Tuesday, 18 August 2026

सनातन धर्म अभी भी जीवित क्यों है? ---

 सनातन धर्म अभी भी जीवित क्यों है? ---

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हरेक मनुष्य की चेतना में एक शाश्वत जिज्ञासा है -- सत्य को जानने की। सत्य ही परमात्मा है। दूसरे शब्दों में परमात्मा ही एक मात्र सत्य है जिसे जाने बिना मनुष्य को जीवन में संतुष्टि और तृप्ति नहीं मिलती। इस शाश्वत जिज्ञासा ने ही सनातन धर्म को जीवित रखा है। जब तक मनुष्य की चेतना में सत्य को जानने की जिज्ञासा है, तब तक सनातन धर्म अमर है, और जीवित रहेगा। सनातन धर्म तब तक रहेगा जब तक यह सृष्टि है।
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पुनर्जन्म, कर्मफल, आत्मा की शाश्वतता, और ईश्वर के अवतार -- ये सनातन धर्म के आधार हैं, जो कभी भी इस सृष्टि में समाप्त नहीं किए जा सकते, क्योंकि यह सृष्टि इन्हीं पर आधारित है।
देखिये क्या विडम्बना है!! ईसाईयायत, इस्लाम और मार्क्सवाद -- तीनों ही आपस में एक-दूसरे के शत्रु हैं, ये सदा ही आपस में लड़ते आए हैं, लेकिन हिन्दुत्व के विरोध में तीनों मिलकर एक हो जाते हैं।
सत्य को अस्थायी रूप से छिपाया तो जा सकता है, कभी नष्ट किया जा सकता।
असत्य का अंधकार कितना भी प्रबल हो, लेकिन प्रकाश के समक्ष टिक नहीं सकता।
इस समय तमोगुण की प्रधानता के कारण असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हावी हैं। इसका निदान यही है कि हम अपने निजी जीवन में परमात्मा के प्रकाश को प्रकट करें। अन्य कोई उपाय नहीं है।
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पुनश्च: --- वर्तमान में "हिंसा" शब्द का अर्थ गलत लगाया गया है। महाभारत में विभिन्न संदर्भों में पचास से अधिक बार -- "अहिंसा परमो धर्म:" कहा गया है। यदि आप महाभारत का ठीक से स्वाध्याय करेंगे तो पायेंगे कि हिंसा का जन्म मनुष्य के लोभ और अहंकार से ही होता है। दूसरे शब्दों में लोभ और अहंकार से मुक्ति ही अहिंसा है।
"हिन्दू" शब्द का अर्थ जो मुझे समझ में आया है, वह यह है कि जो भी व्यक्ति हिंसा से दूर है, वह हिन्दू है। हिंसा -- यानि लोभ और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही हिन्दू कहलाने का अधिकारी है।
दुर्भाग्य से इस समय ऐसा लग रहा है कि ईसाईयत से हिन्दुत्व हार रहा है। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। ईसायत के दो ही आधार हैं -- मूल पाप की अवधारणा, और पुनरोत्थान। ये दोनों ही अवधारणाएँ काल्पनिक और अवैज्ञानिक हैं, व लोभ और भय पर आधारित हैं। इनमें कोई सत्य नहीं है। सारी अवैज्ञानिक और असत्य अवधारणाएँ एक दिन समाप्त हो जाएंगी।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२३

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