वर्तमान युग में हमारे कर्मफल तभी तक प्रभावी हैं जब तक हमारे में अहंकार और लोभ हैं। इनसे मुक्त होते ही हम जीवनमुक्त हो जाते हैं। आध्यात्मिक साधना के लिए यह युग सर्वाधिक प्रभावी है।
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राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति हमारी आध्यात्मिक यात्रा में सबसे पहला मापदंड यानि मील का पत्थर है। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही महात्मा कहलाने का अधिकारी है, क्योंकि इस स्थिति में वह महत् तत्व से जुड़ जाता है।
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हमारे कमजोर क्षणों में भगवान न केवल हमारी रक्षा करते हैं, बल्कि हमें नई ऊर्जा भी प्रदान करते हैं। भगवान ने हमें पुरुषार्थ और तप करने की शक्ति दी है, उसका उपयोग करें। कूटस्थ में परमब्रह्म का ध्यान सबसे बड़ा सकारात्मक कर्म और सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।
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एक बार अपने दुर्बल क्षणों में मैंने भगवान से अपनी रक्षा की प्रार्थना पूर्ण मनोयोग से की। अप्रत्याशित रूप से मैंने अनुभूत किया कि स्वयं हनुमान जी वीरमुद्रा में मेरे पीछे खड़े हैं, और मेरी रक्षा कर रहे हैं। सारी दुर्बलताऐं तिरोहित हो गयीं। इस का परिणाम यह हुआ कि सुषुम्नानाड़ी अपनी ब्राह्मी उपनाड़ी सहित चैतन्य हो गई, और मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र तक प्राण-प्रवाह निर्बाध रूप से होने लगे। ऐसे ही एक दिन सहस्त्रारचक्र से ऊपर का आवरण भी हट गया। सूक्ष्म जगत इतना अधिक विराट है कि उस के बारे में कुछ भी लिखना यहाँ उचित नहीं होगा। केवल एक बात जो मैं सत्यनिष्ठा से जानना चाहता था, वह अवगत हो गई, और उस दिशा में मार्गदर्शन भी मिलने लगा। अन्य कुछ जानने की इच्छा न तो है और न ही होगी।
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ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में परमब्रह्म का ध्यान ही मेरी एकमात्र साधना है और वही रहेगी। वे परमब्रह्म ही परमशिव हैं, और वे ही पुरुषोत्तम हैं। यह जीवन उन्हें समर्पित है, और कुछ भी नहीं चाहिए। पूरा मार्गदर्शन मुझे प्राप्त है, अतः कोई संशय नहीं है।
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इस संसार में अनेक विसंगतियाँ हैं। भगवान उनसे बचाकर रखें। इतना अधिक छल, कपट, असत्य, लोभ और कुटिलता है कि भगवान ही इनसे रक्षा कर सकते हैं। अन्यथा इनसे बचना मनुष्य के वश की बात नहीं है। भगवान इन सब बुराइयों से बचाकर रखें और अपने सन्मार्ग पर अग्रसर करते रहें। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
३ नवंबर २०२६