Monday, 29 June 2026

जहाँ स्वयं का बल नहीं चलता, वहाँ परमात्मा की शरण लेनी ही पड़ती है ---

 जहाँ स्वयं का बल नहीं चलता, वहाँ परमात्मा की शरण लेनी ही पड़ती है ---

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यह त्रिगुणात्मिका प्रकृति बड़ी विकट है, लेकिन इसके नियामक तो भगवान स्वयं हैं। हमारी पात्रता होगी तो वे कृपा कर के हमें प्रकृति के बंधनों से मुक्त कर सकते हैं। भगवान स्वयं कहते हैं --
(१) "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥१८:६१॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी
माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है॥
(यहाँ हृदय का अर्थ हमारी चिंतनधारा यानि विचार और भाव हैं। हम चाहें तो ईश्वर से दूर भी जा सकते हैं, और उनके समीप भी आ सकते हैं।)
(२) "उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥" (रामचरितमानस)
अर्थात् - (शिवजी कहते हैं) हे उमा ! स्वामी श्री रामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं।
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मेरे अपने निजी जीवन में मेरी रक्षा मेरे पूर्व जन्मों के गुरुओं की परम कृपा, और संस्कारों से हुई है। उनका मार्गदर्शन मुझे अभी भी प्राप्त है। पूर्व जन्म के गुरुओं ने ही आध्यात्म के मार्ग पर मेरा मार्गदर्शन किया है, और सब तरह के संशयों का निवारण भी किया है। अभी भी उनकी कृपा की अनुभूतियाँ मुझे कभी कभी होती हैं। कुछ निषेधात्मक कारणों से इस विषय पर इससे अधिक लिखना मना है। पूर्व जन्म के अनेक दृश्य मेरी स्मृति में अब भी कभी कभी आ जाते हैं।
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अपने विगत जीवन के कर्मों का प्रारब्ध फल भुगतने के लिए मेरा जन्म जिस नगर में हुआ, वह नगर और वहाँ का समाज अति घोर तामसी था, और अभी भी है। वर्तमान में अपने प्रारब्धानुसार वहीं रहना पड़ रहा है। जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ तमोगुण अधिक है, फिर कुछ-कुछ रजोगुण है; सतोगुण तो बहुत दुर्लभ है। मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा, यह मेरा प्रारब्ध, और एक वास्तविकता है।
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मेरी बात कोई सुने या न सुने, लेकिन सत्य तो कहूँगा ही। यदि हम चाहते हैं कि हमारी संस्कृति और धर्म की रक्षा हो तो --
(१) संस्कृत भाषा हमें बचपन से ही अपने बालकों को सिखानी पड़ेगी। भविष्य में यही हमारी सदा रक्षा करेगी।
(२) आध्यात्मिक संस्कार अपने बालकों में देने पड़ेंगे।
(३) समाज के ब्राह्मणों में ब्राह्मणत्व के संस्कारों को पुनर्जागृत करना होगा। ब्राह्मणों को निःशुल्क गुरुकुल शिक्षा, और उनकी आजीविका की व्यवस्था करनी होगी। ब्राह्मण बचेगा तभी सनातन धर्म बचेगा; अन्यथा समाज और राष्ट्र नष्ट हो जायेंगे।
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आध्यात्म का पश्चिमीकरण हो रहा है, यह बहुत अधिक घातक है। हमें अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। मुझे पता है कि मेरी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज़ है जिसे कोई नहीं सुनेगा। लेकिन फिर भी मुझे जो सत्य लगता वह तो कहूँगा ही।
धर्म वह है जिसे धारण किया जाता है। उसके दस लक्षण "मनु-स्मृति" में दिये हुए हैं। धर्म वह है जिससे अभ्युदय, और निःश्रेयस की सिद्धि होती है। यह सत्य-सनातन-धर्म है। अन्य सब रिलीजन, मज़हब और पंथ है।
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इस जीवन में मैंने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा समुद्री मार्ग से की है। पनामा को छोड़कर दक्षिण-अमेरिकी महाद्वीप, व पूर्वी अफ्रीका महाद्वीप के देशों को छोड़कर विश्व के लगभग सभी महत्वपूर्ण देशों की यात्रा मैंने की है। अपने पूरे अनुभव के साथ कह रहा हूँ कि "सत्य सनातन धर्म", और "संस्कृत भाषा" में ही भारत का भविष्य है। ये ही भारत की अस्मिता हैं, और इन्हीं के कारण भारत, भारत है।
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सांसारिक दृष्टि से असहाय हूँ, लेकिन परमात्मा में मेरी पूर्ण श्रद्धा है। अब उन्हीं का आश्रय ले रहा हूँ। मेरी श्रद्धा, एक सत्यनिष्ठ धर्मसापेक्ष भारत का निर्माण करेगी, जिसकी राजनीति सत्य सनातन धर्म होगी। असत्य का अंधकार स्थायी नहीं हो सकता। आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों का सिद्धान्त, और ईश्वर के अवतार सत्य हैं। सब कुछ परमात्मा को समर्पित है। मेरा अपना कुछ भी नहीं है। जो इस जन्म में नहीं कर पाया, वह अगले जन्मों में होगा।
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जीवन में सच्चिदानंद परमात्मा की प्राप्ति सभी को हो। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
३० जून २०२5

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