अब नेहरू-गांधी का युग समाप्त हो गया है। आजकल अंबेडकर का जमाना है। जीवन में सफलता के लिए उनकी पूजा आजकल की जाती है। कल को कोई और आ जाएगा।
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एक बहुत प्रसिद्ध बंगाली लेखक हुआ करते थे जिनका नाम नीरद चंद्र चौधरी (१८९७-१९९९) था। उनका शरीर भारतीय था लेकिन आत्मा विशुद्ध अंग्रेज थी। वे १०१ वर्ष की आयु पाकर ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड में मरे। वे बहुत बड़े विद्वान थे जिन्हें स्वयं के भारतीय होने पर शर्म आती थी। बंगाली लोग उन्हें "भूरा साहब" बोलते थे। उनकी अंग्रेजी और बंगाली में लिखी पुस्तकें बड़ी जबरदस्त होती थीं। एक बार पढ़ना शुरू करते ही अंत तक पूरी पढ़नी पड़ती थी। वे भारत में अंग्रेजी शासन और पश्चिमी सभ्यता के प्रबल प्रशंसक, समर्थक और प्रेमी थे। उनके द्वारा लिखी कुछ पुस्तकें मैंने भी पढ़ी हैं जो अब लगभग विस्मृत हो गई हैं।
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वे नीरद चन्द्र चौधरी -- मोहनदास करमचंद गांधी के बहुत बड़े आलोचक थे। उनके अनुसार --- "मोहनदास गांधी इस पृथ्वी पर सबसे अधिक सफल फर्जी आदमी थे।"
उन्होंने गांधी को सिर्फ मैट्रिक पास बताया था। गांधी की आगे की पढ़ाई को उन्होंने फर्जी बताया। मेरे पास उनकी लिखी हुई कोई पुस्तक अब इस समय तो नहीं है, लेकिन उनका साहित्य पढ़ा है। उन्होंने लिखा था, तो यह सत्य ही होगा।
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गांधी ने बैरिस्टर की कोई पढ़ाई नहीं की थी। उन्होंने थर्ड डिवीजन से सन १८८७ में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। उस जमाने में ब्रिटेन में बैरिस्टर बनने की कोई परीक्षा नहीं होती थी। उन्होंने एक बैरिस्टर के यहाँ नौकरी की और Bar Council का सदस्य होने के लिए आवेदन किया। उसके लिए उन्हें लंदन से मैट्रिक पास करने को कहा गया। पहले प्रयास में वे फेल हुए, और दूसरे प्रयास में थर्ड डिवीजन से पास हुए। उन्हें एक बैरिस्टर के साथ काम करने के लिए असिस्टेंट बैरिस्टर का लाइसेंस मिला। इसके बाद उन्होंने कोई पढ़ाई नहीं की, और अंग्रेजी फौज में भर्ती होकर दक्षिण अफ्रीका चले गए। वहाँ के Boar युद्ध में लड़े, और सार्जेंट के पद पर उन्नत हुए।
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अब मैं अपने अध्ययन से लिख रहा हूँ। सन १९०५ में जापान ने रूस पर आक्रमण कर युद्ध में रूस को हराकर, रूस से कोरिया और मंचूरिया छीन लिया। रूस की बहुत बुरी पराजय हुई। सुदूर-पूर्व का भी बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र रूस से जापान ने छीन लिया। सैन्ट पीटर्सबर्ग से रूसी नौसेना को भेजा गया जो अफ्रीका का चक्कर लगाकर सुंडा-जलडमरूमध्य और चीन सागर होते हुई जापान सागर में आई। वहाँ जापान ने आक्रमण कर त्सुशीमा-जलडमरूमध्य में सारी रूसी नौसेना को डुबो दिया। रूसी नौसेना का एक भी जीवित व्यक्ति नहीं बचा, रूस की पूरी हार हुई।
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भारत में इसकी बहुत बड़ी प्रतिक्रिया हुई कि जब जापान जैसा एक छोटा सा देश रूस जैसे शक्तिशाली देश को हरा सकता है तब हम भारतीय भी ब्रिटेन को हरा सकते हैं। भारत में क्रांतिकारियों के आक्रमण प्रबल होने लगे। तब अंग्रेजों को एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता हुई जो अंग्रेजों के पक्ष में अहिंसा अहिंसा कह कर भारतीय क्रांतिकारियों की धार को मंद कर सके।
उन्होने इसके लिए गांधी को चुना। गांधी को इंग्लैंड बुला कर ट्रेनिंग दी गई कि कैसे कपड़े पहिनने हैं, क्या बोलना है, आदि आदि। इस तरह पूरा प्रशिक्षण देकर गांधी को भारत भेजा गया। वे बापस दक्षिण अफ्रीका गए और वहाँ से ९ जनवरी १९१५ को भारत आए। इससे पूर्व उन्हें दक्षिण अफ्रीका में खूब जमीन और धन दिया गया। वे विशुद्ध रूप से एक वेतनभोगी अङ्ग्रेज़ी एजेंट थे। उनके साथ दो अंग्रेज़ लेखक और एक अन्य अंग्रेज़ अधिकारी रहता। हिन्दी के खरीदे हुए लेखक और अनुवादक भी रहते।
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गांधी को सबसे पहिले बिहार के चंपारण जिले में भेजा गया जहां से उनसे चंपारण का किसान आंदोलन करवाया गया जो पूरी तरह सफल तो होना ही था। उसकी सफलता से गांधी एक राष्ट्रीय नेता बने। आगे का इतिहास सभी को पता है।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
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(अब मैं लिखते लिखते थक गया हूँ। इस उम्र में अब और लिखना संभव नहीं है। हाथ मुंह धोकर अब संध्या भी करनी है। आगे की बातें आप सब को मालूम है।)
३ अक्टूबर २०२६
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