स्वयं भगवान विष्णु ही यह विश्व बन गये हैं। विष्णु-सहस्त्रनाम का आरंभ ही इसे सिद्ध करता है। "ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः। भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः। अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥"
यह सम्पूर्ण विश्व और यह सृष्टि साक्षात परमात्मा है। यह परमात्मा की इच्छा है कि वे स्वयं को कैसे व्यक्त करें। हमारा कार्य उनमें पूर्ण समर्पण और उनके प्रकाश में सतत वृद्धि करना है, जो हम निरंतर करते रहेंगे।
उनके प्रति हमारा समर्पण पूर्ण हो। किसी भी कामना का जन्म न हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० जून २०२५
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