Tuesday, 7 July 2026

यह सारी सृष्टि, सारा विश्व -- भगवान विष्णु है। वे स्वयं ही यह संसार बन गए हैं ---

 यह सारी सृष्टि, सारा विश्व -- भगवान विष्णु है। वे स्वयं ही यह संसार बन गए हैं ---

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पूर्णतः खुली आँखों से दशों दिशाओं में घूर-घूर कर जितनी भी दूर तक हो सके, उतनी दूर तक, और उससे भी परे, जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, उसे बहुत अच्छी तरह से देखें। वह सब भगवान विष्णु है। भगवान विष्णु ही यह विश्व बन गए हैं। हम उनके साथ एक हैं। हमारा निवास भगवान विष्णु के हृदय में है। उन्हें और स्वयं को नमन करें।
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पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के, कमर सीधी रखते हुए एक ऊनी आसन पर बैठ जाएँ। अपने नेत्रों को बिना किसी तनाव के भ्रूमध्य की ओर देखते हुए स्थिर कर लें। अब बहुत ध्यान से देखिये कि बंद आँखों के अंधकार के पीछे क्या है। उस अंधकार के पीछे भगवान विष्णु ही छिपे हुए हैं। उन्हें देखते रहें। कई दिनों के अभ्यास के उपरांत, यदि आपके हृदय में भक्ति है तो, आप पर गुरु-कृपा अवश्य फलीभूत होगी। गुरु-कृपा के फलीभूत होते ही उन बंद आँखों के अंधकार के पीछे एक ब्रह्म-ज्योति का प्राकट्य होगा। उस ब्रह्म ज्योति को ही हर समय देखते रहें। वह ब्रह्म-ज्योति बहुत स्पष्ट रूप से स्वयं भगवान विष्णु है। उस ब्रह्म-ज्योति का दर्शन हो जाये तो वह कभी भी नहीं छूटती। उसको छोडने का प्रयास करने पर यह शरीर ही नष्ट हो सकता है, लेकिन वह ज्योति कभी नष्ट नहीं हो सकती। वह ब्रह्म-ज्योति ही "कूटस्थ" है, जिसका उल्लेख गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कई बार किया है। वह सर्वत्र है लेकिन कहीं भी नहीं है, इसीलिए वह कूटस्थ है।
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गुरु-कृपा और भी प्रखर होने पर उस ज्योति से निःसृत होती हुई एक मंत्रमय ध्वनि सुनाई देगी, जिसे हर समय सुनते रहें। वह ध्वनि ही शब्द यानि अक्षर-ब्रह्म है। कूटस्थ ब्रह्म में स्वयं को समर्पित कर दें। दिन भर उनका स्मरण रखें। वे ही हमारे पैरों से चल रहे हैं, इन हाथों से काम कर रहे हैं, इन नेत्रों से वे ही देख रहे हैं, और वे ही हर रूप में हमें मिल रहे हैं। हमारा एकमात्र व्यवहार उन्हीं से है। वे ही सर्वस्व हैं, और एकमात्र अस्तित्व भी उन्हीं का है।
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प्रातः काल उठते ही कूटस्थ सूर्यमण्डल में भगवान पुरुषोत्तम (भगवान विष्णु को ही पुरुषोत्तम कहा गया है) का ध्यान करें। वहाँ सुनाई दे रहे कूटस्थ शब्द-ब्रह्म का श्रवण करें। फिर खूब देर तक द्वादशाक्षरी भागवत मंत्र का मानसिक रूप से कूटस्थ में जप करें। दिन भर चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय भगवान की चेतना में रहें। अपनी अनंत चेतना में उनके साथ एक होकर भगवान के विराट रूप का ध्यान करें। उनकी विराट अनंतता हम स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं। एक दिन हम पायेंगे की भगवान हम से पृथक नहीं, हमारे साथ एक हैं। आगे का मार्गदर्शन वे स्वयं करेंगे, लेकिन अन्य कोई आकांक्षा नहीं होनी चाहिए।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६:३०॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
"अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१८:५३॥"
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
७ जुलाई २०२३

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