जब तक मैं इस देह की चेतना में हूँ, तब तक एक विदेशी भूमि में अजनबी हूँ। मेरा वास्तविक निवास परमात्मा की सर्वव्यापकता है। मैं यह शरीर नहीं, शाश्वत आत्मा हूँ, जिसने अपने कर्मफलों को भोगने के लिए यह जन्म लिया है। जिस दिन ये प्रारब्ध कर्म कट जाएँगे, उस दिन यह शरीर भी अपने आप ही छूट जाएगा। इस भव-सागर में अमृत और विष दोनों साथ-साथ हैं। मंथन का अधिकार प्रभु ने हम को ही दिया है। हम विषपान करें या अमृतपान -- यह हमारी ही स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर है। प्रकृति हमें उसी के अनुसार फल देती है। प्रभु ने हमें विवेक दिया है, ताकि हम उचित निर्णय ले सकें।
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मेरे जीवन का लक्ष्य परमशिव (ब्रह्म) को व्यक्त करना है। यही मेरा स्वधर्म है। हर कार्य के कर्ता और भोक्ता -- भगवान स्वयं हैं। मैं तो एक निमित्त-मात्र, उनकी पूर्णता, परमप्रेम, व आनंद हूँ। मेरे आदर्श भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण हैं। वेदवाक्य ही मेरे लिए अंतिम प्रमाण हैं। लौकिक रूप से मैं सनातनी हिन्दू ब्राह्मण हूँ। विधिवत रूप से मेरा शास्त्रों का कोई अध्ययन नहीं है, लेकिन जितना आवश्यक है, उतने का ज्ञान भगवान की कृपा से है।
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प्रातःकाल मैं जब उठता हूँ, तब भगवान श्रीकृष्ण की चेतना में ही उठता हूँ। उठते ही उनका ध्यान करना पड़ता है। पूरे दिन उनकी स्मृति बनी रहती है। ऐसा लगता है कि वे निरंतर मेरे साथ हैं। एक क्षण के लिए भी वे दूर नहीं होते। हृदय प्रेम से भरा रहता है। रात्री को भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किये बिना नींद नहीं आती। उनका ध्यान करना ही पड़ता है। भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं, मैं नहीं। जब भगवान स्वयं ही यह जीवन हैं, तब किसी से कुछ भी अपेक्षा नहीं है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जुलाई २०२३
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