प्रश्न : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?
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उत्तर : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं, वह है -- भगवान का ध्यान, ------ क्योंकि इस से हमारे माध्यम से भगवान के प्रकाश यानि सतोगुण की वृद्धि होती है, और तमोगुण का ह्रास होता है।
हमारा उद्गम भगवान से हुआ है, और हमारा लक्ष्य भी भगवान की प्राप्ति है। यह सृष्टि का चक्र है। समाज की सब बुराइयों का कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता है। भगवान का नित्य नियमित ध्यान ही हमारे जीवन में तमोगुण का ह्रास कर सकता है, सतोगुण में वृद्धि करता है, और अंततः हमें त्रिगुणातीत बनाकर भगवान की प्राप्ति कराता है, जिसे हम आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) कहते हैं।
इस विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता में बहुत स्पष्ट और सरल मार्गदर्शन है। सारे निगमागम ग्रंथ भी यही कहते हैं।
इसमें आवश्यकता है भगवान के प्रति परमप्रेम (भक्ति) जागृत करने की, जिसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। जब परमप्रेम जागृत हो जाये, तब भगवान का निरंतर स्मरण, नामजप और निदिध्यासन करें। उसके पश्चात ध्यान अपने आप ही होने लगता है। भगवान निश्चित रूप से सब भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं, कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। भटकाव तभी आता है जब हमारे मन में छल-कपट होता है। भगवान कहते हैं --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
और --
"सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥"
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भगवान ने हम सब को विवेक दिया है, उस विवेक से हम इतना सब तो समझ ही सकते हैं। मैं अपनी बात के समर्थन में उपनिषदों, गीता, व अन्य ग्रन्थों से चाहे जितने संदर्भ दे सकता हूँ, लेकिन उनकी आवश्यकता नहीं है।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ अगस्त २०२२
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