Friday, 31 July 2026

भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ ---

 भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ।

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वेदान्त की अधिष्ठात्री भगवती छिन्नमस्ता का आज अनायास ही आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। उन्होंने कामदेव व उनकी पत्नी रति को अपने पैरों में पटक रखा है, और उन पर खड़ी हैं। यह कामवासना पर विजय का संदेश है। उन्होने अपने स्वयं के सिर को काट रखा है, यह अहंकार पर विजय का संदेश है। उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएँ निकल रही हैं। मध्यम धारा जो सुषुम्ना की प्रतीक है, का पान वे स्वयं कर रही हैं। बाईं ओर डाकिनी शक्ति है जो अत्यधिक भयंकर, विकराल और महाबलशाली है। भगवती के दाहिने ओर वर्णिनी शक्ति है जो है तो महाबलशाली, लेकिन विकराल नहीं है। माँ की साधना का अधिकारी वही है जिसने कामवासना और अहंकार पर विजय प्राप्त कर ली है। माँ की साधना साधक को सर्व सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।
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जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, पता नहीं उनका नाम "काली" क्यों रख दिया? सृष्टि की रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ महाकाली ही है। सृष्टि, स्थिति और संहार उन की एक अभिव्यक्ति मात्र है। यह संहार नकारात्मक नहीं है। यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है। सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता, मात्र रूपांतरित होता है। यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है। माँ प्रेम और करुणामयी है। माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है। उनकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है, वह प्रतीकात्मक है ---
"माँ के विग्रह में चार हाथ है। अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है, और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है। माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक हैं। ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं। माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं। यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं। माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं। माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है, क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है। किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है। माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है। उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य की अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं। माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं। माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं। उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं। उनकी लीला में एक पैर भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है। माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है।"
माँ, मुझे आत्म-विस्मृति रूपी मृत्यु में मत जाने दो। मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए।
कृपा शंकर
१ अगस्त २०२३

संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---

 संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---

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हम संसार में जन्म लेते हैं, तब से भौतिक मृत्यु तक समस्याएँ ही समस्याएँ हमारे समक्ष रहती हैं। जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं है जिसमें समस्याएँ न हों। अपनी किशोरावस्था में मैं समझता था कि मनुष्य की भौतिक दरिद्रता ही जीवन की सबसे बड़ी समस्या है। बाद में युवावस्था में अनुभव किया कि आध्यात्मिक दरिद्रता ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। भौतिक जीवन की इस वृद्धावस्था में मैं यह बात निज जीवन के पूर्ण अनुभव से कहता हूँ कि आध्यात्मिक दरिद्रता ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। उस से बड़ी कोई अन्य समस्या नहीं है।
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इसका कोई सार्वजनिक व सार्वभौमिक निदान नहीं है। हर व्यक्ति को अपना उत्तर स्वयं पाना होता है। पूर्ण निष्ठा से भगवान से प्रार्थना करेंगे तो इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा कि हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग कौन सा है। एक ही मार्ग सबके लिए नहीं हो सकता। हम अपनी पूर्ण निष्ठा से भगवान से मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करें, भगवान से उत्तर अवश्य प्राप्त होगा।
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मेरा निजी व्यक्तिगत मत तो यह है कि हर परिवार में शिवपूजा और गीता पाठ नित्य होना चाहिए। यह उपाय सब के लिए नहीं हो सकता। महात्माओं के मुख से सुना है कि अपनी अपनी कुलदेवी की नित्य आराधना करनी चाहिए। भगवान के अपने अपने इष्ट रूप की नित्य नियमित आराधना और मार्ग-दर्शन की प्रार्थना करें। ३१ जुलाई २०२३

सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?

 प्रश्न : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?

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उत्तर : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं, वह है -- भगवान का ध्यान, ------ क्योंकि इस से हमारे माध्यम से भगवान के प्रकाश यानि सतोगुण की वृद्धि होती है, और तमोगुण का ह्रास होता है।
हमारा उद्गम भगवान से हुआ है, और हमारा लक्ष्य भी भगवान की प्राप्ति है। यह सृष्टि का चक्र है। समाज की सब बुराइयों का कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता है। भगवान का नित्य नियमित ध्यान ही हमारे जीवन में तमोगुण का ह्रास कर सकता है, सतोगुण में वृद्धि करता है, और अंततः हमें त्रिगुणातीत बनाकर भगवान की प्राप्ति कराता है, जिसे हम आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) कहते हैं।
इस विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता में बहुत स्पष्ट और सरल मार्गदर्शन है। सारे निगमागम ग्रंथ भी यही कहते हैं।
इसमें आवश्यकता है भगवान के प्रति परमप्रेम (भक्ति) जागृत करने की, जिसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। जब परमप्रेम जागृत हो जाये, तब भगवान का निरंतर स्मरण, नामजप और निदिध्यासन करें। उसके पश्चात ध्यान अपने आप ही होने लगता है। भगवान निश्चित रूप से सब भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं, कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। भटकाव तभी आता है जब हमारे मन में छल-कपट होता है। भगवान कहते हैं --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
और --
"सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥"
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भगवान ने हम सब को विवेक दिया है, उस विवेक से हम इतना सब तो समझ ही सकते हैं। मैं अपनी बात के समर्थन में उपनिषदों, गीता, व अन्य ग्रन्थों से चाहे जितने संदर्भ दे सकता हूँ, लेकिन उनकी आवश्यकता नहीं है।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ अगस्त २०२२

Wednesday, 29 July 2026

जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए ---

 जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए .....

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देश और समाज की एकता व सामाजिक सद्भाव के लिए सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख अत्यधिक कठोरता से प्रतिबंधित होना चाहिएा जातिवाद देश पर कलंक, और धर्म-विरुद्ध है| हिंदुओं के लिए जातिवाद वेद-विरुद्ध है, इसलिए त्याज्य है|
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जातिवाद का आरंभ उस काल में हुआ था जब भारत पर स्थल मार्ग से अरब, फारस और मध्य एशिया के विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण आरंभ हुए, और जल मार्ग से पूर्तगालियों के| उस से पूर्व कोई जातिवाद नहीं था| उस समय यह अपनी रक्षा के लिए बनाई गई अस्थायी व्यवस्था थी जो दुर्भाग्य से कालांतर में स्थायी हो गई|
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भारत के वर्तमान संविधान में सैंकड़ों जातियों का उल्लेख है और संविधान ही जातियों के आधार पर आरक्षण देकर जातिवाद को बढ़ावा देता है| किसी भी हिन्दू धर्म-ग्रंथ में जातियों का उल्लेख नहीं है| भारत में गुण और कर्मों के आधार पर वर्ण-व्यवस्था मात्र थी जो स्वाभाविक है|
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः|
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्||४:१३||"
अर्थात .... गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है| यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो||.
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मूल मनुस्मृति में कहीं भी जातिप्रथा का उल्लेख नहीं है| जो लोग मनुस्मृति को गालियाँ देते हैं, यह उनकी विकृत और कुटिल मानसिकता है| मनुस्मृति वेदों पर आधारित है जहाँ सिर्फ वर्णों का ही गुण-कर्मों के आधार पर उल्लेख है| मनुस्मृति में कहीं पर भी किसी जाति का उल्लेख नहीं है|
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विदेशी आक्रान्ताओं ने विशेषकर अंग्रेजों ने अपने वेतनभोगी मेक्समूलर जैसे पादरियों से हिंदुओं के धर्मग्रंथों को प्रक्षिप्त और विकृत करवाया, शूद्रों पर अत्याचारों की झूठी कथाएँ लिखवाईं और मूल धर्म-ग्रंथों को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया| भगवान की कृपा से ब्राह्मणों ने उन्हें रट रट कर याद कर लिया, इसलिए धर्म-ग्रंथ बच गए, अन्यथा सारे धर्म-ग्रंथ लुप्त हो जाते|
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२०

क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?

 क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?

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ऐसा पुरुष तो देवताओं में भी नहीं मिलेगा जिसमें सारे गुण हों, और कोई अवगुण न हो। एकमात्र ऐसे पुरुष जिन्होंने कभी इस पृथ्वी पर भ्रमण किया है, तो वे भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ही थे। उनसे श्रेष्ठ कोई दूसरा पुरुष कभी नहीं हुआ। वे ही हमारे एकमात्र आदर्श हो सकते हैं। हम उन्हीं का ध्यान करें, और अपने निज जीवन में अवतरित कर उन्हें व्यक्त करें।
आज के भारत में नराधम राक्षसों ने अधर्म और अनाचार फैला रखा है। हमें आवश्यकता है एक नई व्यवस्था के लिए ब्रह्मतेजोमय भगवन वेदव्यास जैसे व्यक्तित्व की, भगवन राम जैसे शासक की, और देवर्षि नारद जैसे मार्ग दर्शकों की। भगवान भारतभूमि का कल्याण करें। हृदय की यह एक बहुत घनी पीड़ा थी, जो आज व्यक्त हो गई। और लिखने को कुछ नहीं है। भगवान हमारे जीवन में हों, और हर क्षण उनकी अभिव्यक्ति हो।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३० जुलाई २०२२
पुनश्च: -- साथ तो दूर की बात है, जिन के हृदय में भगवान नहीं है, और जिन के हृदय में छल-कपट भरा पड़ा है, ऐसे लोगों का दर्शन होना भी मैं अपना बहुत बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ। अब तो मन में भगवान के सिवाय अन्य कोई विचार आता ही नहीं है।

विराट पुरुष का ध्यान ---

विराट पुरुष का ध्यान : -- समस्त सृष्टि की, और उस से भी परे की, यह विराट अनंतता -- हमारा शरीर है। ये सारी आकाश-गंगाएँ, अपने ग्रहों-उपग्रहों सहित सारे नक्षत्र, हमारी ही विराट देह के भाग हैं। हम यह विराट-पुरुष हैं, कोई भौतिक देह नहीं। उसी विराट-पुरुष का सदा गुरु प्रदत्त विधि से ध्यान करो, उसी की उपासना करो, और उसी में स्थित रहो।

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हंसः योग (अजपा-जप) करते रहो। कुंभक की अवधि में विराट-पुरुष का और भी गहरा ध्यान करो। फिर अनाहत नाद के रूप में प्रणव की ध्वनि के साथ निदिध्यासन करते रहो। अपनी चेतना को भौतिक देह से जितने अधिक समय तक हो सके बाहर ही रखो। बीच बीच में अपने भौतिक शरीर को भी देख लो और यह भाव करो की में यह भौतिक शरीर नहीं, विराट पुरुष हूँ।
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घनीभूत प्राण-ऊर्जा (कुंडलिनी) जागृत हो जाये तो उसे बार-बार परमशिव को अर्पित करते रहो। इस विराटता से परे का अस्तित्व "परमशिव" है। पूर्ण रूपेण परमशिव को समर्पित होकर उनसे एकाकार होना ही हमारी उपासना का लक्ष्य है। साधनाकाल में ब्रह्मचर्य (ब्रह्म जैसे आचार-विचार) अपेक्षित हैं।
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"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ नमः शिवाय !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
३० जुलाई २०२२

आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---

 आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---

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श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया, तदानुसार रविवार ३१ जुलाई २०२२ को हरियाली तीज का पर्व है जो पूरे राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में, और पूरे भारत में आप्रवासी राजस्थानी महिलाओं द्वारा बहुत श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। कल द्वितीया यानि ३० जुलाई २०२२ के दिन सिंजारा है। इन पर्वों पर भारत की समस्त मातृशक्ति को हार्दिक अभिनन्दन और शुभ कामनाएँ।
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सभी माताएँ, बहिनें और बेटियाँ मेंहदी अवश्य मंडवाएँ। यदि घर के आसपास सुविधा हो तो झूला भी खूब झूलें। किसी नीम के पेड़ की मोटी डाल पर मोटी मजबूत रस्सी से झूला बंधवायें, और झूले पर बैठने के लिए खाती (बढ़ई) से लकड़ी का एक पाटा बनवा लें। उस पर बैठकर या खड़े होकर अकेले या जोड़े से खूब झूला झूलें -- इसे मारवाड़ी भाषा में पील मचकाना बोलते हैं। घर पर महिलाएं ही मिलकर सामूहिक नृत्य भी खूब करें। नवविवाहित महिलाएँ अपने मायके जाकर यह त्योहार मनाएँ।
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जिन लड़कियों की सगाई हो जाती है, उन्हें अपने होने वाले सास-ससुर से दूज के दिन सिंजारा मिलता है। इसमें मेहँदी, लाख की चूड़ियाँ, कपड़े (लहरिया), मिठाई - विशेषकर घेवर शामिल होता है।
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विवाहित महिलाओं को भी अपने पति, रिश्तेदारों एवं सास-ससुर से उपहार मिलते हैं। पुरुषों को चाहिए कि वे घर की महिलाओं को उनकी मनपसंद मिठाई आदि अवश्य खिलाएँ।
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महिलाओं के मुँह से सामूहिक मंगल गीत बहुत मधुर लगते हैं। राजस्थान में तीज के त्यौहार का विशेष महत्व है। जयपुर में तो यह त्यौहार बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है व राजस्थान के सभी नगरों में तीज की सवारी निकाली जाती है। हर स्थान पर एक सांस्कृतिक वातावरण हो जाता है। अपनी संस्कृति और गौरव को ना भूलें।
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मान्यता है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने बहुत कठोर तप किया था। जब भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तभी से इस व्रत का आरंभ हुआ। तीज माता के रूप में पार्वती की आराधना होती है।
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जय सनातन भारतीय संस्कृति, जय सनातन धर्म, जय माँ भारती॥
कृपा शंकर
२९ जुलाई २०२२

एकमात्र कर्ता भगवान स्वयं हैं।

 साधना में कर्ताभाव कभी भी नहीं आना चाहिए ---

एकमात्र कर्ता भगवान स्वयं हैं। हम तो एक साक्षी निमित्त मात्र हैं। अपनी साधना वे स्वयं कर रहे हैं। हमारे माध्यम से साँसें भी वे ही ले रहे हैं। हमारी हर गतिविधि के पीछे वे स्वयं हैं। हर समय उनका स्मरण रहे। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् - इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
ॐ तत्सत् !!
२९ सितंबर २०२३

जब तक मैं इस देह की चेतना में हूँ, तब तक एक विदेशी भूमि में अजनबी हूँ ---

 जब तक मैं इस देह की चेतना में हूँ, तब तक एक विदेशी भूमि में अजनबी हूँ। मेरा वास्तविक निवास परमात्मा की सर्वव्यापकता है। मैं यह शरीर नहीं, शाश्वत आत्मा हूँ, जिसने अपने कर्मफलों को भोगने के लिए यह जन्म लिया है। जिस दिन ये प्रारब्ध कर्म कट जाएँगे, उस दिन यह शरीर भी अपने आप ही छूट जाएगा। इस भव-सागर में अमृत और विष दोनों साथ-साथ हैं। मंथन का अधिकार प्रभु ने हम को ही दिया है। हम विषपान करें या अमृतपान -- यह हमारी ही स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर है। प्रकृति हमें उसी के अनुसार फल देती है। प्रभु ने हमें विवेक दिया है, ताकि हम उचित निर्णय ले सकें।

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मेरे जीवन का लक्ष्य परमशिव (ब्रह्म) को व्यक्त करना है। यही मेरा स्वधर्म है। हर कार्य के कर्ता और भोक्ता -- भगवान स्वयं हैं। मैं तो एक निमित्त-मात्र, उनकी पूर्णता, परमप्रेम, व आनंद हूँ। मेरे आदर्श भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण हैं। वेदवाक्य ही मेरे लिए अंतिम प्रमाण हैं। लौकिक रूप से मैं सनातनी हिन्दू ब्राह्मण हूँ। विधिवत रूप से मेरा शास्त्रों का कोई अध्ययन नहीं है, लेकिन जितना आवश्यक है, उतने का ज्ञान भगवान की कृपा से है।
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प्रातःकाल मैं जब उठता हूँ, तब भगवान श्रीकृष्ण की चेतना में ही उठता हूँ। उठते ही उनका ध्यान करना पड़ता है। पूरे दिन उनकी स्मृति बनी रहती है। ऐसा लगता है कि वे निरंतर मेरे साथ हैं। एक क्षण के लिए भी वे दूर नहीं होते। हृदय प्रेम से भरा रहता है। रात्री को भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किये बिना नींद नहीं आती। उनका ध्यान करना ही पड़ता है। भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं, मैं नहीं। जब भगवान स्वयं ही यह जीवन हैं, तब किसी से कुछ भी अपेक्षा नहीं है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जुलाई २०२३

Tuesday, 28 July 2026

भगवान की उपासना ---

 भगवान की उपासना ---

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भगवान की "उपासना" पूर्ण भक्तिपूर्वक "जपयोग" से आरंभ करनी चाहिए। "जप" करते-करते "निदिध्यासन" अपने आप होने लगता है। "निदिध्यासन" करते-करते "ध्यान" भी अपने आप ही लग जाता है। "ध्यान" के लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता। सीधे ही जब "ध्यान" करने का प्रयास करते हैं, तब "विक्षेप" आये बिना नहीं रहता। माया के दो ही अस्त्र हैं -- "आवरण" और "विक्षेप", जिनसे वह संसार को भटकाती है। आवरण है "अज्ञान", और विक्षेप है "भटकाव"।
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एक सामान्य साधक के हृदय में जब भगवान के प्रति "परमप्रेम" (भक्ति) जागृत हो, तब उसे भगवान के भौतिक या मानसिक साकार विग्रह के समक्ष खूब नाम "जप" करना चाहिए। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है --
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१०::२५॥"
अर्थात् -- " मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ॥"
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नाम "जप" करते-करते "निदिध्यासन" होने लगता है, जो "उपासना" का सबसे अधिक प्रभावशाली अंग है जिसके बिना "भक्ति" क्षीण होने लगती है। जब एक बर्तन से दूसरे बर्तन में तेल डालते हैं, तब तेल की धार खंडित नहीं होती। उसी तेल की धार की तरह अखंड अविछिन्न रूप से भगवान के स्मरण, चिंतन, मनन और श्रवण को "निदिध्यासन" कहते हैं।
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"भक्ति" शब्द का एकमात्र अर्थ -- "भगवान से परम प्रेम" है। कोई दूसरा अर्थ नहीं है। भक्ति में कोई शर्त या माँग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है। भगवान एक अनुभूति है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। विष्णु-पुराण में ही एक स्थान पर "भगवान" को परिभाषित किया गया है, जिसकी व्याख्या अनेक स्वनामधान्य महान आचार्यों ने की है। जब भगवान से प्रेम होता है, तब सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं। भगवान सब सिद्धांतों से ऊपर हैं, और किसी भी सिद्धांत के बंधन में नहीं हैं। परमात्मा को पाने का मार्ग बताकर उनकी अनुभूति करा देना सद्गुरु का काम है। शिष्य को भी शिष्यत्व की पात्रता विकसित करनी पड़ती है, अन्यथा सद्गुरु भी कोई सहायता नहीं कर सकता।
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भगवान के समीप बैठना, उनकी "उपासना" है। स्वयं की पृथकता के बोध को भूलकर सिर्फ परमात्मा की चेतना में स्थिति "ध्यान" है। गीता में बताई हुई समत्व में स्थिति का नाम "समाधि" है। भगवान से जब परमप्रेम होता है, तब सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते है, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता, सारे दीप अपने आप जल जाते हैं। सारा "ज्ञान" भी स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, और सारे गुण भी पीछे-पीछे चलने लगते हैं।
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हो सकता है कि आध्यात्मिक साधना पर यह मेरा अंतिम लेख हो। अब मेरे इस शरीर-महाराज की क्षमता बहुत कम हो गई है, और निरंतर कम होती जा रही है। इससे अधिक लिखना अब संभव नहीं होगा। इस शरीर महाराज को धन्यवाद देता हूँ, कि इस जीवन की लोकयात्रा में इसने मेरा बहुत अच्छा साथ दिया है। इस संसार में मेरा परिचय इस शरीर-महाराज के रूप में ही है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं एक नित्य-मुक्त-शाश्वत् आत्मा हूँ, जिसका एकमात्र शाश्वत संबंध सिर्फ परमात्मा से है।
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इस छल-कपट और झूठ से भरे संसार में रहने की अब और जरा सी भी रुचि नहीं रही है। इससे अधिक लिखना अब संभव नहीं होगा। मैं अकेला हूँ, कोई सहायक साथी भी नहीं है; और स्वयं साक्षात् परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का कोई सहारा/आश्रय नहीं है। भगवान की परम कृपा है कि वे हर समय मेरे साथ रहते हैं, एक क्षण के लिए भी साथ नहीं छोड़ते। उन्हें भी मुझसे प्रेम हो गया है।
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आप सभी महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२२

भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? .

 भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है?

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उपरोक्त विषय पर मैं आप के विचार जानना चाहता हूँ। विश्व के घोर नास्तिक मार्क्सवादियों के विचार मैंने पढ़े हैं।
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भारत में कुछ वर्ष पहिले तक हिन्दी भाषा में "सरिता" नामक एक पाक्षिक पत्रिका निकलती थी जिसके सम्पादकीय और मुख्य लेख सनातन हिन्दू धर्म के घोर विरोध में लिखे जाते थे। उस पत्रिका को खोलते ही मुख्य लेख वेदों की निंदा, रामचरितमानस की निंदा, और सारे सनातनी हिन्दू रीति-रिवाजों की निंदा से भरे होते थे। कुछ रोचक कहानियाँ, और अन्य रोचक सामग्री भी होती थी। आश्चर्य की बात यह है की उस पत्रिका के पाठक भी सब हिन्दू ही होते थे। उस पत्रिका ने हिन्दू धर्म की बहुत अधिक हानि की। बहुत बड़ी संख्या में असंख्य हिन्दू उसे पढ़कर नास्तिक और धर्मद्रोही हो गए थे।
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जब मार्क्सवाद अपने चरम शिखर पर था, उस काल में और उसके बाद में भी मैंने कई मार्क्सवादी देशों का भ्रमण किया है, जहाँ ईश्वर की आराधना की सजा मृत्युदंड थी। वहाँ के लोगों का खोखला जीवन भी देखा है। अनेक मुस्लिम और ईसाई देशों का भ्रमण भी मैंने किया है और उनका खोखला जीवन भी देखा है।
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इन सब अनुभवों के पश्चात मेरे निजी व्यक्तिगत जीवन का केन्द्रबिन्दु तो भगवान हो गए हैं। सोशियल मीडिया पर मैं भगवान के बारे में कुछ लिख देता हूँ, और बहुत सीमित संख्या में बहुत कम ऐसे मित्र हैं जिन से आध्यात्मिक विषयों पर कुछ चर्चा हो जाती है। लेकिन भारत में ही आम आदमी से भगवान की चर्चा करना बड़ा खतरनाक है। किसी से भगवान की बात कर लो तो वह व्यक्ति बड़ा आक्रामक हो जाता है, और खाने को आता है।
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कहने को तो भारत एक धर्म-प्रधान देश है लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के कारण ईसाई मूल्यों का प्रभाव बहुत अधिक है। भगवान के साथ व्यापार अधिक है और भक्ति बहुत कम है। धन्य हैं अनेक हिन्दू धर्म-प्रचारक जो हर तरह के असहयोग के पश्चात भी अपने धर्म पर अडिग हैं।
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कृपया अपने विचार बताने की कृपा करें की हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? क्या भगवान के बिना हमारा काम नहीं चल सकता?
धन्यवाद और मंगलमय शुभ कामनाएँ।
२८ जुलाई २०२३

"कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो" >>>

 जब मैं स्वयं के व्यक्तित्व का अवलोकन करता हूँ तब स्वयं में अपूर्णता ही अपूर्णता पाता हूँ। पूर्णता सिर्फ परमात्मा में है। उस पूर्णता को पाने के लिए ही हमें परमात्मा की आवश्यकता है। अपूर्णता बड़ी दुःखदायी है। इसे दूर करने का जो उपाय भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के छठे अध्याय में बताया है वह देखने में तो बड़ा कठिन है, लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं है। भगवान हमें सब कामनाओं से निःस्पृह होकर अपने ही स्वरूप में स्थित होने को कहते हैं --

"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥६:१८॥"
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हमें बाह्य चिन्तन को छोड़कर केवल आत्मा में ही स्थित रहने का आदेश भगवान देते हैं। आत्मा में स्थित होने की पात्रता तभी आती है जब हम सब भोगों की लालसा से निःस्पृह यानि निष्काम हों। तृष्णाओं के नष्ट होने पर ही चित्त निष्काम होकर आत्मा में स्थिर होता है। फिर कोई विक्षेप नहीं आता। भगवान "सर्वकामेभ्यो निःस्पृहः" होने को कहते हैं, अर्थात् कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो।
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भगवान आगे कहते हैं --
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥६:१९॥"
इसका भावार्थ होगा कि जैसे वायुरहित स्थान में रखे हुये दीपक की लौ विचलित नहीं होती, वैसी ही हमारे चित्त की गति हो।
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हे प्रभु, आपकी जय हो। मैं कभी तत्व से विचलित न होऊँ, सदा निरंतर आप में स्थित रहूँ, और विषय-वासनाओं का चिंतन भूल से भी न हो।
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"नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा |
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे,
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ||"
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२३

Monday, 27 July 2026

स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---

 स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---

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चारों ओर छाये हुए असत्य के अति घने भयावह अंधकार को दूर करने का एक ही उपाय है -- "स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ।" किसी अन्य से कोई अपेक्षा मत करो, कोई दूसरा नहीं आयेगा। जिन सत्यनिष्ठ व्यक्तियों के हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम, श्रद्धा, और विश्वास है, उनका मार्ग-दर्शन, और उनकी रक्षा - किसी न किसी माध्यम से भगवान स्वयं करते हैं। भगवान ने वचन दिया है --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥"
(वाल्मीकि रामायण ६/१८/३३).
अर्थात जो एक बार भी शरणमें आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कहकर मेरे से रक्षा की याचना करता है, उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ -- यह मेरा व्रत है। जब भगवान ने स्वयं इतना बड़ा आश्वासन दिया है, तब भय किस बात का? हम स्वयं राममय बनें।
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भगवान तो स्वयं ही हमारे हृदय में बिराजना चाहते हैं, अतः उनसे कुछ मांगना क्या उनका अपमान नहीं है? उनसे दूरी तो हमने ही बना रखी है। क्यों न हम उन्हें स्वयं में प्रवाहित होने दें? रात्री को सोने से पूर्व भगवान का गहनतम ध्यान कर के ही सोयें, वह भी इस तरह सोयें जैसे माता की गोद में निश्चिन्त होकर एक शिशु सो रहा है। प्रातः वैसे ही उठें जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद से उठ रहा है। उठते ही एक गहरा प्राणायाम कर के कुछ समय के लिए फिर से भगवान का ध्यान करें। दिवस का प्रारम्भ सदा भगवान के ध्यान से होना चाहिए। दिन में जब भी समय मिले, भगवान का फिर ध्यान करें। उनकी स्मृति निरंतर बनी रहे। यह शरीर चाहे नष्ट होकर छूट जाए, पर परमात्मा की स्मृति कभी न छूटे। भगवान सदा हमारे साथ हैं, और हर समय हमारी रक्षा कर रहे हैं।
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जीवन और मृत्यु से परे हम सदा भगवान के साथ एक हैं, और एक ही रहेंगे। हम यह भौतिक देह नहीं, उन की अनंतता और परम प्रेम हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२१

श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं ---

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श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं। जिनमें सतोगुण प्रधान है, उन्हें ही भक्तियोग और ज्ञानयोग की बातें समझ में आयेंगी। जिन में रजोगुण प्रधान है, वे सिर्फ कर्मयोग को ही समझ पायेंगे। जिन में तमोगुण प्रधान है, वे कभी भी किसी भी परिस्थिति में गीता को नहीं समझ पायेंगे। उनके लिए यह "जैसे को तैसा" करने से अधिक कुछ भी नहीं है।
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ऐसे ही आध्यात्म में प्रवेश सिर्फ उन्हीं का हो सकता है जिनमें सतोगुण प्रधान है। जिनमें रजोगुण प्रधान है वे जप-तप तो कर सकते हैं, लेकिन ध्यान-साधना उन्हें सिद्ध नहीं होगी। जिनमें तमोगुण प्रधान है वे बाहरी पूजा-पाठ ही कर सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।
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ब्रह्मज्ञान/ वेदान्त का विषय तो सिर्फ अति उच्च स्तर के विरक्त संत-महात्माओं और साधकों के लिए ही है, सामान्य व्यक्ति के लिए नहीं। कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं।
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ऐसे ही भक्ति (भगवान से परमप्रेम) की बातें तो सभी करते हैं, लेकिन दो लाख में से कोई एक व्यक्ति ही भक्त होता है। भक्ति के नाम पर जो कुछ भी होता है, वह भगवान की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि उनके माध्यम से उनके ऐश्वर्य (सामान) की प्राप्ति के लिए होता है। भगवान तो एक साधन हैं जिनके माध्यम से सांसारिक उपलब्धियाँ/वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं। उसी को लोग भक्ति बोलते हैं। भक्त की पात्रता क्या होती हैं, इसे हमारे धर्मग्रन्थों में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है, लेकिन कोई समझना नहीं चाहता। याचक (भिखारी) बनना कोई भक्ति नहीं है। गीता में इसे व्यभिचार बताकर, अव्यभिचारिणी अनन्य भक्ति की बात कही गई है।
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सभी भगवान के भक्त बनें, सभी में उसकी पात्रता हो, इसी मंगल कामना के साथ भगवान श्रीहरिः को नमन॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२२

इंग्लैंड के बारे में मेरी एक भविष्यवाणी

 

✔️ इंग्लैंड के बारे में मेरा यह मानना है कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जिस दिन पश्चिमी एशिया और उत्तरी-पश्चिमी अफ्रीका से आये जन-समूहों द्वारा प्रायः अधिकांश अंग्रेज पुरुषों को मार दिया जाएगा, उनकी मेम साहबों का अपहरण कर लिया जाएगा, और पूरे ब्रिटेन पर काले लोग ही राज करेंगे। बची-खुची अंग्रेज़ जाति काले लोगों की गुलाम होगी।
✔️ यह कोई ज्योतिषीय भविष्यवाणी नहीं है। यह दृश्य मुझे कई बार आंतरिक रूप से दिखाई दिया है। यूरोप ने, विशेषकर ब्रिटेन ने दुनियाँ में जो अत्याचार किए हैं, उसका फल तो उन्हें मिलेगा ही।
२७ जुलाई २०२२

कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---

 कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---

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सभी पर परमात्मा की यह परम कृपा और आशीर्वाद हो। प्रातःकाल उठते ही सभी प्राणी निज चेतना को परमात्मा में स्वतः ही लीन पायें। परमात्मा ही हमारा स्वभाव बन जाये। लघुशंकादि से निवृत्त होकर तुरंत परमात्मा के ध्यान में बैठ जायें --- कमर सीधी, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में, और चेतना कूटस्थ में। जीवन में हर चीज प्रतीक्षा कर सकती है, लेकिन परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती।
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हमारे नेत्र शिवनेत्र हों, हमारी देह शिवदेह हो, हमारे भाव शिवभाव हों, हमारी चेतना शिवचेतना हो। हम स्वयं परमशिव हो जायें। मेरी कूटस्थ चेतना अब इस शरीर में न होकर सर्वव्यापी है। सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारा विश्व ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप में मेरा शरीर है। मैं यह नश्वर देह नहीं, परमशिव हूँ। मैं साँस ले रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस ले रही है; मैं साँस छोड़ रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस छोड़ रही है। सृष्टि का हर प्राणी मेरे इस विराट स्वरूप का भाग है। सारी सृष्टि मेरे माध्यम से परमात्मा की उपासना कर रही है।
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कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर सभी चक्रों को भेदती हुई परमशिव में विलीन हो गई है। परमात्मा स्वयं अपने नाद का श्रवण कर रहे हैं। सारा अस्तित्व परमशिव है। परमशिव से अतिरिक्त कुछ भी अन्य नहीं है। सभी जीवों का कल्याण हो रहा है, सभी को आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। इस परमशिवभाव में मैं निरंतर हर समय स्थित रहूँ। परमात्मा से पृथक मेरा कोई अस्तित्व न हो।
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२३

स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त करें ---

 स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त करें ---

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यह बात मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव से लिख रहा हूँ कि इस समय परमात्मा की एक विशेष कृपा हम सभी मनुष्यों पर है। हमारा लोभ और अहंकार हमें इसकी अनुभूति नहीं होने देता। जब तक हम स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त नहीं करते, तब तक उनकी कृपा की अनुभूति हमें नहीं हो सकती।
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हम भगवान से अपने लोभ और अहंकार की पूर्ति के लिए ही ही प्रार्थना करते हैं। ऐसी प्रार्थना हमें और भी अधिक बंधनों में बांधती है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें अपनी चेतना में वीतराग होना पड़ेगा। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति को वीतरागता कहते हैं। परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए हमें स्थितप्रज्ञ होना होगा। हमारी प्रज्ञा परमात्मा में निरंतर स्थित हो, इसे स्थितप्रज्ञता कहते हैं।
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परमात्मा की गहन और दीर्घ ध्यान-साधना --- सूक्ष्म जगत में प्रवेश का पासपोर्ट है। यह भौतिक जगत तो बहुत छोटा है। सूक्ष्म जगत बहुत अधिक विराट है। हमारी सर्वप्रथम आवश्यकता परमात्मा के प्रति एक अहैतुकी परमप्रेम (भक्ति) की जागृति है, फिर आगे के द्वार खुलते हैं। हम रुपया-पैसा और भोग-विलास की सामग्री प्राप्त करने की ही प्रार्थना भगवान से करते हैं, और दूसरों को ठगते हैं, --- यह हमारा लोभ है जो नर्क का मुख्य द्वार है। दूसरों को ठगने के लिए हम भगवान को अपना सहभागी (Partner) बनाने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं, लेकिन हमें यह पता नहीं होता कि हम उनसे स्वयं को नर्क में डालने की ही प्रार्थना कर रहे हैं।
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नित्य सायं और प्रातः, यदि हो सके तो हर समय प्रेमपूर्वक भगवान का स्मरण करें, उन्हें अपनी चेतना में निरंतर रखें, और उन्हें अपने जीवन की हरेक क्रिया का कर्ता बनायें। उनकी कृपा निश्चित रूप से होगी। आप सब जन्मजात महान आत्माओं को नमन !!
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२४

Sunday, 26 July 2026

स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---

 स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---

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"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
यानि -- हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥
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हमारे जीवन की सारी विषमताओं का कारण हमारा लोभ और अहंकार हैं। हम चाहे कितना भी जप-तप व पूजा-पाठ कर लें, लेकिन बिना वीतराग और स्थितप्रज्ञ हुए, कोई भी परमात्मा को उपलब्ध नहीं हो सकता। आध्यात्मिक मार्ग पर वीतरागता हमारी पहली उपलब्धि है, तत्पश्चात स्थितप्रज्ञता। यह कोई मनोरंजन का विषय नहीं है। हम यहाँ परमात्मा का चिंतन कर रहे हैं।
ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ।।
कृपा शंकर
27 जुलाई 2025

Saturday, 25 July 2026

मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...

 मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...

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निम्न पंक्तियाँ मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूँ| यह आवश्यक नहीं है कि ये सत्य ही हों| मेरा आंकलन भी गलत हो सकता है|
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सनातन हिन्दू धर्म में पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष) को मानव जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य बताया गया है| माता-पिता, आचार्यों और शास्त्रों के उपदेशानुसार आचरण भी पुरुषार्थ है|
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लेकिन इस जीवन का मेरा अनुभव यह कहता है कि जीवन में हमारे साथ वही होता है जो हमारी नियति में है| हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता| हमारी महत्वाकांक्षायें कभी पूरी नहीं होतीं| होता वही है जैसी परिस्थितियाँ हमारे चारों ओर होती हैं, और जैसी हमारी समझ और मस्तिष्क यानि दिमाग की क्षमता होती है| जितनी अधिक आकांक्षाएँ हमारे में होती हैं, उतनी ही अधिक हमारे जीवन में कुंठायें होती हैं| पुरुषार्थ भी तभी होता है जब वह हमारे भाग्य यानि नियति में लिखा हो, अन्यथा नहीं|
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हमारे पास एक ही स्वतंत्र चयन (free choice) है कि हम परमात्मा को प्रेम करें या नहीं| अन्य सब तरह के पुरुषार्थ की बात एक आदर्श लुभावनी मीठी-मीठी अव्यवहारिक कल्पना मात्र ही है| हम अपने कर्मफलों को भोगने के लिए ही आते हैं| बहुत ही कम विकल्प/अवसर, और उनका उपयोग करने की क्षमता हमें जीवन में मिलती हैं| होता वही है जैसी सृष्टिकर्ता की इच्छा होती है|
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आप सब महान आत्माओं को नमन !! आप के विचार आमंत्रित हैं|
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२०

"भक्ति" के बिना ये चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मेरे लिए तो बेकार हैं क्योंकि ये मुझे अपने प्रियतम से नहीं मिला सकते|

 "भक्ति" के बिना ये चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मेरे लिए तो बेकार हैं क्योंकि ये मुझे अपने प्रियतम से नहीं मिला सकते|

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भक्ति भी वही जिसे भक्ति-सूत्रों में नारद जी, और गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताई है| हमें तो अपने प्रियतम से अभी और इसी समय मिलना है, व किसी भी तरह का विलंब स्वीकार्य नहीं है|
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गीता के अलावा अन्य कोई भी उपदेश अब अच्छे नहीं लगते| समझाने वाले प्रियतम भी सामने ही खड़े हैं पर उन कुहुक-शिरोमणि ने एक पतला धुएं का सा आवरण खड़ा कर रखा है| यह आवरण ही पीड़ा है| इस आवरण को भी निश्चित रूप से वे स्वयं ही कभी तो ध्वस्त करेंगे| २५ जुलाई २०२०