राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं?
हमारी जाति और धर्म क्या है?
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इस विषय पर मेरी सोच स्पष्ट है। मेरा एकमात्र उत्तर है कि हमें अपने स्वधर्म का सदैव पालन करते रहना चाहिए। धर्म का अर्थ Religion नहीं है। वास्तव में धर्म शब्द का अनुवाद नहीं हो सकता। धर्म धर्म ही रहेगा। वैशेषिक-सूत्रों, महाभारत, मनु-स्मृति, और अन्य अनेक आगम ग्रंथों में में धर्म शब्द की सर्वोच्च व्याख्या की गई है। इस विषय पर मैं अनेक बार लिख चुका हूँ। बार बार लिखना पुनरोक्ति दोष होगा, फिर भी लिख रहा हूँ। हम शाश्वत् आत्मा हैं, आत्मा का स्वधर्म परमात्मा की अभीप्सा, उपासना और पूर्ण समर्पण है। यही हमारा स्वधर्म है।
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कुछ लोग मुझे जातिवादी कह कर अपने मन की कुंठा को ही व्यक्त करते हैं जो सबसे बड़ा झूठ है। उनको मेरा एक ही उत्तर है -- जब मैं यह शरीर ही नहीं हूँ तो मेरी जाति क्या हो सकती है? ---
"जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम।
गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥"
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और मुझे कुछ भी नहीं कहना है। गुरु महाराज ने तो योग और वेदान्त की शिक्षा दी, व उपासना का मर्म समझाया। गुरुकृपा से ही यह समझ पाया हूँ कि इस समय तो परमात्मा को पूर्ण आत्म-समर्पण ही मेरा स्वधर्म है॥ इस जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। गुरु महाराज ने परमात्मा का बोध भी अनेक बार बड़े स्पष्ट रूप से कराया है। अतः कोई संशय नहीं है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम् !! अहं ब्रह्मास्मि !!
ॐ तत् ॐ सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ फरवरी २०२६
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