ध्यान गुरु-तत्व का ही करना चाहिए| गुरु-तत्व का बोध भी एक दिव्य अनुभूति है जो गुरुकृपा से ही होती है| हमारी चेतना कहाँ पर है उसी के अनुसार हमारे विचार निर्मित होते हैं| गुरु महाराज का आदेश था कि चेतना को कभी आज्ञाचक्र से नीचे मत आने दो| उनके आदेश का तो पूरी तरह पालन नहीं कर पाये पर उन्होने कृपा कर के पदोन्नति कर दी| आज्ञाचक्र से वे ध्यान का केंद्रबिन्दु सहस्त्रार में, और सहस्त्रार से ब्रह्मरंध्र में कर दिया| एक दिन पाया कि चेतना ब्रह्मरंध्र से भी परे जाकर अनंताकाश में विचरण कर रही है| यह विराटता की अनुभूति उनकी परम कृपा थी| गुरुकृपा यहीं नहीं रुकी, उन्होंने उस अनंतता से भी परे का बोध करा कर सारे संदेह दूर कर दिये, और बापस इस देह की चेतना में लाकर छोड़ दिया| अब उनके बताए मार्ग पर चलना ही मेरा कर्मयोग और पुरुषार्थ है| इधर-उधर देखना भी पाप है| जय गुरु !! ॐ गुरु !!
कृपा शंकर ७ जुलाई २०२०
धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, और सुख-दुःख .... इन सब से रुचि पूरी तरह हट गई है| जैसे चुंबक की सूई सदा उत्तर दिशा में ही रहती है, वैसे ही प्रियतम के सिवा अन्य कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता| उनके सिवाय अन्य सब व्यर्थ है|
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प्रियतम के चरण-कमलों में आश्रय चाहा था, उन्होंने तो हृदय में ही आश्रय दे दिया है| अब और भटकाव न हो| ॐ ॐ ॐ !!