Friday, 27 March 2026

मेरे लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोग क्या हैं?

मेरे लिए निष्काम भाव से की गई ईश्वर की साधना कर्मयोग है। साधना के पश्चात ईश्वर से एकत्व की अनुभूतियाँ ज्ञानयोग है। ईश्वर से परमप्रेम, और अभीप्सा की अग्नि में समस्त आकांक्षाओं/कामनाओं की आहुति भक्तियोग है।
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भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष देवता हैं। सफलता उनके पीछे पीछे चलती है। उन्होंने कभी कोई विफलता नहीं देखी। असत्य और अंधकार की कोई आसुरी शक्ति, उनके समक्ष नहीं टिक सकती। उनसे अधिक शक्तिशाली और ज्ञानी अन्य कोई नहीं है।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
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आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमारी दृष्टि -- समष्टि-दृष्टि हो, न कि व्यक्तिगत। परमात्मा की सर्वव्यापकता और पूर्णता पर हमारा ध्यान और समर्पण होगा तभी हमारी आध्यात्मिक उन्नति होगी। एक साधक के लिए उन्नति का आधार और मापदंड उसका ब्रह्मज्ञान हो, न कि कुछ अन्य।
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जो बीत गया सो बीत गया, जो हो गया सो हो गया। भूतकाल को तो बदल नहीं सकते, अभी जब से होश आया है, तब इसी समय से परमात्मा की चेतना में रहें। हमारा कार्य परमात्मा में पूर्ण समर्पण है। यह शरीर रहे या न रहे, इसका कोई महत्व नहीं है। महत्व इस बात का है कि निज जीवन में परमात्मा का अवतरण हो।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ मार्च २०२६

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