Friday, 23 January 2026

गुरु महाराज का जन्म दिवस ---

 ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार आज ५ जनवरी का दिन मेरे लिए एक विशेष दिन है जो अवशिष्ट निज जीवन में परमात्मा के प्रति गहनतम शर्तरहित अप्रतिबंधित पूर्णप्रेम व समर्पण की दिशा को और भी अधिक दृढ़ता से पुनः स्थापित करेगा।

परमात्मा से परम प्रेम -- मेरा स्वभाव और मेरा जीवन है। इसकी गहनतम अभिव्यक्ति इस जीवन में अभी और इसी समय ही नहीं, बल्कि सभी भावी जन्मों में निरंतर हो। किसी भी तरह के अन्य विचार का जन्म ही न हो।
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मेरा परमप्रेम केवल परमात्मा से ही हो सकता है। वे ही मेरे विखंडित विचारों के ध्रुव हैं। इस जन्म में तो उनके साथ हूँ ही, इस जन्म से पूर्व भी उन्हीं के साथ था, और इस जन्म के उपरांत भी उन्हीं के साथ रहूंगा। इस जन्म में वे ही सभी संबंधियों, मित्रों व शत्रुओं के रूप में आये, इस जन्म का संचालन भी उन्हीं ने किया, और भविष्य में भी मेरे माध्यम से सदा वे स्वयं को ही व्यक्त करेंगे।
भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्"॥६:२५॥ (गीता)
अर्थात् - शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥
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समय समय पर अपने मन को परमात्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करें। यह बड़ी से बड़ी साधना है। यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ जहाँ विचरण करता है, वहाँ वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मा में ही लगायें। विक्षेप का कारण रजोगुण है। हम सर्वत्र यानि सभी प्राणियों में अपने स्वरूप को देखें, और सभी प्राणियों को अपने स्वरूप में देखें।
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ॐ हे प्रेममय ज्योतिर्मय गुरुरूप कूटस्थ ब्रह्म, मेरे ह्रदय को इतना पवित्र कर दो कि श्वेत कमल भी इसे देख कर शरमा जाय। तुम इस नौका के कर्णधार हो जिसे द्वैत से परे ले चलो। तुम सब नाम और रूपों से परे हो। तुम्हारा निवास कूटस्थ में है, जहाँ तुम सदा मेरे साथ हो। तुम स्वयं कूटस्थ ब्रह्म हो। जब तुम साथ में हो, तब मुझे अब और कुछ भी नहीं चाहिये। तुम्हारे विराट महासागर में मैं एक कण था, जो तुम्हारे में विलीन होकर तुम्हारा ही एक प्रवाह बन गया हूँ। मैं तुम्हारे साथ एक हूँ और सदा एक ही रहूँगा॥
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मैं, मेरे गुरु महाराज, और मेरे उपास्य परमशिव/पुरुषोत्तम -- ध्यान में तीनों एक हैं। मैं कूटस्थ सूर्यमंडल में उन्हीं का ध्यान करता हूँ। परमशिव के ध्यान में स्वयं की पृथकता के बोध को विलीन कर रहा हूँ। जो परमशिव हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं, वे ही श्रीहरिः भगवान विष्णु हैं।
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ब्रह्मानंदम् परम सुखदम् केवलं ज्ञान मूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।।
एकं नित्यं विमलं चलम् सर्वधीसाक्षी भूतम्।
भावातीतं त्रिगुण रहितं सद्गुरुं तम् नमामि।।
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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥"
वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥"
नमः पुरस्तात् पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व
अनन्तवीर्याअमितविक्रमस्त्वम् सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥"
ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
५ जनवरी २०२६
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