सन्यासी और योगी कौन हैं? ---
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मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका एकमात्र स्वधर्म परमब्रह्म परमात्मा को पूर्ण समर्पण और निज जीवन में उन की पूर्ण अभिव्यक्ति है। उनकी परमकृपा से किसी भी तरह का कोई संशय मुझे नहीं है। मेरा स्वधर्म — मेरा कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग ही है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥६:१॥"
अर्थात् - श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है॥
आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है। हमें अपने कर्म का निर्वाह अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न कि कर्मफल की प्राप्ति के लिए। तभी हम सन्यासी व योगी हैं, अन्यथा नहीं।
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भगवान हमें सब संकल्पों के त्याग को भी कहते हैं, क्योंकि संकल्पों को त्यागे बिना कोई न तो कोई सन्यासी हो सकता है और न योगी। इच्छाओं को त्याग कर ही हम आध्यात्मिक हो सकते हैं। हम अपने द्वारा अपना उद्धार स्वयं
करें, अपना पतन न करे; क्योंकि हम स्वयं ही अपने मित्र हैं, और स्वयं ही अपने शत्रु।
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
अर्थात् -- जिसने अपने-आप पर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।
(सार की बात यह है कि जो समभाव में स्थित है, उसे ईश्वर नित्य प्राप्त हैं।)
ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ मई २०२६
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