Tuesday, 3 February 2026

वर्तमान परिस्थितियों में ईश्वर का आश्रय लें, और अनन्य भाव से ज्ञान, भक्ति व कर्म में लीन रहते हुए 'मोह' रूपी कलिल से स्वयं को मुक्त करें ---

वर्तमान परिस्थितियों में ईश्वर का आश्रय लें, और अनन्य भाव से ज्ञान, भक्ति व कर्म में लीन रहते हुए 'मोह' रूपी कलिल से स्वयं को मुक्त करें ---

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इस लेख को लिखने में मैंने अपना पूरा हृदय पूर्ण भक्ति से उंडेल दिया है। इस तरह के लेख भगवान की प्रत्यक्ष परम कृपा के बिना नहीं लिखे जा सकते। अपने हृदय की पूर्ण भक्ति से यह लेख लिखा गया है। सही बात तो यह है कि स्वयं भगवान ने ही मुझे निमित्त बनाकर यह लेख लिखा है।
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हम न तो पूर्वानुभूत विषय सुखों का स्मरण करें, और न ही भविष्य में प्राप्त होनेवाले अनुभवों की आशा। वर्तमान में ईश्वर में स्थिर होकर ही स्थित रहें। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि उसके लिये क्या करें?
उसके लिये भगवान को कर्ता बनाकर अनन्य भक्तियोग से उन्हें निज जीवन में अवतरित करें। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो। मुझ में अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥२:३८॥"
अर्थात् -- सुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुमको पाप नहीं लगेगा॥
"बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥२:५०॥"
अर्थात् -- समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है, इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है॥
"यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥२:५२॥"
अर्थात् -- जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं॥
भगवान का आदेश है --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
अर्थात् -- (तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
भगवान हमें निरंतर अपना भजन करने को कहते हैं -- "अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।" अर्थात् "यह शरीर अनित्य और दुखों से भरा है, इसे प्राप्त करके तुम मेरी भक्ति करो।"
भगवान यह भी कहते हैं कि देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और भगवान को पूजने वाले भक्त भगवान को ही प्राप्त होते हैं॥
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अनन्य भाव से भगवान को भजने वाला भक्त कभी नष्ट नहीं होता। अनन्य भाव से भगवान को अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी भजता है तो वह साधु हो जाता है। वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है।
भगवान कहते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
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भगवान चाहते हैं कि हम अपने सारे कर्म उन्हें ही अर्पित कर दें --
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥९:२६॥"
"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
अर्थात् -- जो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ॥
हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥
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अब आते हैं एक ऐसे मंत्र पर जो गीता का मध्य बिन्दु है, जिसे समझ कर आध्यात्मिक क्षेत्र में निश्चित रूप से महान सफलता प्राप्त की जा सकती है। भगवान श्रीकृष्ण यह वचन देते हैं कि "अनन्यभाव से जो मेरा अर्थात् आत्मस्वरूप का ध्यान करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तजनों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।" शंकर भाष्य के अनुसार यहाँ योग का अर्थ है -- अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति, और क्षेम का अर्थ है -- प्राप्त वस्तु की रक्षा। भगवान कहते हैं ---
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
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भगवान एक चेतावनी भी देते हैं--
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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इस लेख को अपने हृदय की पूर्ण अनन्य भक्ति से लिखा है। इससे अच्छा लिखना मेरे लिए संभव नहीं है। भगवान की पूर्ण कृपा आप सब पर हो। सब का मंगल हो।
हरिः ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ फरवरी २०२६

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