकर, अव्यभिचारिणी अनन्य भक्ति की बात कही गई है।
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सभी भगवान के भक्त बनें, सभी में उसकी पात्रता हो, इसी मंगल कामना के साथ भगवान श्रीहरिः को नमन॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२२
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