ध्यान, समर्पण, कूटस्थ, महात्मा, वीतराग और स्थितप्रज्ञ ---
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परमप्रेम सहित परमात्मा का निरंतर चिंतन ही "ध्यान" है, जिसमें हम अपने अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) का पूर्ण समर्पण उन्हें करते हैं।
परमात्मा को हम अपने अन्तःकरण के सिवाय अन्य दे ही क्या सकते हैं? "पत्र, पुष्प, फल, और जल" तो एक भावना और लोकाचार है। भगवान कहते हैं --
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं, यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि, प्रयतात्मनः॥" (गीता: ९:२६)
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भगवान श्रीकृष्ण ने एक बहुत ही सुंदर शब्द "कूटस्थ" का प्रयोग श्रीमद्भगवद्गीता में किया है जो उनकी कृपा से ही समझ में आ सकता है। उमकी परम कृपा और समर्पण का भाव रखते हुए हम कूटस्थ में निरंतर उनका ध्यान करें। कठोपनिषद के अनुसार, कूटस्थ वह सर्वोच्च आत्म-तत्व है जो सब कुछ बदल जाने के बाद भी स्वयं नहीं बदलता।
"ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥(गीता: ६:८)"
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥(गीता: १२:३)"
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥(गीता: १५-१६)"
(कठोपनिषद में कूटस्थ आत्मा (नित्य, अचल, निर्विकार) का वर्णन है।)
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आजकल हर किसी व्यक्ति के नाम के साथ हम लोग "महात्मा" लगा देते हैं, जो गलत है। महत् तत्व से जुड़ा व्यक्ति ही महात्मा कहलाने योग्य है। एक वीतराग व्यक्ति ही महत् तत्व से जुड़ कर "महात्मा" हो सकता है। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त होकर जिसने परमात्मा की सर्वव्यापकता की अनुभूति की हो, वही वीतराग है। जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित हो वह स्थितप्रज्ञ है। परमात्मा को उपलब्ध होने के लिए वीतराग और स्थितप्रज्ञ होना आवश्यक है।
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ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपा शंकर
११ अप्रेल २०२६
मुक्ति भी मैं हूँ और बंधन भी मैं हूँ। दृष्टि, दृश्य और दृष्टा भी मैं हूँ। मैं ही अभीप्सा हूँ और तृप्ति भी मैं हूँ। शिव शिव शिव शिव शिव॥ ॐ ॐ ॐ॥
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जैसा हमारा चिंतन और संकल्प होते हैं, वैसे ही हम बन जाते हैं। जहाँ हमारे विचार होते हैं, वहीं हम होते हैं। निज विवेक से चिंतन करें। जो प्रभुप्रेम में गहरी डुबकी लगाएगा उसी को मोती मिलेंगे। अंततः वह स्वयं ही प्रभु के साथ एक हो जाएगा। डूबेगा, खो जाएगा, लौटकर खबर भी न दे सकेगा, नमक के पुतले की तरह।