ईश्वर की आज्ञा सर्वोपरी ---
मुझे ईश्वर की आज्ञा है -- अवशिष्ट जीवन में सब कुछ भूल कर पूरा समय परमात्मा के चिंतन-मनन, निदिध्यासन और ध्यान में ही व्यतीत करने की। अब ईश्वर की आज्ञा ही सर्वोपरी है। इस भौतिक जीवन में जन्म से पूर्व भी परमात्मा ही साथ में थे, भौतिक मृत्यु के उपरांत भी परमात्मा ही साथ में रहेंगे, और इस समय भी आप सब के रूपों में परमात्मा ही मेरे साथ हैं। वे ही शत्रु-मित्र, माता-पिता, भाई-बहिन, सगे-संबंधियों व अन्य सभी रूपों में आए, व इस समय भी आप सब के सभी रूपों में वे ही मेरे साथ हैं। अब कौन किसे नमन करे? सब कुछ तो परमात्मा है। उनके सिवाय अन्य कुछ है भी नहीं।
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इस जीवन में मुझ अकिंचन के लिए मेरा स्वधर्म (परमात्मा की भक्ति और शरणागति द्वारा पूर्ण समर्पण) ही सबसे अधिक प्रधान है। मैं क्या चाहता हूँ, और क्या नहीं, इसका अब कोई महत्व नहीं है। परमात्मा की क्या इच्छा है, एकमात्र महत्व उसी का है। मुझे पता है कि मेरा स्वधर्म क्या है। मुझे परमब्रह्म परमात्मा से खूब प्रेम है, और खूब अति दुर्लभ आध्यात्मिक और लौकिक अनुभव भी इसी जीवन में मुझे हुए हैं। जीवन में पूर्ण संतुष्टि है, लेकिन परमात्मा के लिए एक गहन अभीप्सा हृदय में सदा बनी रहती है।
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इस समय मेरे लिए मेरे सनातन-धर्म से अधिक बड़ा कुछ भी अन्य नहीं है। यही मेरे लिए जन्म और मृत्यु है। शिव और विष्णु व उनके अवतारों में मेरी पूर्ण समझ और आस्था है। परमात्मा के मातृ रूप की भी मुझे बहुत अनुभूतियाँ हुई हैं।
इस भौतिक जीवन का भी मैंने खूब गहराई से अनुभव लिया है। इसी जीवन में जब साम्यवाद था तब मुझे कुछ पूर्व मार्क्सवादी देशों (रूस, लाटविया, चीन, उत्तरी कोरिया, यूक्रेन, व रोमानिया) के नारकीय जीवन को बहुत समीप से देखने का अवसर मिला है। इसके अतिरिक्त जीवन में खूब अति दुर्लभ यात्राएं भी की हैं। सन १९८५ ई में एक बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा समुद्री मार्ग से की थी। चीन की महान दीवार, मिश्र के पिरामिड्स और स्फिन्क्स, व कनाडा का नियाग्रा फ़ॉल्स दो दो बार बहुत अच्छी तरह से देखा है। यूरोप, अमेरिका व जापान में बहुत घूमा हूँ। नौ मुस्लिम देशों की यात्रा की है। अपने स्तर पर स्वाध्याय भी खूब किया है। जीवन में बड़े अच्छे से अच्छे, व खराब से खराब लोगों से भी मिलना बहुत हुआ है, जिनसे बहुत कुछ सीखा और खूब अनुभव लिया है। आसुरी स्वभाव के लोगों ने मुझे ठगा भी बहुत अधिक है, भगवान उनसे मेरी सदा रक्षा करें। मैंने कुछ समय नौ सेना में भी काम किया था जिसमें सन १९६५ व १९७१ में पाकिस्तान से हुए युद्धों के समय एक युद्धपोत व एक पनडुब्बी में सक्रिय सेवा भी की थी। जहाँ तक आध्यात्म की बात है, खूब अति-दुर्लभ आध्यात्मिक अनुभव भी मुझे हुए हैं।
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लेकिन इन सब का अब कोई महत्व नहीं है। एकमात्र महत्व परमात्मा की भक्ति और अनुभूतियों का ही है। जीवन के अच्छे व बुरे सभी पक्षों को भूलकर अब वर्तमान जीवन परमात्मा को पूर्णतः समर्पित है। इस जन्म में मुझे वैराग्य नहीं लिखा है। मोक्ष व मुक्ति की मुझे कोई कामना नहीं है। आत्मा नित्य मुक्त है। हरेक जन्म में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो।
कृपा शंकर / १७ अप्रेल २०२६
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ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः॥ शं नो भवत्वर्यमा॥ शं न इन्द्रो बृहस्पतिः॥ शं नो विष्णुरुरुक्रमः।
ॐ नमो ब्रह्मणे॥ नमस्ते वायो॥ त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि॥ त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि॥ ऋतं वदिष्यामि॥ सत्यं वदिष्यामि॥ तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु॥ अवतु माम्। अवतु वक्तारम्।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
(कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीयोपनिषद् शिक्षावल्ली प्रथमोऽनुवाकः)
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आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ (ऋग्वेद (१.८९.१)
गीता में भगवान ने कहा है ---
ReplyDelete"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
अर्थात् -- जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों से अतीत होकर ब्रह्म बनने योग्य हो जाता है॥
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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भगवान का मुझे आदेश था कि मैं उनसे अतिरिक्त अन्य किसी भी तरह की कोई कामना नहीं करूँ। लेकिन यह मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार मेरी नहीं सुनते। बार बार भटका देते हैं। फिर भी एक उम्मीद बची है।