Sunday, 22 February 2026

प्रभु से प्रेम कैसे करें ?

 प्रभु से प्रेम कैसे करें ?

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इस प्रश्न का उत्तर मेरी तो सीमित तुच्छ बुद्धि से परे है| मुझे तो लगता है कि प्रेम एक स्थिति है, कोई क्रिया नहीं| यह हो जाता है, किया नहीं जाता| क्या यह किया जा सकता है? यदि हाँ तो कैसे? कृपया मुझे यह बताएँ|
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को माध्यम बना कर सारे संसार को कहा है कि "मद्भक्तः" अर्थात् जो मुझे प्रेम करता है वह मेरा ही स्वरूप होगा। भगवान् ने असीम प्रेम को ही मोक्ष का साधन बतलाया है| पर वह प्रेम क्या है? यही जानना चाहता हूँ| भक्त बनें तो कैसे बनें ?
दूसरा प्रश्न जो मैं पूछना चाहता हूँ वह यह कि भारत में और विश्व में भी अनेक समाज सुधारक हुए है, पर वे कभी आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर नहीं चल पाए| ऐसा क्यों ?
क्या ये दोनों मार्ग अलग है या आत्म-साक्षात्कार ही समाज सेवा है?
अभी अभी एक श्रद्धेय स्वामीजी के लेख का स्वाध्याय कर रहा था। उनके अनुसार इस संसार में जो "हेय-उपादेय" बुद्धि रखेगा वह "अहेय-अनुपादेय" ब्रह्मतत्त्व को कभी पा नहीं सकता। जो "अहेय-अनुपादेय" परमार्थतत्त्व को पकड़ना चाहता है वह "हेय-उपादेय" दृष्टि कर नहीं सकता।
उनकी बात मुझे सही लग रही है| आध्यात्मिक व्यक्ति किसी की निंदा, आलोचना या शिकायत नहीं करते, इसका औचित्य समझने में मुझे कुछ और समय लगेगा|
पर प्रभु के प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा है यह बात समझ में तो आती है पर यह कैसे हो, यह समझ से परे है|
हमारे लिए तो उन का प्रेम ही सब कुछ है| उन में लीन होकर रहना ही हमारा तीर्थ है, वे ही हमारे एकमात्र सम्बन्धी हैं, वे ही हमारे एकमात्र "सखा" मित्र हैं, और उन में तन्मयता ही हमारा जीवन है| वे हमारे इतने समीप हैं की हम उनका बोध ही नहीं कर पाते|
उन से हमारी एकमात्र प्रार्थना है कि वे हमारे प्रेम को अपनी पूर्णता दें| उन की और आप सब की जय हो|
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०१४

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