लोकेषणा (संसार में यश, प्रसिद्धि और दूसरों से प्रशंसा की चाह) -- एक मरीचिका और भटकाव ही है। इससे अहंकार ही पुष्ट होता है, कोई तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति - सिर्फ भगवान की उपासना में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सभी विषयों में अनासक्त व्यक्ति ही परम सिद्ध हो सकता है।
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कूटस्थ में भगवान इसी क्षण यहीं हैं, और नित्य हैं। उनके प्रति श्रद्धा, विश्वास, परमप्रेम और अभीप्सा हो तो आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं, कहीं अन्धकार नहीं रहता। सर्वप्रथम हम भगवान को उपलब्ध हों। कूटस्थ में भगवान की उपस्थिति गहनतम प्रेम के साथ हो। अन्य कोई भी आसक्ति व स्पृहा न रहे। भगवान के अतिरिक्त संसार में अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है। भगवान मिल गए तो सब कुछ मिल गया।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जून २०२३
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