Monday, 24 January 2022

उत्तरायण और दक्षिणायण अब कहीं बाहर नहीं, मेरे सूक्ष्म शरीर में ही हरेक साँस के साथ घटित हो रहे हैं ---

 उत्तरायण और दक्षिणायण अब कहीं बाहर नहीं, मेरे सूक्ष्म शरीर में ही हरेक साँस के साथ घटित हो रहे हैं। मेरे सूक्ष्म शरीर में सहस्त्रार-चक्र -- उत्तर दिशा है; मूलाधार -- दक्षिण दिशा है; भ्रूमध्य -- पूर्व दिशा है; और बिन्दु जहाँ शिखा रखते हैं -- वह पश्चिम दिशा है। आज्ञा-चक्र मेरा आध्यात्मिक हृदय है। सुषुम्ना की ब्रह्मनाड़ी मेरा परिक्रमा पथ है।

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आगे की बात एक गोपनीय परम रहस्य है जिसे मैं रहस्य ही रखना चाहता हूँ। परमशिव भी एक रहस्य हैं। अपना रहस्य वे स्वयं ही अनावृत करें तभी ठीक है।मेरे प्रारब्ध कर्मफल मुझे बापस इस देह में ले आते हैं। अभीप्सा तो परमशिव में उन के साथ ही हर समय स्थायी रूप से रहने की है, पर लौटना पड़ता है। यही मेरी पीड़ा है। आज नहीं तो कल, रहना तो उनके साथ ही है। इस मायाजाल से मुक्त करना या न करना, उन की समस्या है, मेरी नहीं। मैं तो अपने भाव-जगत में उनके साथ निश्चिंत होकर एक हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२२

आप सब को उत्तरायण की मंगलमय शुभ कामनाएँ ---

 आप सब को उत्तरायण की मंगलमय शुभ कामनाएँ प्रेषित करते हुए मैं अपने हृदय के अंतरतम विचारों को भी सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ---

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मैं स्वयं को जलाकर ही उस प्रकाश को उत्पन्न कर रहा हूँ, जो मेरे लिए परमात्मा के मार्ग को आलोकित कर रहा है। मेरे और परमात्मा के मध्य का मार्ग -- मेरे हृदय का परमप्रेम व अभीप्सा है, और सबसे बड़ी बाधा -- सत्यनिष्ठा का अभाव है। जिन्हें मैं ढूँढ़ रहा हूँ, वह तो मैं 'स्वयं' हूँ, और वह 'स्वयं' ही मुझे ढूँढ़ रहा है।
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परमात्मा ही परम सत्य है जिसकी खोज से पूर्व मुझे अपने भीतर असत्य के उन सभी अवरोधों को दूर कर देना चाहिए, जिन्होंने मुझे परमात्मा से पृथक कर रखा है। जो भी अनावश्यक विचार हैं, वे पतझड़ के पत्तों की तरह जितनी शीघ्र गिर जाये, उतना ही अच्छा है।
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कुछ भी कहने से पूर्व मैं विचार करूँ कि जो मैं कहने जा रहा हूँ, क्या यह सत्य है, आवश्यक है, और प्रिय है? अनावश्यक और अप्रिय विचारों का मेरे चित्त में जन्म ही न हो। मेरे हृदय में सब के प्रति सद्भावना हो, और मेरी अभिव्यक्ति अपने उच्चतम स्तर पर हो।
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मैं ही वह आकाश हूँ, जहाँ मैं विचरण करता हूँ। चारों ओर छाई हुई शांति का साम्राज्य भी मैं स्वयं ही हूँ। आप में और मुझ में कोई अंतर नहीं है। जो आप हैं, वह ही मैं हूँ। जब तक हमारे पैरों में लोहे की जंजीरें बंधी हुई हैं तब तक हम असहाय हैं। सर्वोपरी आवश्यकता उन सब बंधनों से मुक्त होना है जिन्होंने हमें असहाय बना रखा है।
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मंगलमय शुभ कामनाएँ और सप्रेम नमन॥ ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२२

मकर संक्रांति/पोंगल के शुभ अवसर पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम में स्नान करें ---

 मकर संक्रांति/पोंगल के शुभ अवसर पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम में स्नान करें ---

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गुरु महाराज ने बलात् मुझे उठाकर तीर्थराज त्रिवेणी-संगम नामक अमृत-कुंड में बड़ी ज़ोर से अपनी पूरी ताकत लगाकर फेंक दिया, और स्वयं अदृश्य हो गये। अदृश्य होकर भी उन्होने सुनिश्चित किया कि मेरा जीवन उत्तरायण, धर्म-परायण व राममय हो जाये। अब तक तो वह त्रिवेणी-संगम बहुत पीछे छूट गया है। पता नहीं तब से अब तक गंगाजी में कितना पानी बह चुका है। वह त्रिवेणी-संगम था -- भ्रूमध्य में कूटस्थ-बिन्दु, जहाँ इड़ा भगवती गंगा, पिंगला भगवती यमुना, और सुषुम्ना भगवती सरस्वती नदियों का संगम होता है। इस तीर्थराज में स्नान करने से क्या मिला यह तो वे ही जानें, लेकिन मेरा जीवन तो धन्य हो गया है। अपनी चेतना को भ्रूमध्य में और उससे ऊपर रखना त्रिवेणी संगम में स्नान करना है। आने-जाने वाली हर सांस के प्रति सजग रहें, और निज चेतना का निरंतर विस्तार करते रहें।
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उस कूटस्थ-चैतन्य में हम अनंत, सर्वव्यापक, असम्बद्ध, अलिप्त व शाश्वत हैं। हमारे हृदय की हर धड़कन, हर आती जाती साँस, -- परमात्मा की कृपा है। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा है। हम जीवित हैं सिर्फ परमात्मा के लिए ही। अब तो परमशिव परमात्मा ने सारा भार अपने ऊपर ले लिया है, वे जानें और उनका काम जानें।
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अब तक की यह यात्रा तरह तरह के भटकाओं और बाधाओं से भरी एक गड़बड़झाला की तरह थी, जिसे उनकी परम कृपा से ही पार कर पाये। खुद का बल कोई काम नहीं आया। अपने जीवन का ध्रुव, भगवान को ही बनाया, तो सारी बाधाएँ दूर हो गईं। गुरुजी के ही शब्दों में --
I have made thee polestar of my life
Though my sea is dark, and my stars are gone
Still, I see the path through thy mercy
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जब भी भगवान की याद आये वही सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है। उसी क्षण स्वयं प्रेममय बन जाओ, यही सर्वश्रेष्ठ साधना है. अपनी व्यक्तिगत साधना/उपासना में एक नए संकल्प और नई ऊर्जा के साथ गहनता लायें। >>> रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ। >>> दिन का प्रारम्भ परमात्मा के प्रेम रूप पर ध्यान से करें। >>>पूरे दिन परमात्मा की स्मृति रखें। >>> यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः स्मरण करते रहें। एक दिन पाओगे कि भवसागर तो कभी का पीछे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
अर्थात् - "(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥९:३४॥"
"तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो॥१८:६५॥"
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अभीप्सा, परमप्रेम और पूर्ण समर्पण -- यही वेदान्त है, यही ज्ञान है, यही भक्ति है, और यही सनातन धर्म है। बाकी सब इन्हीं का विस्तार है। इनके सिवाय मुझे तो अन्य कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता। सर्वत्र भगवान वासुदेव हैं। वे ही श्रीराम हैं, वे ही परमशिव पारब्रह्म हैं, और वे ही सर्वस्व हैं। कहीं कोई पृथकता नहीं है। अन्य कुछ है ही नहीं। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२२

मुझे सुधारने की कौशिस न करें ---

 जिनको मेरे विचार पसंद नहीं हैं, वे मुझे unfriend और block कर दें। मेरे लेख पढ़ कर अपना समय नष्ट न करें। मुझे मेसेन्जर पर वीडियो और अनावश्यक लेख और अभिवादन न भेजें। मैं उन्हें कभी नहीं देखता।

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मुझे सुधारने की कौशिस न करें। भारत के अनेक बड़े अच्छे-अच्छे विचारकों और ज्ञानियों से मेरा खूब सत्संग हुआ है। विदेशों में कई बड़े-बड़े यूरोपीय व अमेरिकी पादरियों से मेरी खूब मगजमारी भी हुई है। काली कंबल पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ सकता। अतः किसी की भी मुझे तथाकथित रूप से सुधारने की कौशिस कभी सफल नहीं हो सकती। किसी को कोई शिकायत है तो मुझसे स्पष्ट कहे।
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२२

सनातन-धर्म का पुनरोत्थान व वैश्वीकरण अवश्यंभावी है, जिसे कोई रोक नहीं सकता ---

 सनातन-धर्म का पुनरोत्थान व वैश्वीकरण अवश्यंभावी है, जिसे कोई रोक नहीं सकता ---

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सनातन धर्म की निंदा को मैं सहन नहीं कर सकता। ऐसे निंदक लोगों की शक्ल भी मैं नहीं देखता। भारत पर अंग्रेजों और पूर्तगालियों का राज्य राक्षसों का ही राज्य था, जिन्होंने सनातन धर्म को नष्ट करने का अपनी पूरी शक्ति से पूरा प्रयास किया। उन्होंने भारत से सारे भारतीयों को मारने का भी उसी तरह प्रयास किया था जैसा सामूहिक नर संहार उन्होंने उत्तरी-अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपों में किया। वहाँ की लगभग सारी स्थानीय आबादी की हत्या कर उनके स्थान पर यूरोप के गोरों को बसा दिया। सन १८५७ के असफल प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद करोड़ों भारतीयों की हत्या की गई। दुबारा फिर उसके बाद कृत्रिम अकाल की स्थिति उत्पन्न कर करोड़ों भारतीयों को भूख से मारा गया। पुर्तगालियों द्वारा गोवा में लगभग सारे ब्राह्मण पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की सामूहिक हत्या की गई। वे ही बचे जो किसी तरह स्वयं को छिपा सके। लेकिन पश्चिमी राक्षस लोग अपने प्रयास में सफल नहीं हुए। उससे पूर्व, मध्य एशिया से आए लुटेरों ने भी करोड़ों भारतीयों का सामूहिक नर-संहार कर ऐसा ही प्रयास किया था।
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भारत की सबसे बड़ी हानि तो यह की गई कि भारत की शिक्षा-व्यवस्था को बड़ी क्रूर निर्दयता व धूर्तता से अंग्रेजों द्वारा नष्ट कर दिया गया। गुरुकुलों की शिक्षा को अमान्य कर दिया, गुरुकुलों को प्रतिबंधित कर उनमें आग लगा दी गई। अनेक आचार्यों की हत्या कर दी गई, उनके ग्रंथ छीनकर उन्हें विपन्न कर दिया गया। उन्हे इतना अधिक दरिद्र बना दिया गया कि वे स्वयं के बच्चों को भी पढ़ाने में भी असमर्थ हो गए। फिर उनके बचे-खुचे ग्रंथ भी उनसे रद्दी के भाव खरीद लिए गए।
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इससे भी अधिक निकृष्ट काम अंग्रेजों के वेतनभोगी पादरियों ने यह किया कि उन्होने संस्कृत भाषा सीखकर हिंदुओं के धर्म-ग्रन्थों में मिलावट कर के अर्थ का अनर्थ कर दिया। ब्राह्मणों को अत्याचारी बताकर उनमें और समाज के अन्य वर्गों में एक शत्रुता उत्पन्न कर दी। सनातन धर्म को बहुत ही अधिक बदनाम करने का काम भी पादरियों ने ही किया है।
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भारत को स्वतंत्र कराने में अंततः सबसे बड़ी भूमिका वीर सावरकर और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसों की थी। लेकिन कुटिलता से उनके स्थान पर हिन्दू द्रोही काले अंग्रेज़ सत्तासीन हुए और खुल कर हिन्दू द्रोह हुआ। भारत को धर्म-निरपेक्ष (अधर्म-सापेक्ष) बना कर संविधान में ऐसी धारायें जोड़ी गईं जिनके अनुसार हिंदुओं को अपने धर्म की शिक्षा देने का अधिकार, मान्यता प्राप्त विद्यालयों में नहीं रहा। उनके मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। मंदिरों का जो धन धर्म-प्रचार में लगना चाहिए था वह अधर्म के कार्यों में खर्च किया जाने लगा। कुल मिलाकर भारतीयों को अपने धर्म से विमुख करने का पूरा प्रयास हुआ।
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लेकिन अधर्मियों को यह नहीं पता कि यह पूरी सृष्टि ही धर्म से चल रही है। धर्म को नष्ट करने का प्रयास करने वाले अंततः स्वयं ही नष्ट हो जाएँगे। धर्म की पुनर्स्थापना तो भगवान स्वयं करेंगे, और अधर्मियों का नाश भी वे ही करेंगे। भगवान का वचन है --
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥४:७॥"
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४:८॥"
अर्थात् - हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ॥
साधु पुरुषों के रक्षण, दुष्कृत्य करने वालों के नाश, तथा धर्म संस्थापना के लिये, मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ॥"
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धर्म का पालन कर के हम धर्म की रक्षा ही नहीं परमात्मा का कार्य भी कर रहे हैं।
हमारा स्वधर्म है -- भगवत्-प्राप्ति। यही सनातन धर्म का सार है। परधर्म में मरने की अपेक्षा स्वधर्म में मरना अधिक श्रेयस्कर है। यह भगवान का कथन है --
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
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थोड़ा-बहुत धर्म का पालन भी महाभय से हमारी रक्षा करेगा। भगवान कहते हैं --
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् - इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
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>>> धर्म क्या है? <<< वैशेषिक सूत्रों में महर्षि कणाद के अनुसार --
“यतो अभ्युदय नि:श्रेयस सिद्धि:स धर्म:।“
अर्थात् - "जिस माध्यम से हमारा सर्वांगीण विकास हो, और सभी प्रकार के दुःखों-कष्टों से मुक्ति मिले, उसी को धर्म कहते हैं।"
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जो सत्य से युक्त, न्याय से परिचालित, पक्षपात रहित, और ईश्वरोक्त वेदाज्ञा के अनुकूल है, उसे ही मैं धर्म मानता हूँ। इसके विपरीत जो है, वह अधर्म है। धर्म-निरपेक्षता भी अधर्म है।
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धर्म के दस लक्षण है। जहां ये लक्षण हैं, वहीं धर्म है ---
"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रिय निग्रहः।
धीः विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्॥"
अर्थात् -- धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना )। यही धर्म के दस लक्षण है।
(इनकी मैं यहाँ व्याख्या नहीं कर सकता, क्योंकि व्याख्या करेंगे तो अलग से एक पूरी पुस्तक ही लिखी जायेगी। किसी लेख में इनका समापन नहीं हो सकता)
इन का स्वाध्याय अलग से करें।
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महर्षि याज्ञवल्क्य ने याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्म के नौ लक्षण बताए हैं।
श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में धर्म के तीस लक्षण बतलाये गए हैं।
महाभारत में धर्मात्मा विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं।
रामचरितमानस में अनेक बार भगवान राम ने भी धर्म की व्याख्या की है।
पद्म पुराण में तो धर्म की बहुत विस्तार से व्याख्या की गई है।
तीर्थंकर महावीर द्वारा "दश लक्षण धर्म" बताया गया है।
भारत के सभी अवतारों ने धर्म की विस्तृत व्याख्या की है। भारत में "धर्म" शब्द की जितनी चर्चा हुई हुई है, उतनी अन्यत्र कहीं भी नहीं हुई है।
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इस लेख का समापन यहीं कर रहा हूँ। अधिक बड़े लेखों को कोई नहीं पढ़ता। इसे लिखने का जो मेरा उद्देश्य था वह इस लेख से पूर्ण हो गया है।
आप सभी महानुभावों को सादर सप्रेम नमन॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ जनवरी २०२२

ॐ विश्वं विष्णु: ----

 विष्णु सहस्त्रनाम का आरंभ "ॐ विश्वं विष्णु:" शब्दों से होता है। इन तीन शब्दों में ही सारा सार आ जाता है। आगे सब इन्हीं का विस्तार है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पूरी सृष्टि यानि सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही विष्णु है। जो कुछ भी सृष्ट या असृष्ट है, वह सब विष्णु है। हम विष्णु में विष्णु को ढूंढ रहे हैं। ढूँढने वाला भी विष्णु है। एक महासागर की बूंद, महासागर को ढूंढ रही है। यह बूंद समर्पित होकर स्वयं विष्णु है।

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"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥"
जिसका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है उसे वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है। ॐ ॐ ॐ !!
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"ॐ विश्वं विष्णु: ॐ ॐ ॐ" --- बस इतना ही पर्याप्त है पुरुषोत्तम के गहरे ध्यान में जाने के लिए।।
१५ जनवरी २०२२

हे प्रभु तुम कितने सुन्दर हो ---

 हे प्रभु तुम कितने सुन्दर हो! तुम्हारी सुन्दरता शब्दों में नहीं बंध सकती। मैं तुम्हारे साथ एक हूँ। मुझे कभी भी स्वयं से पृथक ना करो।

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मेरे में बहुत अधिक कमियाँ हैं, जिन्हें दूर करने के लिए अनेक जन्म चाहियें। तब तक और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। आप की आवश्यकता तो मुझे अभी इसी क्षण है। गीता में आपने हमें सर्वप्रथम राग-द्वेष आदि का त्याग करने का आदेश दिया है। फिर संयम और वैराग्य की आवश्यकता बताई है --
"बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।
शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥१८:५१॥"
"विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥१८:५२॥"
"अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१८:५३॥"
"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥१८:५४॥"
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥१८:५५॥"
"सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥१८:५६॥"
"चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥१८:५७॥"
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
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लेकिन राग-द्वेष-अहंकार-काम-क्रोध-परिग्रह, व ममत्व का त्याग अभी तक नहीं कर पाया हूँ। संयम और वैराग्य का नामोनिशान मुझ में नहीं है। अतः असहाय होकर अब आप की ही शरण ले रहा हूँ। अतः जो भी हूँ, जैसा भी हूँ, स्वयं को समर्पित कर रहा हूँ। यह चित्त अब आपका ही है। मेरे पास इस चित्त के सिवाय और कुछ अर्पण करने के लिए है ही नहीं। आपका ही आदेश और आश्वासन है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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अब आप के सिवाय अन्य कोई आश्रय नहीं है। त्राहिमाम् त्राहिमाम् !!
लेकिन निराश नहीं हूँ। आप मेरे हृदय-मंदिर में बिराजमान हैं। आपकी कृपा से सब कुछ संभव है।
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥१८:७८॥"
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जहाँ आप स्वयं हैं, वहाँ मुझे अन्य किसी की भी आवश्यकता नहीं है। आप सदैव मेरे कूटस्थ हृदय-मंदिर में बिराजमान रहो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ जनवरी २०२२