Friday, 23 January 2026

सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें ---

 सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें। परमात्मा से पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। यह शरीर रहे या न रहे, इसका महत्व नहीं है। महत्व एक ही बात का है कि हमारे अस्तित्व के केंद्र बिन्दु केवल कूटस्थ ब्रह्म हों। गीता में भगवान कहते हैं --

"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२६

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