आने वाला समय सत्य की विजय, अधर्म के अंत, धार्मिक व नैतिक व्यवस्था की जीत और अनैतिकता के विनाश का है। असत्य और अंधकार की शक्तियां प्रभावहीन होंगी, व नकारात्मकता में बहुत कमी आयेगी। विश्व का कल्याण होगा। लेकिन हमें निरंतर परमात्मा की चेतना में रहना होगा, अन्यथा हमारा विनाश भी निश्चित है।
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कुछ विश्वसनीय ज्योतिषियों के अनुसार २३ फरवरी २०२६ से ११ जुलाई २०२६ के मध्य का समय महा विध्वंसक और विनाशकारी है। लेकिन मेरी आस्था कहती है कि इसमें घबराने की कोई बात नहीं है। यह समय बड़ा शुभ है, क्योंकि विनाश केवल असत्य और अंधकार की शक्तियों का ही होगा। जिनकी चेतना में परमात्मा है, उनका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। चाहे सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, हम परमात्मा में स्थिर रहें। गीता में भगवान बता चुके हैं --
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६:२२॥"
अर्थात् -- जिस परम लाभ (आत्मज्ञान) को प्राप्त करने के पश्चात, व्यक्ति किसी भी अन्य लाभ को उससे श्रेष्ठ नहीं मानता। उसमें स्थित होने पर वह बड़े से बड़े दुख से भी विचलित नहीं होता॥
भगवान आगे कहते हैं --
"यो माम् पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि सच मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है, और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम्॥अहं ब्रह्मास्मि॥
हम परमात्मा के हृदय में स्थिर रहें, कोई हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। आत्मा और ब्रह्म के एकत्व का सदा ध्यान करें। सर्वत्र आत्मा का अनुभव करें। हम स्वयं आत्मस्वरूप शिव हैं, यह नश्वर देह नहीं। जिन का कभी जन्म ही नहीं हुआ, उन शिव की कभी मृत्यु भी नहीं हो सकती। वे मृत्युंजय हमारे साथ नित्य हैं। उनका ध्यान हमें भी मृत्युंजयी बना सकता है। वास्तव में वे ही हैं, हमारा कोई अस्तित्व नहीं है।
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शुक्ल यजुर्वेद का ४० वां अध्याय १८ मंत्रों का "ईशावास्योपनिषद" है। एक बार बड़ी गहनता से उसका स्वाध्याय कई दिनों तक कीजिये। मैं भी उसका स्वाध्याय आपके साथ साथ आज से कई दिनों तक करूंगा। यह उपनिषद आध्यात्म में प्रवेश का द्वार है। इसे आत्मसात किये बिना आध्यात्म में कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता।
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जैसे चंद्रमा को साथ लेकर पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है वैसे ही मैं भी आप सब को अपने साथ एकाकार कर के ही परमात्मा की उपासना करता हूँ। मैं आप सब के साथ एक हूँ, कहीं कोई पृथकता नहीं है। मुझे ईश्वर-लाभ होगा तो वह आपको भी होगा। जहां आप हैं, वहीं मैं भी हूँ। अगले अनेक दिन गहन साधना के हैं। यदि मैं उपलब्ध न रहूँ तो मुझे अपने हृदय में ही पाओगे।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
२० जनवरी २०२६
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