श्रीमद्भगवद्गीता का सार जो मुझे अपनी अति अल्प और सीमित बुद्धि से समझ में आया है --
.
मैं बात वही कह रहा हूँ जो मुझे समझ में आयी है, किसी की नकल नहीं कर रहा। विद्वान मनीषी संतजन कहते हैं कि वेद-उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने केवल तीन विषयों -- ज्ञान, भक्ति और कर्म -- पर ही चर्चा की है। उपरोक्त तीन विषयों की चर्चा में ही उन्होंने पूरे सनातन धर्म को लपेट लिया है। जिन में सतोगुण की प्रधानता है वे ही ज्ञान और भक्ति को समझ सकते हैं, जिनमें रजोगुण की प्रधानता है वे कर्म को समझ सकते हैं। जिनमें तमोगुण प्रधान है, वे गीता को नहीं समझ सकते। उनका आध्यात्म में प्रवेश नहीं हो सकता। उनके लिए सामान्य पूजा-पाठ ही उचित है।
.
वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा से जो भी ज्ञान, भक्ति और कर्म मुझे समझ में आये हैं, उन्हें मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। वे हैं --
(१) पुरुषोत्तम योग, (२) अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति, और (३) उपासना।
पुरुषोत्तम योग को सामान्य बुद्धि से नहीं समझ सकते। यह भगवान की प्रत्यक्ष विशेष कृपा से ही समझा जा सकता है। अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति को समझा जा सकता है। परमात्मा को पाने की अनवरत अभीप्सा और उपासना (साधना) ही मेरी दृष्टि में कर्मयोग हैं। अनन्य भक्ति को निम्न श्लोकों से समझ सकते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२॥"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् --
"हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥८:१४॥"
"हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है॥८:२२॥"
"अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥९:२२॥"
"अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥१३:११॥"
.
गीता का सर्वोच्च सार -- शरणागति द्वारा समर्पण है। यह भी उनकी विशेष कृपा से ही समझा जा सकता है। किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय महात्मा से ही मार्गदर्शन लें। अन्यथा गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति भगवान शिव, और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण हैं। इन दोनों रूपों में अंतर इतना ही है कि भगवान दक्षिणामूर्ति शिव पूर्णतः मौन हैं। वे मुंह से कुछ भी नहीं बोलते, उनके समक्ष ध्यानस्थ होते ही ज्ञान अपने आप प्राप्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण मौन भी हैं और बोलते भी हैं। लेकिन ज्ञान की प्राप्ति उनकी परम कृपा से ही होती है। हम उनकी परम कृपा के पात्र बनें।
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०२६
No comments:
Post a Comment