विराट पुरुष का ध्यान : -- समस्त सृष्टि की, और उस से भी परे की, यह विराट अनंतता -- हमारा शरीर है। ये सारी आकाश-गंगाएँ, अपने ग्रहों-उपग्रहों सहित सारे नक्षत्र, हमारी ही विराट देह के भाग हैं। हम यह विराट-पुरुष हैं, कोई भौतिक देह नहीं। उसी विराट-पुरुष का सदा गुरु प्रदत्त विधि से ध्यान करो, उसी की उपासना करो, और उसी में स्थित रहो।
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हंसः योग (अजपा-जप) करते रहो। कुंभक की अवधि में विराट-पुरुष का और भी गहरा ध्यान करो। फिर अनाहत नाद के रूप में प्रणव की ध्वनि के साथ निदिध्यासन करते रहो। अपनी चेतना को भौतिक देह से जितने अधिक समय तक हो सके बाहर ही रखो। बीच बीच में अपने भौतिक शरीर को भी देख लो और यह भाव करो की में यह भौतिक शरीर नहीं, विराट पुरुष हूँ।
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घनीभूत प्राण-ऊर्जा (कुंडलिनी) जागृत हो जाये तो उसे बार-बार परमशिव को अर्पित करते रहो। इस विराटता से परे का अस्तित्व "परमशिव" है। पूर्ण रूपेण परमशिव को समर्पित होकर उनसे एकाकार होना ही हमारी उपासना का लक्ष्य है। साधनाकाल में ब्रह्मचर्य (ब्रह्म जैसे आचार-विचार) अपेक्षित हैं।
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"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ नमः शिवाय !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
३० जुलाई २०२२
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