मैं सत्य-सनातन-हिन्दू-धर्म के सभी संप्रदायों का सम्मान समभाव से करता हूँ। मैंने हिन्दू-धर्म के लगभग सभी प्रमुख संप्रदायों के संत-महात्माओं के साथ सत्संग किया है। सभी संप्रदायों में एक से बढ़कर एक तपस्वी और विद्वान साधु हैं। जितना सम्मान मैं शंकराचार्यों का करता हूँ, उतना ही सम्मान वैष्णवाचार्यों का करता हूँ। मैं अपना एक निजी विचार व्यक्त कर रहा हूँ ---
Saturday, 29 October 2022
कौन सा मत/संप्रदाय/सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ है?
प्रश्न :--- कौन सा मत/संप्रदाय/सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ है?
उत्तर :--- हम स्वभावतः उसी मत या संप्रदाय की ओर आकृष्ट होते हैं, जिस के संस्कार हमारे में पूर्वजन्मों से होते हैं। फिर भी मैं बड़ी स्पष्टता से कहता हूँ कि वही सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ है जो हमें शीघ्रातिशीघ्र इसी जीवन में ईश्वर की प्राप्ति करा दे। मनुष्य जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है, और जो हमारे में परमात्मा के प्रति परमप्रेम जागृत कर हमे आनंदमय बना दे, वही मत/सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ है। जो हमें ईश्वर से दूर ले जाये वह सिद्धान्त गलत है।
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कृपा शंकर
१३ सितंबर २०२२
स्वयं का पिंडदान ---
स्वयं का पिंडदान ---
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जब यह दृढ़ अनुभूति हो जाये कि मैं यह भौतिक शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हूँ, उसी समय हमारा स्वयं का पिंडदान हो जाता है। मूलाधारस्थ कुंडलिनी -- "पिंड" है। गुरु-प्रदत्त विधि से बार-बार कुंडलिनी महाशक्ति को मूलाधार-चक्र से उठाकर सहस्त्रार में भगवान विष्णु के चरण-कमलों (विष्णुपद) में अर्पित करना यथार्थ "पिंडदान" है। इसे श्रद्धा के साथ करना "श्राद्ध" है।
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लेकिन शास्त्रों के आदेशानुसार गृहस्थों का दायित्व है कि परिवार में अपने से बड़े-बूढ़ों की सेवा करे, और पितृ-पक्ष में पूरी श्रद्धा से अपने पित्तरों का श्राद्ध करे। इस विषय पर मनु महाराज और याज्ञवल्क्य ऋषि के शास्त्रों में कथन ही अंतिम प्रमाण हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१४ सितंबर २०२२
परमात्मा के ध्यान से प्राप्त आनंद ही वास्तविक सत्संग है ---
परमात्मा के ध्यान से प्राप्त आनंद ही वास्तविक सत्संग है ---
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बंद आँखों के अंधकार के पीछे सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में परमात्मा की अनुभूति सभी ध्यान साधकों को होती है। सारी सृष्टि ही इस ब्रह्मज्योति में समाहित हो जाती है। प्रणव की ध्वनि भी इसी ज्योति में लिपटी रहती है। इस का दर्शन, श्रवण और निरंतर अनुभूति होते रहना -- परम सौभाग्य की बात होती है। "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग इसी के लिए होता है। निरंतर इस के चैतन्य में बने रहना "कूटस्थ चैतन्य" कहलाता है। कूटस्थ चैतन्य में निरंतर स्थिति -- "ब्राह्मी स्थिति" है।
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मेरे लिए सूक्ष्म देह में मेरुदंडस्थ सुषुम्ना नाड़ी ही पूजा की वेदी और मंडप है, जहाँ भगवान वासुदेव स्वयं बिराजमान हैं। सहस्त्रार-चक्र में दिखाई दे रही ज्योति "विष्णुपद" है। ये ही गुरु महाराज के चरण-कमल हैं। इनका ध्यान -- गुरु-चरणों का ध्यान है। इनमें स्थिति -- श्रीगुरुचरणों में आश्रय है।
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कुंडलिनी महाशक्ति का सहस्त्रार और ब्रह्मरंध्र से भी ऊपर उठकर अनंत महाकाश से परे परमशिव से स्थायी मिलन जीवनमुक्ति और मोक्ष है। यही अपने सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ सितंबर २०२२
"खान" शब्द भगवान श्रीकृष्ण के एक नाम "कान्ह" का अपभ्रंस है ---
"खान" शब्द भगवान श्रीकृष्ण के एक नाम "कान्ह" का अपभ्रंस है ---
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भगवान श्रीकृष्ण के देवलोक गमन के पश्चात भी सैंकड़ों वर्षों तक पूरे विश्व में उनकी उपासना की जाती थी। प्राचीन संस्कृत साहित्य में जिस शिव भक्त "किरात" जाति का उल्लेख है, वह "मंगोल" जाति ही है। उन में "कान्ह" शब्द बहुत सामान्य था, जो अपभ्रंस होकर "हान" हो गया। चीन के बड़े बड़े सामंत स्वयं के नाम के साथ "हान" की उपाधी बड़े गर्व के साथ लगाते थे। यही "हान" शब्द और भी अपभ्रंस होकर "खान" हो गया। प्रख्यात इतिहासकार श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक, और अन्य अनेक इतिहासकारों का यही मत है।
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मंगोलिया के महा नायक चंगेज़ खान का वास्तविक नाम मंगोल भाषा में "गंगेश हान" (अंग्रेजी में Genghis Khan) था। यह उसका संस्कृत भाषा में एक हिन्दू नाम था। वह किसी आसुरी दैवीय शक्ति का उपासक था, जो उसे बता देती थी कि उसे कहाँ कहाँ और कैसे आक्रमण करना है, और कैसे विजय प्राप्त करनी है। वह सदा विजयी रहा। कालांतर में उसके सगे पौत्र कुबलई खान (चंगेज़ खान के सबसे छोटे बेटे तुलई खान का बेटा) ने बौद्ध मत स्वीकार कर लिया और बौद्ध मत का प्रचार किया।
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"कुबलई" शब्द संस्कृत भाषा के "कैवल्य" शब्द का अपभ्रंस है। कुबलई खान के समय ही चीनी लिपि का अविष्कार हुआ। उसी के समय मार्को पोलो ने चीन की यात्रा की थी। कुबलाई खान का राज्य उत्तर में साईबेरिया की बाइकाल झील (विश्व की सर्वाधिक गहरी मीठे पानी की झील) से दक्षिण में विएतनाम तक, और पूर्व में कोरिया से लेकर पश्चिम में कश्यप सागर तक था। पिछले एक हज़ार में हुआ वह अकेला ही इस पृथ्वी के २०% भूभाग का शासक था। उसी ने तिब्बत के प्रथम दलाई लामा की नियुक्ति की थी।
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वर्तमान में जो इतिहास पढ़ाया जाता है ,वह पश्चिमी लेखकों का लिखा हुआ है।
पश्चिमी लोगों ने अपने से अतिरिक्त अन्य सब की अत्यधिक कपोल कल्पित बुराइयाँ ही की हैं। योरोपियन लोग इतिहास के सबसे बड़े लुटेरे थे, अतः उन्होंने अपने से अलावा सबको लुटेरा ही बताया है। भारत में आया पहला यूरोपीय व्यक्ति वास्को-डी-गामा था जो एक नर पिशाच समुद्री डाकू था। भारत में जो अँग्रेज़ सबसे पहिले आये वे सब भी लुटेरे समुद्री डाकू थे। भारत पर जिन यूरोपीयों ने अधिकार किया वे सब -- चोर, लुटेरे डाकू, धूर्त, और बदमाश श्रेणी के सजा पाए हुए लोग थे, जिन्हें अपनी सजा काटने के लिए यहाँ भेजा गया था। विश्व में सबसे अधिक नर-संहार और लूट-खसोट यूरोपीय लोगों ने ही की है।
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योरोपियन इतिहासकारों ने सिकंदर को महान योद्धा और चंगेज़ खान को लुटेरा सिद्ध किया है। निष्पक्ष दृष्टी से देखने पर मुझे चंगेज़ खान की उपलब्धियाँ सिकंदर से बहुत अधिक लगती हैं। मंगोलिया कभी विभिन्न घूमंतू जातियों द्वारा शासित था। चंगेज़ खान ने मंगोलियाई साम्राज्य की स्थापना की। पश्चिमी एशिया में इस्लाम के अनुयायियों का मंगोलों ने बहुत बड़ा नरसंहार किया था। बग़दाद का खलीफा जो इस्लामी जगत का मुखिया था, एक नौका में बैठकर टाइग्रस नदी में भाग गया था, जिसे चंगेज़ खान की मंगोल सेना नदी के मध्य से पकड़ लाई और एक गलीचे में लपेट कर लाठियों से पीट पीट कर हत्या कर दी। कालांतर में पश्चिमी एशिया में बचे खुचे मंगोलों ने इस्लाम अपना लिया, पर इस्लाम मंगोलिया की मुख्य भूमि तक कभी भी नहीं पहुँच पाया।
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चंगेज़ खान के भय से ही आतंकित होकर मध्य एशिया के कुछ मुसलमान कश्मीर में शरणार्थी होकर आये और आगे जाकर छल-कपट से कश्मीर के शासक बन गए व हिन्दुओं पर बहुत अधिक अत्याचार किये। इसका वर्णन "राजतरंगिनी" नामक ग्रंथ में उसके लेखक कल्हन ने किया है।
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चंगेज़ खान का अधिकाँश समय घोड़े की पीठ पर ही व्यतीत होता था। घोड़े की पीठ पर चलते चलते ही वह सो भी लेता था। चंगेज खान के समय ही घोड़े पर बैठने की आधुनिक काठी व काठी के नीचे पैर रखने के लोहे के मजबूत पायदान का आविष्कार हुआ था। बहुत तेजी से भागते हुए घोड़े की पीठ पर से तीर चलाकर अचूक निशाना लगाने का उसे पक्का अभ्यास था, जो प्रायः उसके सभी अश्वारोहियों को भी था। जो उसके सामने समर्पण कर देता, उसे तो वह जीवित छोड़ देता था, अन्य सब का वह बड़ी निर्दयता से वध करा देता था।
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एक और प्रश्न उठता है यदि चंगेज़ खान मात्र लुटेरा था तो उसका पोता कुबलई ख़ान (मंगोल भाषा में Хубилай хаан; चीनी में 忽必烈; २३ सितम्बर १२१५ – १८ फ़रवरी १२९४) चीन का सबसे महान शासक कैसे हुआ? कुबलई ख़ान -- चंगेज़ ख़ान के सबसे छोटे बेटे तोलुइ ख़ान का बेटा था। उसके राज्य में मंगोलों से एक समय पूरा यूरोप और एशिया काँपती थी।
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वर्षों पूर्व जापान और दक्षिण कोरिया के कुछ प्रसिद्ध बौद्ध मठों के भ्रमण का मुझे अवसर मिला था। बहुत पुरानी बातें हो गई हैं, जो अब स्मृति से लुप्त हो रही हैं। कई पुराने चित्र और फोटोग्राफ भी थे। अब पता नहीं कहाँ हैं। सब महत्वहीन बातें हो गई हैं। आप ने इस लेख को पढ़ा, इसके लिए आपको धन्यवाद और नमन !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ मई २०१५
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नीचे का पहला चित्र चंगेज़ खान का है, और दूसरा चित्र उसके पोते कुबलई खान का है।
भारत के मूस्लिम समाज में "खान" शब्द का प्रचलन कैसे हुआ? ----
(प्रश्न): भारत के मूस्लिम समाज में "खान" शब्द का प्रचलन कैसे हुआ?
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(उत्तर): दक्षिण भारत के कुछ अति अति अल्प भागों में इस्लाम का आगमन अरब व्यापारियों के साथ हुआ था। लेकिन इस्लाम मुख्यतः मध्य एशिया, विशेषकर उज्बेकिस्तान के आक्रमणकारियों के द्वारा अफगानिस्तान के मार्ग से भारत में आया था। ये स्वयं को तुर्क कहते थे। तुर्की की सल्तनत-ए-उस्मानिया के प्रति उनमें बहुत सम्मान था। "हान" से अपभ्रंस होकर बने "खान" शब्द का तत्कालीन प्रचलित अर्थ था -- "महाराजाधिराज", "महाराजा" आदि। १२वीं तथा १३वीं सदी ई. में तुर्क लोग "खान" शब्द का प्रयोग राज्य के सर्वोच्च अधिकारी के लिए किया करते थे। यह शब्द सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति के लिए ही प्रयुक्त होता था। बाद में अफगानिस्तान में स्वयं के नाम के साथ "खान" लिखने का एक प्रचलन सा चल पड़ा था। इस तरह भारत के पठानों में खान शब्द सामान्य हो गया, और अनेक लोग अपने नाम के साथ "खान" लिखने लगे।
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आज से ३४ वर्ष पूर्व सन १९८८ में मध्य एशिया के दो तातार मुसलमान विद्वानों से मेरी भेंट और चर्चा यूक्रेन के ओडेसा नगर में हुई थी। उन्होने मुझे बड़े सम्मान से अपने घर पर निमंत्रित किया और सप्रमाण कई बातें बताईं। उनमें से एक तो अति वृद्धा विदुषी महिला डेन्टिस्ट डॉक्टर थी जो चीन की जेलों में एक राजनीतिक वंदी के रूप में १० वर्ष बिता चुकी थी। उसके स्वर्गीय पति मंचूरिया में एक व्यापारी थे। अपनी खोई हुई बेटी उसे यूक्रेन के ओडेसा नगर में मिली। फिर वह भी वहीं बस गई। अब तो वह विदुषी महिला जीवित नहीं है, लेकिन उसकी विद्वता और ज्ञान बहुत अधिक था। उस ने रूसी भाषा में लिखी इतिहास की अनेक पुस्तकें दिखाईं और बताया कि इस्लाम के आगमन से पूर्व पूरे मध्य एशिया में बौद्ध मत था, और बौद्ध मत से पूर्व सनातन हिन्दू धर्म था।
॥इति॥
प्रकृति के अटल शाश्वत नियम ---
प्रकृति के अटल शाश्वत नियम ---
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पुनर्जन्म/मृत्यु, दुःख/सुख, यश/अपयश, हानि/लाभ आदि में भगवान का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। यह कार्य हमारे पूर्व के कर्मों के अनुसार प्रकृति अपने नियमों से करती है। प्रकृति के नियमों को न जानना हमारा अज्ञान है। जब तक भगवत्-प्राप्ति नहीं होती तब तक कर्मफलों को भोगने के लिए किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म होता ही रहेगा। इसे कोई नहीं रोक सकता।
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हमारा पुनर्जन्म होगा या नहीं ? इसे जानने का एक सीधा सा तरीका है। यदि किसी भी व्यक्ति में भौतिक मृत्यु के समय कुछ कामना हो जैसे -- opposite sex के प्रति आकर्षण, किसी से बदला लेने की भावना, या कुछ सांसारिक लाभ प्राप्त करने की इच्छा आदि, --- तो उसका पुनर्जन्म निश्चित है।
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पुनर्जन्म न हो, इसका उपाय श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है। सत्यनिष्ठा, भक्ति और समर्पण के संस्कारों के साथ, किशोरावस्था से ही किसी बालक में Opposite sex के प्रति आकर्षण की दिशा यदि परमात्मा की ओर मोड़ दी जाये, तो वह इस जन्म में ही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। विषय-वासनाओं के चिंतन के स्थान पर हरिःचिंतन करें। यदि वेदान्त-वासना जागृत हो जाये तो अन्य कुछ चाहिये भी नहीं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१६ सितंबर २०२२
ईश्वर को प्राप्त करने का हठ भी बहुत गलत है ---
ईश्वर को प्राप्त करने का हठ भी बहुत गलत है। ऐसा हठ नहीं करना चाहिए। क्या पता हमारा यह भौतिक शरीर -- ईश्वर के तेज को सहन करने में समर्थ है या नहीं। एक २४ वोल्ट के बल्ब को करोड़ों वोल्ट की विद्युत के साथ जोड़ देने से उस बल्ब की क्या हालत होगी, वैसी ही हालत हमारी देह की भी हो सकती है।
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एक निजी अनुभूति है जिसे बताने की मुझे आंतरिक अनुमति है। आज प्रातः के ध्यान में जब मेरी चेतना सूक्ष्म जगत में थी, तब किसी सूक्ष्म जगत की एक अदृश्य महान आत्मा ने ही मुझसे एक बात कही। उसने कहा कि तुम्हारा यह शरीर ईश्वर की आंशिक चेतना को सहन करने में भी असमर्थ है। ईश्वर की अनुभूति अपने आप ही होने दो, कोई हठ मत करो, अन्यथा यह शरीर रूपी साधन ही नष्ट हो जाएगा। कहने वाले के शब्द बहुत स्पष्ट और प्रभावी थे, अभी तक मुझे ज्यों के त्यों याद हैं।
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पूरी बात समझ में आ गई। अब कोई जल्दी नहीं है। भगवान मिलें या न मिलें, सब कुछ उन पर निर्भर है। मैं उनके प्रति समर्पित हूँ। उन की पूर्ण कृपा मुझ अकिंचन पर है। भगवान से भी कुछ नहीं चाहिए। उनकी उपस्थिती का आभास ही मेरा आनंद और सत्संग है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ सितंबर २०२२
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