सारी सृष्टि, सारे सूर्य-चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र, सब एक नियम से चल रहे हैं। पृथ्वी नियमित रूप से अपने सूर्य की परिक्रमा कर रही है। अग्नि की लपट ऊपर की ओर, व जल की गति नीचे की ओर है। वायु अपनी ही चाल से चलती है। इस देह में रक्त का संचार हो रहा है, बाल और नाखून अपने आप बढ़ रहे हैं, भूख-प्यास व सर्दी-गर्मी लग रही है, शरीर की सारी क्रियाएँ अपने आप हो रही हैं। अपने आप ही अनेक तरह की वासनाओं का जन्म होता है। जीवन में सुख-दुःख की अनुभूतियाँ होती हैं। तरह तरह की स्पृहाओं/आकांक्षाओं व प्रेम और अभीप्सा का जन्म होता है। नित्य इतने लोगों का जन्म और मृत्यु होती है। इन सब का कर्ता कौन है? मैं कौन हूँ? कभी इन पर भी विचार करो, जीवन धन्य होगा।
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मेरी साधनाजन्य अनुभूति तो यही है कि एकमात्र कर्ता -- प्राण-तत्व के रूप में भगवती महाकाली है, जो सारे कर्मों की कर्ता है और उनका फल श्रीकृष्ण (परमशिव) को अर्पित कर रही हैं। लोकयात्रा हेतु मिले इस देह रूपी वाहन में वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में ब्रह्मनाड़ी में विचरण करते हुए स्वयं सारी साधना कर रही हैं और उसका फल परमशिव को अर्पित कर रही हैं।
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प्रश्न उठता है कि 'मैं' कौन हूँ? जिसका उत्तर अभी तो यही मिल रहा कि 'मैं' परमशिव की अनंत विराटता हूँ, जिसका एक अंश इस समय तो इस देह के माध्यम से व्यक्त हो रहा है। जिस दिन मुझ में विचरण कर रही भगवती स्वयं को परमशिव को समर्पित कर देगी, उस दिन मैं भी परमशिव के साथ एक हो जाऊंगा। यह उनका अनुग्रह और जीवन की पूर्णता होगी। कहीं कोई पृथकता का अवशेष नहीं रहेगा।
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जो गुरु रूप में, माता-पिता, व सभी संबंधियों के रूप में आईं, वे स्वयं भगवती ही थीं। वे ही इस जन्म से पूर्व मेरे साथ थीं, और वे ही मृत्यु के पश्चात भी मेरे साथ ही रहेंगी। उनका साथ शाश्वत है। जीवन के सारे अच्छे-बुरे अनुभवों की प्रदाता भी वे ही हैं। अंतिम बात यह कह रहा हूँ कि वे स्वयं ही मेरे और परमशिव परमात्मा के मध्य की कड़ी हैं। परमात्मा से मेरा संबंध उन्हीं के माध्यम से है। उनकी कृपा ही मुझे परमात्मा के साथ एक करेगी। और कुछ भी इस समय कहने के लिए नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२२
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