भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ।
Friday, 31 July 2026
भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ ---
संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---
संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---
सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?
प्रश्न : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?
Wednesday, 29 July 2026
जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए ---
जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए .....
क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?
क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?
विराट पुरुष का ध्यान ---
विराट पुरुष का ध्यान : -- समस्त सृष्टि की, और उस से भी परे की, यह विराट अनंतता -- हमारा शरीर है। ये सारी आकाश-गंगाएँ, अपने ग्रहों-उपग्रहों सहित सारे नक्षत्र, हमारी ही विराट देह के भाग हैं। हम यह विराट-पुरुष हैं, कोई भौतिक देह नहीं। उसी विराट-पुरुष का सदा गुरु प्रदत्त विधि से ध्यान करो, उसी की उपासना करो, और उसी में स्थित रहो।
आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---
आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---
एकमात्र कर्ता भगवान स्वयं हैं।
साधना में कर्ताभाव कभी भी नहीं आना चाहिए ---
जब तक मैं इस देह की चेतना में हूँ, तब तक एक विदेशी भूमि में अजनबी हूँ ---
जब तक मैं इस देह की चेतना में हूँ, तब तक एक विदेशी भूमि में अजनबी हूँ। मेरा वास्तविक निवास परमात्मा की सर्वव्यापकता है। मैं यह शरीर नहीं, शाश्वत आत्मा हूँ, जिसने अपने कर्मफलों को भोगने के लिए यह जन्म लिया है। जिस दिन ये प्रारब्ध कर्म कट जाएँगे, उस दिन यह शरीर भी अपने आप ही छूट जाएगा। इस भव-सागर में अमृत और विष दोनों साथ-साथ हैं। मंथन का अधिकार प्रभु ने हम को ही दिया है। हम विषपान करें या अमृतपान -- यह हमारी ही स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर है। प्रकृति हमें उसी के अनुसार फल देती है। प्रभु ने हमें विवेक दिया है, ताकि हम उचित निर्णय ले सकें।
Tuesday, 28 July 2026
भगवान की उपासना ---
भगवान की उपासना ---
भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? .
भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है?
"कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो" >>>
जब मैं स्वयं के व्यक्तित्व का अवलोकन करता हूँ तब स्वयं में अपूर्णता ही अपूर्णता पाता हूँ। पूर्णता सिर्फ परमात्मा में है। उस पूर्णता को पाने के लिए ही हमें परमात्मा की आवश्यकता है। अपूर्णता बड़ी दुःखदायी है। इसे दूर करने का जो उपाय भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के छठे अध्याय में बताया है वह देखने में तो बड़ा कठिन है, लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं है। भगवान हमें सब कामनाओं से निःस्पृह होकर अपने ही स्वरूप में स्थित होने को कहते हैं --
Monday, 27 July 2026
स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---
स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---
श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं ---
इंग्लैंड के बारे में मेरी एक भविष्यवाणी
कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---
कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---
स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त करें ---
स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त करें ---
.यह बात मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव से लिख रहा हूँ कि इस समय परमात्मा की एक विशेष कृपा हम सभी मनुष्यों पर है। हमारा लोभ और अहंकार हमें इसकी अनुभूति नहीं होने देता। जब तक हम स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त नहीं करते, तब तक उनकी कृपा की अनुभूति हमें नहीं हो सकती।
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हम भगवान से अपने लोभ और अहंकार की पूर्ति के लिए ही ही प्रार्थना करते हैं। ऐसी प्रार्थना हमें और भी अधिक बंधनों में बांधती है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें अपनी चेतना में वीतराग होना पड़ेगा। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति को वीतरागता कहते हैं। परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए हमें स्थितप्रज्ञ होना होगा। हमारी प्रज्ञा परमात्मा में निरंतर स्थित हो, इसे स्थितप्रज्ञता कहते हैं।
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परमात्मा की गहन और दीर्घ ध्यान-साधना --- सूक्ष्म जगत में प्रवेश का पासपोर्ट है। यह भौतिक जगत तो बहुत छोटा है। सूक्ष्म जगत बहुत अधिक विराट है। हमारी सर्वप्रथम आवश्यकता परमात्मा के प्रति एक अहैतुकी परमप्रेम (भक्ति) की जागृति है, फिर आगे के द्वार खुलते हैं। हम रुपया-पैसा और भोग-विलास की सामग्री प्राप्त करने की ही प्रार्थना भगवान से करते हैं, और दूसरों को ठगते हैं, --- यह हमारा लोभ है जो नर्क का मुख्य द्वार है। दूसरों को ठगने के लिए हम भगवान को अपना सहभागी (Partner) बनाने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं, लेकिन हमें यह पता नहीं होता कि हम उनसे स्वयं को नर्क में डालने की ही प्रार्थना कर रहे हैं।
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नित्य सायं और प्रातः, यदि हो सके तो हर समय प्रेमपूर्वक भगवान का स्मरण करें, उन्हें अपनी चेतना में निरंतर रखें, और उन्हें अपने जीवन की हरेक क्रिया का कर्ता बनायें। उनकी कृपा निश्चित रूप से होगी। आप सब जन्मजात महान आत्माओं को नमन !!
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२४
Sunday, 26 July 2026
स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---
स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---
Saturday, 25 July 2026
मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...
मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...
"भक्ति" के बिना ये चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मेरे लिए तो बेकार हैं क्योंकि ये मुझे अपने प्रियतम से नहीं मिला सकते|
"भक्ति" के बिना ये चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मेरे लिए तो बेकार हैं क्योंकि ये मुझे अपने प्रियतम से नहीं मिला सकते|