Tuesday, 18 August 2026

जाने कहाँ गये वो दिन

 जीवन में आमूलचूल परिवर्तन भी पीड़ा देता है। जो कुछ भी जीवन में मैंने देखा, वह सारा परिदृश्य ही बदल गया है। पुराने लोग ऊपर चले गए। बड़े बड़े शानदार भवन सूने होकर खंडहर होने लगे हैं। सारे शत्रु-मित्र पता नहीं कहाँ चले गए। बड़े-बड़े राजसी महल, बड़ी-बड़ी हवेलियाँ, अब सुनसान और खंडहर हो रही हैं। कभी ये भी बहुत शानदार थीं, और बड़े-बड़े शानदार लोग इनमें भी रहते थे। हमारी दो सौ वर्ष पुरानी पारिवारिक हवेली जो कभी बहुत शानदार थी, अब देखभाल के अभाव में खंडहर हो रही है, जिसे देखकर पीड़ा होती है। इतने विभाजन हो गए हैं कि मरम्मत करवाए तो भी कौन? हमारे पूर्वजों की छह-सात पीढ़ियाँ उसमें रही हैं। मेरा भी बचपन, किशोरावस्था और यौवन का कुछ भाग उसी में बीता है।

हमारे यहाँ महाजनों की तो बहुत बड़ी बड़ी शानदार हवेलियाँ हैं, जो खाली और सुनसान पड़ी हैं। उनके मोहल्ले खाली और वीरान हो गए हैं। कई हवेलियाँ तो बिक भी गई हैं, जिन्हें तोड़कर लोगों ने बाजार बना दिये हैं। पुराने लोग भी अब दिखाई नहीं देते। जो युवा पीढ़ी दिखाई देती है, उनमें वह प्रेम नहीं है।
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मेरे पिताजी ने हमारे नगर में सबसे पहिला रेडियो खरीदा था जो बैटरी से चलता था। प्रति सप्ताह बिनाका गीतमाला सुनने के लिए और वर्ष में एक बार बजट सुनने के लिए हमारी बैठक लोगों से भर जाती थी। सन १९६२ की लड़ाई के समय समाचार सुनने के लिए रात भर लोगों की भीड़ उन सब मकानों के चक्कर लगाती थी जिनके पास रेडियो थे। सबसे पहिले ग्रामोफोन और हर घंटे बज कर समय बताने दीवार घड़ी भी हमारे नगर में सबसे पहिले पिताजी ने ही खरीदी थी।
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हमारे नगर में गिन्नी नाम का एक दर्जी था जो खानदानी लोगों के ही कपड़े सिलता था, हर किसी के नहीं। हमारे पिताजी की शेरवानी, चूड़ीदार पायजामा, और कुर्ता आदि सारे वस्त्र वह ही सिलता था। जब वह दर्जी मर गया उसके बाद हमारे पिताजी ने किसी दूसरे दर्जी से कपड़े सिलवाये ही नहीं। पूरे जीवन भर उन्होने खादी ही पहिनी।
ऐसे ही एक रहमान धोबी था जो सिर्फ खानदानी लोगों के ही कपड़े धोता था, हर किसी के नहीं। हमारे पिताजी ने जीवन भर उसी से कपड़े धुलवाये। जब रहमान धोबी मर गया तो पिताजी ने किसी दूसरे धोबी से कपड़े धुलवाये ही नहीं। घर पर ही कपड़े धो लेते थे।
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हमारे पिताजी के पास दो लाइसेन्सी बारह बोर की बंदूकें और एक लाइसेन्सी रिवॉल्वर और दो तलवारें थीं। ऊंट और घोड़े की बहुत अच्छी सवारी करते थे। ब्राह्मण होकर भी उन्हें हर तरह के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग आता था। हम बच्चे थे तभी उन्होने अपने सारे हथियार आधिकारिक तरीके से बेच दिये थे, हमारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर कुएं से अपने हाथ से खींच कर जल भरते, उस से स्नान करते, और दो घंटे शिवपूजा करते। शिवपूजा उनके जीवन का अभिन्न अंग थी।
उस समय लगभग सारे ब्राह्मणों का जीवन बड़ा संघर्ष और कष्टमय था। हँसते हँसते उन्होने सारे कष्ट सहन किए। उन्होने भी समय का परिवर्तन देखा और उसकी पीड़ा सदैव उनके मानस में रही।
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समय का यानि जमाने का पीड़ादायक परिवर्तन मैं भी देख रहा हूँ। एक अदृश्य शक्ति बार बार मुझे कह रही है कि सब कुछ बदल जाएगा, लेकिन परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। मुझे सुख-शांति और सुरक्षा भगवान के ध्यान में ही मिलती है। इस भौतिक जीवन का शेष भाग भी भगवान के ध्यान में ही व्यतीत हो जाये तो ठीक है।
हर हर महादेव॥ जय सियाराम॥
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अगस्त २०२३

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