आप से मैं केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना ही कर सकता हूँ। यह भी आपसे एक विनम्र प्रार्थना ही है। अपनी पूरी चेतना से निवेदन कर रहा हूँ कि अगले चार से छह महिने तक आत्म-संयम बना कर ईश्वर को हर समय अपनी स्मृति में रखें। भटकें नहीं। स्वधर्म पर दृढ़ रहें। जो होगा वह अच्छा ही होगा। आपका कल्याण होगा।
"अहं इन्द्रो न पराजिग्ये" ऋग्वेद (१०.४८.५) का एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है, जिसका अर्थ है- "मैं इन्द्र (विजेता) हूँ, कभी पराजित नहीं होता"।
गुरु महाराज और ईश्वर हमारे साथ हैं। ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
२६ जनवरी २०२६
.
पुनश्च: --- मुझे एक तपस्वी संत ने अपने सत्संग में यह बात बताई ---
प्रातः अपनी नींद से इस भाव से उठिए जैसे आपके इष्ट देवता सो कर उठे हैं। उनको सो कर उठने के लिए नमन कीजिये। आप स्वयं नहीं उठे हैं, आपके इष्ट देवता सो कर उठे हैं।
फिर बिस्तर पर ही लेटे लेटे, या बैठे-बैठे, मन ही मन, या बोलकर उनका कीर्तन करें। पूरे दिन उनकी याद बनी रहेगी।
रात्रि को सोने से पूर्व भी यही भाव रखो कि अपने इष्ट देवता को आप सुला रहे हैं। सोने से पूर्व भी कुछ देर कीर्तन कर के ही सोएँ।
No comments:
Post a Comment