Thursday, 11 September 2025

भारत की अस्मिता को सबसे बड़ा खतरा किससे है? --

 भारत की अस्मिता को सबसे बड़ा खतरा किससे है? --

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(१) मज़हबी उग्रवाद, (२) मिशनरी विस्तारवाद, (३) नास्तिक मार्क्सवाद, और
(४) धर्मशिक्षा के अभाव में उत्पन्न हुई जड़ता, अज्ञानता, और किंकर्तव्यविमूढ़ता के कारण है। अन्य कोई कारण नहीं है।
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वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था हमें यूरो ईसाई मान्यताओं को ही भारतीय मानने का दुराग्रह कर रही है। दूसरों को सम्मान देने की शिक्षा हम हिंदुओं को ही दी जाती है। जब कि हिंदुओं से पृथक अन्य सब को बचपन से ही हिंदुओं को निंदनीय व हीन मानना और हिंदुओं से घृणा करना सिखाया जाता है।
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मेरी आस्था गीता में दिये हुए भगवान के वचन पर है। यह सृष्टि उन्हीं की है। सत्य की विजय होगी। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ सितंबर २०२५

भारत सरकार के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का मैं पूरी तरह समर्थन करता हूँ ---

 भारत सरकार के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का मैं पूरी तरह समर्थन करता हूँ। भारत की सुरक्षा के लिए यह बहुत आवश्यक है। मुझे इस विषय की जानकारी है इसीलिये मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ। इसका कुछ भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ने वाला है।

यह प्रोजेक्ट चीनी नौसेना के बंगाल की खाड़ी में प्रवेश को नियंत्रित कर सकेगा। चीन ने बंगाल की खाड़ी में उत्तरी अंडमान द्वीप समूह के पास स्थित कोको द्वीप को म्यांमार से ९९ वर्ष की लीज पर ले रखा है जहाँ से वह भारत पर जासूसी करता है। उसके युद्धपोत भी वहाँ आते-जाते रहते हैं। निम्न मानचित्र सार्वजनिक है इसमें कोई गोपनीयता नहीं है। ग्रेट निकोबार द्वीप सहित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के अनेक द्वीपों में मैं वर्षों पूर्व खूब घूमा हूँ। मलयेशिया, इन्डोनेशिया और सिंगापूर भी अनेक बार गया हूँ, और मलक्का-जलडमरूमध्य की भी जानकारी है जहां से चीन के ९०% खनिज तेल का परिवहन होता है। युद्ध की स्थिति में भारत सरकार चीनी जहाजों के आवागमन को पूरी तरह अवरुद्ध कर सकती है।
चीनी हितों की रक्षा के लिए कॉंग्रेस पार्टी इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रही है। १० सितम्बर २०२५

आत्म-ज्ञान के बिना जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने का कोई अन्य मार्ग संभव नहीं है।

आत्म-ज्ञान के बिना जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने का कोई अन्य मार्ग संभव नहीं है। आत्म-ज्ञान ही एकमात्र मार्ग है जो हमें परमात्मा से संयुक्त कर सकता है ---

नान्य: पन्था ॥ जो मैं हूँ, जैसे मेरे संकल्प हैं, उन्हीं के अनुरूप सृष्टि मेरे चारों ओर सृष्ट हो रही है। मेरे व्यक्तिगत विचार महत्वहीन हैं, लेकिन मेरे अंतरतम संकल्पों की -- ऊर्जा, स्पंदन, और आवृतियाँ -- घनीभूत होकर इस सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण कर रही हैं। कोई कमी है तो वह मुझ में है, कहीं बाहर नहीं। मुझे मेरे स्वयं के संकल्पों की आवृतियों को ही घनीभूत और परिवर्तित करना होगा। अन्य कोई मार्ग नहीं है। श्रुति भगवती कहती है --
"वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस: परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय ॥"
ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ सितंबर २०२५

सनातन धर्म बहुत समृद्ध है। उसे किसी रिलीजन या मज़हब के सहारे, या किसी विदेशी देवता की आवश्यकता नहीं है।

 सनातन धर्म बहुत समृद्ध है। उसे किसी रिलीजन या मज़हब के सहारे, या किसी विदेशी देवता की आवश्यकता नहीं है। हमारी सबसे बड़ी समस्या है कि हम --

(१) भगवान का स्मरण हर समय कैसे करें? (२) समभाव में स्थिति कैसे हो?
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हमारे जीवन के अंतिम काल यानि मृत्यु के समय की भावना ही पुनर्जन्म का कारण होती है, इसलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें हर समय भगवान का स्मरण करते हुए साथ-साथ शास्त्राज्ञानुसार स्वधर्मरूप युद्ध भी करने का आदेश देते हैं। भगवान कहते हैं ---
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- "इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥"
भगवान ने यह नहीं कहा कि दिन में दो-ढाई घंटे मेरा स्मरण करना और बाकी समय संसार का काम करना। भगवान ने कहा है कि जो व्यक्ति समभाव को प्राप्त है, वह हर समय मुझे उपलब्ध है --
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
अर्थात् -- "शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है, अर्थात्, आत्मरूप से विद्यमान है॥".
आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं -- जिस ने मन-इन्द्रिय आदि के संघातरूप इस शरीर को अपने वश में कर लिया है, और जो प्रशान्त है, जिसका अन्तःकरण सदा प्रसन्न रहता है, उस को भली प्रकार से सर्वत्र परमात्मा प्राप्त है; अर्थात् वह साक्षात् आत्मभाव से विद्यमान है। वह सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख एवं मान और अपमान में यानी पूजा और तिरस्कार में भी (सम हो जाता है)॥
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उपरोक्त स्थिति को प्राप्त करने के लिए हमें तप करना होगा, यानि साधना करनी होगी। हमें शरीर, मन और बुद्धि के द्वन्द्वों से ऊपर उठ कर अद्वय होना होगा। भगवान कहते हैं --
"इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥५:१९॥"
अर्थात् -- जिनका अन्तःकरण समता में स्थित है, उन्होंने इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
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परमात्मा से भिन्न स्वयं को समझना अज्ञान है। भगवान से भिन्न विषयों का चिंतन भी हमारे दुःखों का कारण है। गीता में भगवान कहते हैं --
"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥२:६२॥"
"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥२:६३॥"
अर्थात् - विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है॥
क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है॥
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संसार की वस्तुओं में दोष नहीं है, दोष तो उनके चिंतन में है। मनुष्य जीवन भर अपनी इच्छाओं के पीछे भागता रहता है। इच्छाओं की पूर्ति का सारा श्रेय मनुष्य स्वयं लेता है, और जब इच्छा की पूर्ति नहीं होती तब दोष भगवान को देने लगता है। कामनाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं।
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अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से करें। इस तरह से उठें जैसे जगन्माता की गोद में से सो कर उठ रहे हैं। प्रातः उठते ही लघुशंका आदि से निवृत होकर एक कंबल के आसन पर कमर सीधी रखते हुए पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के बैठ जाएँ। आपको हठयोग के जितने भी प्राणायाम आते हैं, थोड़ी देर वे सब प्राणायाम करें। फिर अपनी गुरुपरंपरानुसार भगवान का गहनतम ध्यान करें।
रात्रि को सोने से पहिले भगवान का गहनतम ध्यान अपनी गुरुपरंपरानुसार कर के सोएँ। इस भाव से निश्चिंत होकर सोएँ जैसे जगन्माता की गोद में सो रहे हैं।
पूरे दिन भगवान को अपनी स्मृति में रखे। यह भाव रखें कि भगवान ही आपके माध्यम से सारा कार्य कर रहे हैं। जब भूल जाएँ तब याद आते ही भगवान का स्मरण फिर से करना आरंभ कर दें। गीता के निम्न ५ श्लोकों को एक बार समझ लें --
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥६:२४॥"
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१२ सितंबर २०२५

वृद्धावस्था में सांसारिकता में न्यूनतम रुचि लो, स्वाध्याय जितना आवश्यक है उतना ही करो, और यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करो --- .

वृद्धावस्था में सांसारिकता में न्यूनतम रुचि लो, स्वाध्याय जितना आवश्यक है उतना ही करो, और यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करो ---
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किसी अन्य को तो मैं कुछ कह नहीं सकता, इसलिए स्वयं को ही कह रहा हूँ। इस समय मेरे जीवन का यह संध्याकाल है, जिसका अवसान कभी भी हो सकता है। मेरी आयु इस समय ७९ वर्ष की है। मुझे इसी समय से जीवन-पर्यंत अब नित्य यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए। दिन में सांसारिक कार्यों और स्वाध्याय के लिए दो घंटे बहुत हैं। जितना आवश्यक है उतना आराम करना चाहिए। सब कुछ सांसारिक अपने उत्तराधिकारियों को सौंप कर अब निश्चिंत हो जाना चाहिए।
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श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार हमारी भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी हो --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१३:१२॥"
अर्थात् - अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।
अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है॥
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ध्यान एक स्वभाविक अवस्था है। जप-योग का अभ्यास करते करते, ध्यान अपने आप ही होने लगता है। ओंकार और राम दोनों का फल एक ही है। पूरी सृष्टि ओंकार का यानि राम-नाम का जप कर रही है। हमें उसी को निरंतर सुनना और उसी में विलीन हो जाना है। इस आयु में उतना ही पढो जिससे प्रेरणा और शक्ति मिलती है। पढने का उद्देश्य ही प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करना है। जब परमात्मा का साथ मिल जाये तब किसी अन्य के साथ की आवश्यकता नहीं है। साथ करना ही है तो उन्हीं का करो जो हमारी साधना में सहायक हों। यही सत्संग है। साधना भी वही है, जो हमें निरंतर परमात्मा की चेतना में रखे।
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सृष्टि निरंतर गतिशील है| कहीं भी जड़ता नहीं है। जड़ता का आभास माया का आवरण है। यह भौतिक विश्व जिन अणुओं से बना है उनका निरंतर विखंडन और नवसृजन हो रहा है। यह विखंडन और नवसृजन की प्रक्रिया ही नटराज भगवान शिव का नृत्य है। वह परम चेतना जिससे समस्त ऊर्जा और सृष्टि निर्मित हुई है, वे शिव हैं। सारी आकाश-गंगाएँ, सारे नक्षत्र अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ अत्यधिक तीब्र गति से किसी न किसी की तो परिक्रमा कर ही रहे हैं, जिसका हमें ज्ञान नहीं है। यदि सृष्टि का कहीं ना कहीं कोई तो केंद्र है, वह "विष्णु-नाभि" है। जिनसे यह सारी सृष्टि निर्मित हुई है और समस्त सृष्टि को जिन्होंने धारण कर रखा है वे स्वयं विष्णु हैं।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
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इस सृष्टि की गति और प्रवाह, व उनसे निःसृत हो रही एक ध्वनी भी हम स्वयं हैं, उसी का ध्यान किया जाता है। श्रौत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध गुरु से उपदेश व आदेश लेकर बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में प्रणव की ध्वनि को सुनते हुए उसी में सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए। समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान एक देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होटी है। उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है; जिसमें स्थिति योगमार्ग की एक अति उच्च उपलब्धी है। गीता में भगवान कहते हैं --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है॥
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प्रणव मंत्र "ॐ" और तारक मंत्र "रां" दोनों का फल एक ही है। अपने विभिन्न लेखों में मैंने इस विषय पर खूब लिखा है। अब समय नहीं है। जिनका मुझसे मतभेद हैं, वे अपने मत पर स्थिर रहें। कोई आवश्यक नहीं है कि वे मुझसे सहमत ही हों।
आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन। ॐ स्वस्ति॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
४ सितंबर २०२५
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अब स्वनिर्मित एकांत में ही रहने की प्रेरणा मिल रही है। केवल यह याद रखो कि भगवान हैं, इसी समय हैं, और यहीं पर हैं। वे सर्वत्र हैं, वे सर्वदा हैं। जहां भी हम हैं, वहीं परमात्मा हैं।
आप सब में मैं परमशिव/पुरुषोत्तम को नमन करता हूँ। आप के माध्यम से मुझे जो परमात्मा का परम प्रेम मिला है, उसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ। आप परमात्मा के साकार रूप हो। इस समय तो मुझे परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी अनुभूत नहीं हो रहा है। उन्हीं की चेतना में हूँ। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ॥
बहुत ही अधिक आवश्यक होगा तभी फेसबुक पर आऊँगा, अन्यथा नहीं।
(संशोधित व पुनःप्रस्तुत) वृद्धावस्था में सांसारिकता में न्यूनतम रुचि लो, स्वाध्याय जितना आवश्यक है उतना ही करो, और यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करो ---
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किसी अन्य को तो मैं कुछ कह नहीं सकता, इसलिए स्वयं को ही कह रहा हूँ। इस समय मेरे जीवन का यह संध्याकाल है, जिसका अवसान कभी भी हो सकता है। मेरी आयु इस समय ७९ वर्ष की है। मुझे इसी समय से जीवन-पर्यंत अब नित्य यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए। दिन में सांसारिक कार्यों और स्वाध्याय के लिए दो घंटे बहुत हैं। जितना आवश्यक है उतना आराम करना चाहिए। सब कुछ सांसारिक अपने उत्तराधिकारियों को सौंप कर अब निश्चिंत हो जाना चाहिए।
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श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार हमारी भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी हो --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१३:१२॥"
अर्थात् - अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।
अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है॥
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ध्यान एक स्वभाविक अवस्था है। जप-योग का अभ्यास करते करते, ध्यान अपने आप ही होने लगता है। ओंकार और राम दोनों का फल एक ही है। पूरी सृष्टि ओंकार का यानि राम-नाम का जप कर रही है। हमें उसी को निरंतर सुनना और उसी में विलीन हो जाना है। इस आयु में उतना ही पढो जिससे प्रेरणा और शक्ति मिलती है। पढने का उद्देश्य ही प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करना है। जब परमात्मा का साथ मिल जाये तब किसी अन्य के साथ की आवश्यकता नहीं है। साथ करना ही है तो उन्हीं का करो जो हमारी साधना में सहायक हों। यही सत्संग है। साधना भी वही है, जो हमें निरंतर परमात्मा की चेतना में रखे।
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सृष्टि निरंतर गतिशील है| कहीं भी जड़ता नहीं है। जड़ता का आभास माया का आवरण है। यह भौतिक विश्व जिन अणुओं से बना है उनका निरंतर विखंडन और नवसृजन हो रहा है। यह विखंडन और नवसृजन की प्रक्रिया ही नटराज भगवान शिव का नृत्य है। वह परम चेतना जिससे समस्त ऊर्जा और सृष्टि निर्मित हुई है, वे शिव हैं। सारी आकाश-गंगाएँ, सारे नक्षत्र अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ अत्यधिक तीब्र गति से किसी न किसी की तो परिक्रमा कर ही रहे हैं, जिसका हमें ज्ञान नहीं है। यदि सृष्टि का कहीं ना कहीं कोई तो केंद्र है, वह "विष्णु-नाभि" है। जिनसे यह सारी सृष्टि निर्मित हुई है और समस्त सृष्टि को जिन्होंने धारण कर रखा है वे स्वयं विष्णु हैं।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
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इस सृष्टि की गति और प्रवाह, व उनसे निःसृत हो रही एक ध्वनी भी हम स्वयं हैं, उसी का ध्यान किया जाता है। श्रौत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध गुरु से उपदेश व आदेश लेकर बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में प्रणव की ध्वनि को सुनते हुए उसी में सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए। समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान एक देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होटी है। उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है; जिसमें स्थिति योगमार्ग की एक अति उच्च उपलब्धी है। गीता में भगवान कहते हैं --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है॥
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प्रणव मंत्र "ॐ" और तारक मंत्र "रां" दोनों का फल एक ही है। अपने विभिन्न लेखों में मैंने इस विषय पर खूब लिखा है। अब समय नहीं है। जिनका मुझसे मतभेद हैं, वे अपने मत पर स्थिर रहें। कोई आवश्यक नहीं है कि वे मुझसे सहमत ही हों।
आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन। ॐ स्वस्ति॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
४ सितंबर २०२५
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अब स्वनिर्मित एकांत में ही रहने की प्रेरणा मिल रही है। केवल यह याद रखो कि भगवान हैं, इसी समय हैं, और यहीं पर हैं। वे सर्वत्र हैं, वे सर्वदा हैं। जहां भी हम हैं, वहीं परमात्मा हैं।
आप सब में मैं परमशिव/पुरुषोत्तम को नमन करता हूँ। आप के माध्यम से मुझे जो परमात्मा का परम प्रेम मिला है, उसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ। आप परमात्मा के साकार रूप हो। इस समय तो मुझे परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी अनुभूत नहीं हो रहा है। उन्हीं की चेतना में हूँ। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ॥
बहुत ही अधिक आवश्यक होगा तभी फेसबुक पर आऊँगा, अन्यथा नहीं।
(संशोधित व पुनःप्रस्तुत) वृद्धावस्था में सांसारिकता में न्यूनतम रुचि लो, स्वाध्याय जितना आवश्यक है उतना ही करो, और यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करो ---
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किसी अन्य को तो मैं कुछ कह नहीं सकता, इसलिए स्वयं को ही कह रहा हूँ। इस समय मेरे जीवन का यह संध्याकाल है, जिसका अवसान कभी भी हो सकता है। मेरी आयु इस समय ७९ वर्ष की है। मुझे इसी समय से जीवन-पर्यंत अब नित्य यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए। दिन में सांसारिक कार्यों और स्वाध्याय के लिए दो घंटे बहुत हैं। जितना आवश्यक है उतना आराम करना चाहिए। सब कुछ सांसारिक अपने उत्तराधिकारियों को सौंप कर अब निश्चिंत हो जाना चाहिए।
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श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार हमारी भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी हो --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१३:१२॥"
अर्थात् - अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।
अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है॥
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ध्यान एक स्वभाविक अवस्था है। जप-योग का अभ्यास करते करते, ध्यान अपने आप ही होने लगता है। ओंकार और राम दोनों का फल एक ही है। पूरी सृष्टि ओंकार का यानि राम-नाम का जप कर रही है। हमें उसी को निरंतर सुनना और उसी में विलीन हो जाना है। इस आयु में उतना ही पढो जिससे प्रेरणा और शक्ति मिलती है। पढने का उद्देश्य ही प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करना है। जब परमात्मा का साथ मिल जाये तब किसी अन्य के साथ की आवश्यकता नहीं है। साथ करना ही है तो उन्हीं का करो जो हमारी साधना में सहायक हों। यही सत्संग है। साधना भी वही है, जो हमें निरंतर परमात्मा की चेतना में रखे।
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सृष्टि निरंतर गतिशील है| कहीं भी जड़ता नहीं है। जड़ता का आभास माया का आवरण है। यह भौतिक विश्व जिन अणुओं से बना है उनका निरंतर विखंडन और नवसृजन हो रहा है। यह विखंडन और नवसृजन की प्रक्रिया ही नटराज भगवान शिव का नृत्य है। वह परम चेतना जिससे समस्त ऊर्जा और सृष्टि निर्मित हुई है, वे शिव हैं। सारी आकाश-गंगाएँ, सारे नक्षत्र अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ अत्यधिक तीब्र गति से किसी न किसी की तो परिक्रमा कर ही रहे हैं, जिसका हमें ज्ञान नहीं है। यदि सृष्टि का कहीं ना कहीं कोई तो केंद्र है, वह "विष्णु-नाभि" है। जिनसे यह सारी सृष्टि निर्मित हुई है और समस्त सृष्टि को जिन्होंने धारण कर रखा है वे स्वयं विष्णु हैं।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
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इस सृष्टि की गति और प्रवाह, व उनसे निःसृत हो रही एक ध्वनी भी हम स्वयं हैं, उसी का ध्यान किया जाता है। श्रौत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध गुरु से उपदेश व आदेश लेकर बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में प्रणव की ध्वनि को सुनते हुए उसी में सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए। समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान एक देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होटी है। उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है; जिसमें स्थिति योगमार्ग की एक अति उच्च उपलब्धी है। गीता में भगवान कहते हैं --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है॥
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प्रणव मंत्र "ॐ" और तारक मंत्र "रां" दोनों का फल एक ही है। अपने विभिन्न लेखों में मैंने इस विषय पर खूब लिखा है। अब समय नहीं है। जिनका मुझसे मतभेद हैं, वे अपने मत पर स्थिर रहें। कोई आवश्यक नहीं है कि वे मुझसे सहमत ही हों।
आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन। ॐ स्वस्ति॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
४ सितंबर २०२५
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अब स्वनिर्मित एकांत में ही रहने की प्रेरणा मिल रही है। केवल यह याद रखो कि भगवान हैं, इसी समय हैं, और यहीं पर हैं। वे सर्वत्र हैं, वे सर्वदा हैं। जहां भी हम हैं, वहीं परमात्मा हैं।
आप सब में मैं परमशिव/पुरुषोत्तम को नमन करता हूँ। आप के माध्यम से मुझे जो परमात्मा का परम प्रेम मिला है, उसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ। आप परमात्मा के साकार रूप हो। इस समय तो मुझे परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी अनुभूत नहीं हो रहा है। उन्हीं की चेतना में हूँ। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ॥
बहुत ही अधिक आवश्यक होगा तभी फेसबुक पर आऊँगा, अन्यथा नहीं।
(संशोधित व पुनःप्रस्तुत) वृद्धावस्था में सांसारिकता में न्यूनतम रुचि लो, स्वाध्याय जितना आवश्यक है उतना ही करो, और यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करो ---
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किसी अन्य को तो मैं कुछ कह नहीं सकता, इसलिए स्वयं को ही कह रहा हूँ। इस समय मेरे जीवन का यह संध्याकाल है, जिसका अवसान कभी भी हो सकता है। मेरी आयु इस समय ७९ वर्ष की है। मुझे इसी समय से जीवन-पर्यंत अब नित्य यथासंभव अधिकाधिक समय तक परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करना चाहिए। दिन में सांसारिक कार्यों और स्वाध्याय के लिए दो घंटे बहुत हैं। जितना आवश्यक है उतना आराम करना चाहिए। सब कुछ सांसारिक अपने उत्तराधिकारियों को सौंप कर अब निश्चिंत हो जाना चाहिए।
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श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार हमारी भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी हो --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
"अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१३:१२॥"
अर्थात् - अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।
अध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है॥
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ध्यान एक स्वभाविक अवस्था है। जप-योग का अभ्यास करते करते, ध्यान अपने आप ही होने लगता है। ओंकार और राम दोनों का फल एक ही है। पूरी सृष्टि ओंकार का यानि राम-नाम का जप कर रही है। हमें उसी को निरंतर सुनना और उसी में विलीन हो जाना है। इस आयु में उतना ही पढो जिससे प्रेरणा और शक्ति मिलती है। पढने का उद्देश्य ही प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करना है। जब परमात्मा का साथ मिल जाये तब किसी अन्य के साथ की आवश्यकता नहीं है। साथ करना ही है तो उन्हीं का करो जो हमारी साधना में सहायक हों। यही सत्संग है। साधना भी वही है, जो हमें निरंतर परमात्मा की चेतना में रखे।
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सृष्टि निरंतर गतिशील है| कहीं भी जड़ता नहीं है। जड़ता का आभास माया का आवरण है। यह भौतिक विश्व जिन अणुओं से बना है उनका निरंतर विखंडन और नवसृजन हो रहा है। यह विखंडन और नवसृजन की प्रक्रिया ही नटराज भगवान शिव का नृत्य है। वह परम चेतना जिससे समस्त ऊर्जा और सृष्टि निर्मित हुई है, वे शिव हैं। सारी आकाश-गंगाएँ, सारे नक्षत्र अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ अत्यधिक तीब्र गति से किसी न किसी की तो परिक्रमा कर ही रहे हैं, जिसका हमें ज्ञान नहीं है। यदि सृष्टि का कहीं ना कहीं कोई तो केंद्र है, वह "विष्णु-नाभि" है। जिनसे यह सारी सृष्टि निर्मित हुई है और समस्त सृष्टि को जिन्होंने धारण कर रखा है वे स्वयं विष्णु हैं।
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
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इस सृष्टि की गति और प्रवाह, व उनसे निःसृत हो रही एक ध्वनी भी हम स्वयं हैं, उसी का ध्यान किया जाता है। श्रौत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध गुरु से उपदेश व आदेश लेकर बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में प्रणव की ध्वनि को सुनते हुए उसी में सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए। समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान एक देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होटी है। उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है; जिसमें स्थिति योगमार्ग की एक अति उच्च उपलब्धी है। गीता में भगवान कहते हैं --
"द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१५:१६॥"
इस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है॥
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प्रणव मंत्र "ॐ" और तारक मंत्र "रां" दोनों का फल एक ही है। अपने विभिन्न लेखों में मैंने इस विषय पर खूब लिखा है। अब समय नहीं है। जिनका मुझसे मतभेद हैं, वे अपने मत पर स्थिर रहें। कोई आवश्यक नहीं है कि वे मुझसे सहमत ही हों।
आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को नमन। ॐ स्वस्ति॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
४ सितंबर २०२५
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अब स्वनिर्मित एकांत में ही रहने की प्रेरणा मिल रही है। केवल यह याद रखो कि भगवान हैं, इसी समय हैं, और यहीं पर हैं। वे सर्वत्र हैं, वे सर्वदा हैं। जहां भी हम हैं, वहीं परमात्मा हैं।
आप सब में मैं परमशिव/पुरुषोत्तम को नमन करता हूँ। आप के माध्यम से मुझे जो परमात्मा का परम प्रेम मिला है, उसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ। आप परमात्मा के साकार रूप हो। इस समय तो मुझे परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी अनुभूत नहीं हो रहा है। उन्हीं की चेतना में हूँ। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ॥
बहुत ही अधिक आवश्यक होगा तभी फेसबुक पर आऊँगा, अन्यथा नहीं।
V

पिछली दो-तीन शताब्दियों में पहली बार भारत इतनी बड़ी तेजी से भौतिक प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहा है।

 पिछली दो-तीन शताब्दियों में पहली बार भारत इतनी बड़ी तेजी से भौतिक प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहा है। यह बड़े हर्ष की बात है।

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भारत ने अब सेमी-कंडक्टर और वायुयान के इंजिन भारत में स्वयं बनाने का प्रयास आरंभ कर दिया है, यह एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम है।
अब तक मशीनों के व इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के सारे पुर्जे चीन से आयात होते हैं। हम उनके लिए चीन पर पूरी तरह निर्भर हैं। मुझे चार बार चीन जाने का अवसर मिला है। चीन में यह धारणा है कि भारत का काम चीन के बिना नहीं चल सकता। भारत में जब भी चीनी सामान के बहिष्कार की बात होती थी तब चीन में उसकी हँसी उड़ाई जाती थी। चीनी लोग कहते थे कि चीनी सामान के बिना भारत एक दिन भी नहीं रह सकता। यह बात अब तक शत-प्रतिशत सत्य थी। अब लगने लगा है कि हम आत्म-निर्भर हो सकते हैं।
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दूसरी सबसे बड़ी पीड़ादायक बात है कि हम अपने उच्च अध्ययन और पारस्परिक राष्ट्रीय संवाद के लिए अङ्ग्रेज़ी भाषा का प्रयोग करते हैं। यह हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान के विरुद्ध है। भारत में एक धारणा है कि उच्च अध्ययन और पारस्परिक संवाद केवल अङ्ग्रेज़ी भाषा में ही संभव है।
मुझे अनेक बार अनेक देशों में जाने और रहने का अवसर मिला है। इस से मेरी यह मानसिक धारणा तो ध्वस्त हो गयी कि अङ्ग्रेज़ी भाषा के बिना हम नहीं रह सकते। हम पूरी तरह से अपनी भाषा का प्रयोग करने में समर्थ हों, तभी वास्तविक रूप से हम स्वतंत्र होंगे।
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अङ्ग्रेज़ी भाषा का जो वर्तमान ज्ञान हमें है उसका पूरा लाभ उठायें, क्योंकि विश्व में अमेरिकी प्रभाव के कारण अंतराष्ट्रीय व्यापार की भाषा इस समय अङ्ग्रेज़ी है। जहां जहां भी अमेरिकी प्रभाव है वहाँ वहाँ अङ्ग्रेज़ी भाषा का वर्चस्व है, अन्यत्र कहीं भी नहीं।
आप सब को धन्यवाद। ॐ तत्सत्।
कृपा शंकर
५ सितंबर २०२५

Wednesday, 10 September 2025

"हमारा एकमात्र व्यवहार परमात्मा से है।"

 "हमारा एकमात्र व्यवहार परमात्मा से है।"

युद्धभूमि में सामने शत्रु है तो, भगवान को कर्ता बनाकर बड़े प्रेम से उसका संहार/वध करो, लेकिन मन में घृणा या क्रोध न आने पाये। हमें निमित्त बनाकर भगवान ही उसे नष्ट कर रहे हैं।
मित्र है तो भगवान को ही कर्ता बनाकर उसे अपने हृदय का पूर्ण प्रेम दो। भगवान स्वयं ही सारे सगे-संबंधी, और शत्रु-मित्र के रूप में आते हैं। हमारा एकमात्र व्यवहार परमात्मा से ही है।
११ सितंबर २०२४