अति उलझन भरे प्रश्न और विचार ---
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हमने नहीं, अपितु धर्म ने हमें धारण कर रखा है, तभी हमारा अस्तित्व है। जिस दिन धर्म हमें छोड़ देगा, उस दिन हमारा कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। सत्य ही धर्म है। भगवान सत्यनारायण हैं। ॐ ॐ ॐ !!
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सन २०१४ में जब माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी भारत के प्रधानमंत्री बने, उस समय हमें अपार प्रसन्नता हुई थी। उस समय उनके भाषणों और हाव-भाव से हमें लगा था कि वे भीमराव रामजी सकपाल के भक्त एक अंबेडकरवादी हैं, और गांधी-भक्त होने का दिखावा कर रहे हैं। वे हीन भावना से ग्रस्त एक व्यक्ति लगे जो एक झूठी उच्चता का दिखावा कर रहे थे। तत्कालीन परिस्थितियों में उनसे श्रेष्ठतर कोई अन्य व्यक्ति प्रधानमंत्री पद की शोभा भी नहीं बढ़ा सकता था। अतः हमने उन्हें स्वीकार किया।
उन्होंने कुछ अभूतपूर्व कार्य बड़ी कुशलता से किए जिन्हें करने का साहस अब तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं कर पाया था। उन्होंने --
(१) देश को आतंकवाद से मुक्त कराया।
(२) देश की सशस्त्र सेनाओं के मनोबल को बढ़ाया, और सशस्त्र सेनाओं को सशक्त किया।
(३) देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया।
(४) कश्मीर को धारा ३७० से मुक्त किया।
(५) राम मंदिर के निर्माण में आ रही बाधाओं को दूर किया।
(६) भारत का और भारतीयों का सम्मान पूरे विश्व में बढ़ाया।
(७) नए संसद भवन, और नये सरकारी कार्यालयों का निर्माण कर हजारों करोड़ रुपये बचाए जो किराये के रूप में दिये जा रहे थे।
(८) चीन और पाकिस्तान के मन में एक भय उत्पन्न किया। एक लघु युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया।
(९) पाकिस्तान को तो एक भिखारी देश बना दिया।
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उनकी उपलब्धियां अभूतपूर्व थीं। इतना ही नहीं, वे अविकल्पनीय थे। उनसे श्रेष्ठतर किसी दूसरे प्रधानमंत्री की हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनके मानस में छिपा हुआ पिछड़ावाद और घोर जातिवाद निकलकर सामने आने लगा।
वे राम का नाम लेकर सत्ता में आए थे, उन्होंने अपनी छवि एक धर्मनिष्ठ की बनाई थी लेकिन वे तो सकपाल के भक्त एक अंबेडकरवादी नास्तिक निकले।
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भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामप्रसाद मुखर्जी ने की थी, बाद में उसका नाम "भारतीय जनता पार्टी" बना। यह दल पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मुख्य विचार -- "एकात्म मानववाद (Integral Humanism) और अंत्योदय पर आधारित था, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की बात करता है। उनके अनुसार मानव -- तन, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति और समाज का विकास इन चारों के समग्र संतुलन से ही संभव है। अंत्योदय की विचारधारा के अनुसार समाज की पंक्ति में सबसे नीचे और पीछे खड़े व्यक्ति का विकास पहले होना चाहिए। आर्थिक प्रगति का पैमाना सबसे ऊंचे व्यक्ति की आय नहीं, बल्कि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति होनी चाहिए। उन्होने शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार माना। उनका मानना था कि शिक्षा का व्यापार नहीं होना चाहिए और यह समाज द्वारा प्रबंधित व निःशुल्क होनी चाहिए।
चिति और विराट -- हर राष्ट्र की एक सांस्कृतिक-राष्ट्रीय मूल चेतना होती है जिसे उन्होंने 'चिति' कहा। इसके साथ समाज की शक्ति 'विराट' मिलकर देश को समृद्ध बनाती है।
धर्म और समाज -- धर्म वह है जो समाज को जोड़कर रखता है और व्यवस्थित करता है। संघर्ष की बजाय समन्वय ही जीवन का आधार होना चाहिए। यह भारतीय जनता पार्टी की मूल विचारधारा थी।
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लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय जनता पार्टी -- पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दिखाये गये मार्ग को छोड़कर भीमराव रामजी सकपाल उर्फ बाबा साहब अम्बेडकर के मार्ग पर चल पड़ी है अतः हमारा भाजपा में रहना असंभव है। हम भाजपा का त्याग इसी क्षण कर रहे हैं। रा.स्व.से.संघ की विचारधारा -- हिन्दू राष्ट्र को संगठित करना है। लेकिन अभी वर्गभेद और वर्गसंघर्ष द्वारा हिन्दू राष्ट्र को विघटित किया जा रहा है। धर्म का कहीं नाम ही नहीं लिया जा रहा है, अतः रा.स्व.से.संघ से जुड़े रहना भी असंभव है। सघ की स्थापना और प्रचार-प्रसार के पीछे भी एक ब्राह्मणत्व था, जिसका किसी भी जाति से कोई संबंध नहीं था। ब्राह्मणत्व है सर्वव्यापी निरंतर विस्तृत हो रहे ब्रह्म की अवधारणा। जो सर्वव्यापी है, और जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है, वह ब्रह्म है। जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्राह्मण है।
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जो ब्राह्मण जाति है, उसका सन १९४७ के बाद तीन बार नर-संहार हो चुका है। सबसे पहिले महाराष्ट्र में, फिर तमिलनाडु में, और फिर कश्मीर में। इसकी न तो कभी जांच हुई और न कभी कोई FIR लिखी गई। इतिहास में पहिले भी अनेक बार ब्राह्मणों का नरसंहार हो चुका है। ब्राह्मणों को अपना धर्म नहीं छोडना चाहिए। ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत कुछ पढ़ाया जा रहा है, जो उनके विरुद्ध घृणा और हिंसा को जन्म देगा।
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ब्राह्मण का धर्म है -- संध्या गायत्री, प्राणायाम और ब्रह्म का ध्यान। जब तक सृष्टि है तब तक ब्राह्मणत्व रहेगा, जब यह समाप्त होगा तो सृष्टि भी समाप्त हो जाएगी। परमात्मा को सब कुछ समर्पित कर के ब्रह्ममय होकर रहें। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
१ अक्तूबर २०२६