आध्यात्मिक मार्ग पर बाधाएँ कैसे दूर हों? सत्य-संकल्प की दृढ़ता में कैसे वृद्धि हो?
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राम अभी तक वन में हैं, रावण सबके मन में है -- यही एकमात्र कारण है हमारे आध्यात्मिक पतन का। जब कि होना यह चाहिए कि -- "रामहि केवल प्रेम पियारा। जान लेहु जो जानन हारा।"
रामचरितमानस में एक स्थान पर लिखा है --
"तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिअ तुला इक अंग।
तुल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग॥"
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स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने अपनी रचना भजगोविन्दम् (मोहमुद्गर) के १३वें श्लोक में लिखा है --
"क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥"
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श्रीरामचरितमानस, भागवत पुराण, और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रन्थों का नित्य नियमित स्वाध्याय और सत्संग ही -- मेरी दृष्टि में एकमात्र उपाय है, आध्यात्मिक बाधाओं को दूर करने, और संकल्प में निरंतर दृढ़ता लाने का। सबसे दुर्लभ चीज सत्संग ही है। कुसंग का तो किसी भी परिस्थिति में त्याग हो।
"एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
‘भीखा’ संगति साधु की, कटें कोटि अपराध॥"
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भगवान विष्णु या उनके अवतारों या परमशिव की अनंतता का ध्यान हमें नित्य नियमित करना चाहिए। इससे अतिरिक्त अन्य कुछ मुझे समझ में नहीं आता। सभी मित्रों को साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने अपने सुझाव लिखे हैं। सभी का कल्याण हो।
हरिः ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
३ मई २०२६
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