हमारे सभी तरह के सभी संशयों का निवारण कैसे हो? ---
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ईश्वर ने चाहा तो हमें आज इस लेख में सबके-सब तरह के संशयों का निवारण हो जाएगा। यदि फिर भी कोई संशय रहता है तो उसका निवारण गुरुरूप में स्वयं जगत्-गुरु भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण, या दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव ही कर सकते हैं। हमें सब तरह की कामनाओं, किन्तु-परन्तुओं, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म से ऊपर उठकर, व कर्ताभाव से मुक्त होकर, परमात्मा को समर्पित होना ही पड़ेगा। हृदय में (यहाँ हृदय का अर्थ हमारे भावों और विचारों से है, न कि भौतिक हृदय से) किसी भी तरह की कोई आकांक्षा न होकर केवल परमात्मा को समर्पित होने की अभीप्सा हो।
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उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, भागवत पुराण, व रामचरितमानस जैसे ग्रन्थों का स्वाध्याय समय समय पर करते रहना चाहिए। इससे प्रेरणा मिलती रहती है और अभीप्सा की अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है। भौतिक शरीर की क्षमता व मनोबल को बनाए रखने के लिए हठयोग भी आवश्यक है। ध्यान -- अनन्य भाव से ज्योतिर्मय ब्रह्म का करें। अजपा-जप और नादश्रवण — ये दोनों जपयोग के अंतर्गत ही आते हैं। हमारा चाल-चलन, और आचरण पवित्रतम हो, और हमारी भक्ति अव्यभिचारिणी हो। जितने समय तक हम स्वाध्याय करते हैं, उससे कई गुणा अधिक समय तक हमें नाद-श्रवण सहित ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करना चाहिए।
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यदि अब भी किसी भी तरह का कोई संशय हो तो उसका निवारण किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों का ज्ञान हो) आचार्य से करें क्योंकि यह श्रुति भगवती का आदेश है। ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते करते साधक को परमशिव व पुरुषोत्तम की अनुभूति व उन का बोध भी उनकी परम कृपा से हो जायेगा।
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यह लेख परिचयात्मक भी है और मार्गदर्शक भी। इससे अधिक लिखने में इस समय असमर्थ हूँ। आपको मेरे हृदय का पूर्ण प्रेम अर्पित है। आपका जीवन कृतार्थ हो, व आप कृतकृत्य हों। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२७ मार्च २०२६
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