भ्रूमध्य में गहन ध्यान -- त्रिवेणी संगम में स्नान है। हमारी चेतना जहां है, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और सारे संत-महात्मा वहीं हैं।
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अपनी चेतना को भ्रूमध्य में और उससे ऊपर रखना त्रिवेणी संगम में स्नान करना है। आने-जाने वाली हर सांस के प्रति सजग रहें, और निज चेतना का निरंतर विस्तार करते रहें। गीता में बताई गयी ब्राह्मीस्थिति यानि कूटस्थ-चैतन्य में हम अनंत, सर्वव्यापक, असम्बद्ध, अलिप्त व शाश्वत हैं। हमारे हृदय की हर धड़कन, हर आती जाती साँस, -- परमात्मा की कृपा है। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा है।
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रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ। दिन का प्रारम्भ परमात्मा के प्रेम रूप पर ध्यान से करें। पूरे दिन परमात्मा की स्मृति रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः स्मरण करते रहें। एक दिन पायेंगे कि भवसागर तो कभी का पीछे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला। गीता में भगवान कहते हैं --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
अर्थात् - "(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥९:३४॥"
"तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो॥१८:६५॥"
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अभीप्सा, परमप्रेम और समर्पण -- यही वेदान्त है, यही ज्ञान है, यही भक्ति है, और यही सत्य-सनातन-धर्म है। बाकी सब इन्हीं का विस्तार है। सर्वत्र भगवान वासुदेव हैं। वे ही सर्वस्व हैं। कहीं कोई पृथकता नहीं है। अन्य कुछ है ही नहीं।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२६
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