दूसरों के सिर काट कर, या पंजों के बल चलकर, कोई बड़ा नहीं बन सकता। भौतिक, मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक -- हर दृष्टी से हमें स्वयं को बलशाली बनना होगा। पर्वत-शिखर से यदि तालाब में जल आता है तो दोष पर्वत-शिखर का नहीं है। हमें स्वयं को पर्वत शिखर बनना होगा।
Monday, 24 January 2022
दूसरों के सिर काट कर, या पंजों के बल चलकर, कोई बड़ा नहीं बन सकता ---
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हमारे परम आदर्श धनुर्धारी भगवान श्रीराम हैं, जिन्होंने आतताइयों का संहार करने के लिए अस्त्र धारण कर रखे हैं। निज जीवन में भगवान को व्यक्त करें, अपने स्वधर्म का पालन करें, और अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें। हमारी हर कमी दूर हो जाएगी।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१८ जनवरी २०२२
अब कोई कामना नहीं है, एकमात्र अभीप्सा है परमात्मा को पाने की यानि आत्म-साक्षात्कार की ---
इस जीवन में मेरी सदा से ही यह इच्छा रही थी कि मुझे ऐसे ही लोगों का साथ मिले जो जीवन में हर दृष्टिकोण से सफल भी हों, और जिनमें भगवान की भक्ति भी कूट कूट कर भरी हो। जहाँ ऐसे लोग रहते हों, उन्हीं स्थानों पर रहने की इच्छा भी थी। लेकिन मेरी ये मनोकामनायें कभी पूर्ण नहीं हुईं। इतने अच्छे मेरे प्रारब्ध कर्म नहीं थे।
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अब कोई कामना नहीं है। एकमात्र अभीप्सा रमात्माहै प को पाने की, यानि आत्म-साक्षात्कार की। अभी कुछ लिखने की इच्छा नहीं है। अब ऐसा वातावरण मुझ स्वयं को ही निर्माण करना पड़ेगा, जो मेरे अनुकूल हो। किसी से मिलने की, या कहीं जाने की अब कोई कामना नहीं है।
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सर्वप्रथम भगवान की प्राप्ति तो इसी जीवन में अभी इसी क्षण करनी है। भगवान भी अब स्वयं को रोक नहीं सकेंगे। मैं जहाँ भी और जैसे भी हूँ, भगवान को वहाँ आना ही पड़ेगा। मैं न तो कोई नमन कर रहा हूँ और न कोई प्रार्थना कर रहा हूँ। ईश्वर को पाना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। ईश्वर अब और छिप नहीं सकते, उन्हें प्रकट होना ही पड़ेगा। संचित कर्मों की और कर्मफलों की कोई परवाह नहीं है, वे कटते रहेंगे। लेकिन भगवान मुझे इसी क्षण चाहियें। और प्रतीक्षा नहीं कर सकता।
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२२
सनातन धर्मावलम्बियों को चाहिए कि वे ---
सनातन धर्मावलम्बियों को चाहिए कि वे ---
(१) भौतिक, मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक और आध्यात्मिक -- हर दृष्टी से स्वयं बलशाली बनें, और आत्मरक्षा करने में समर्थ हों। अपने स्वधर्म को समझें, और उसका निज जीवन में सपरिवार पालन करें। अपनी संतानों को अच्छे से अच्छे संस्कार और शिक्षा दें। उन्हें भी हर तरह से उच्च-चरित्रवान, सशक्त और आत्मविश्वासी बनायें। उनमें इतना साहस हो कि वे निर्भय होकर अपनी बात कह सकें और अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें। अपनी संतानों को सत्य-सनातन-धर्म की शिक्षा दिलवायें, और उन्हें इतना सक्षम व समर्थवान बनायें कि वे सत्य-सनातन-धर्म की शिक्षा दूसरों को भी दे सकें। समय पर उनका उपनयन संस्कार करवाएँ, उनमें भगवान की भक्ति जागृत कर, उन्हें आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि सिखलाएँ।
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(२) सरकारों पर दबाव डालकर, संविधान से हिन्दू विरोधी प्रावधानों को हटवायें। हिन्दू मंदिरों को सरकारी लूट से बचायें, और यह सुनिश्चित करें कि वे धर्म-शिक्षा और धर्म-प्रसार के केंद्र बनें। सरकारों पर दबाव डालकर "समान नागरिक संहिता", "समान विधान" और "समान कानून" लागू करवायें। हम धर्म-निरपेक्ष नहीं, धर्म-सापेक्ष, धर्मावलम्बी और सत्यनिष्ठ बनें। गुरुकुल शिक्षा-पद्धति पुनर्जीवित की जाये, जहाँ उच्चतम आधुनिक वैज्ञानिक और व्यावसायिक शिक्षा की भी व्यवस्था हो।
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(३) अनुसंधान और शोध द्वारा सच्चा इतिहास लिखा जाए। उसमें कोई झूठ-कपट न हो। उन सब कारणों को दूर किया जाये जिनके कारण हम विदेशी आक्रमणकारियों से पराजित हुए। हमारा गौरवशाली इतिहास सामने लाया जाये, हमारे धर्म-ग्रन्थों की और हमारी ऐतिहासिक विरासत की रक्षा हो।
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(४) हम आत्म-सम्मान से जीयें। एक-दूसरे की सहायता करें, और सुनिश्चित करें कि किसी भी तरह का अभाव हिन्दू समाज में न हो, व कोई भी हिन्दू अभावग्रस्त न हो। गर्व से कहो हम हिन्दू हैं। हमारी हर कमी दूर होगी। हम विश्वगुरु और पूरे विश्व के लिए एक आदर्श होंगे।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२२
हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है ---
हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है। जैसी हमारी पात्रता है, उसी के अनुसार भगवान हमारा मार्गदर्शन करते हैं। भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म है, और यही सनातन धर्म का सार है। हम कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन कर्ताभाव ही हमें कर्मफलों को भोगने को बाध्य करता है। जब तक कर्ताभाव है तब तक यह जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहेगा। इसे कोई नहीं रोक सकता। इस चक्र से मुक्त होने के लिए जीवन में भक्ति, वैराग्य और ज्ञान का होना परम आवश्यक है। हम निमित्त मात्र होकर कार्य करें। भगवान को ही कर्ता बनाएँ। गीता में भगवान कहते हैं ---
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
अर्थात् - "इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
बायें हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होनेके कारण अर्जुन "सव्यसाची" कहलाता है।
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हमारी सबसे बड़ी समस्या है कि हमें भक्ति, वैराग्य और ज्ञान कैसे प्राप्त हों? ये ही हमें असत्य के अंधकार से बचा सकते हैं। हम भगवान को निरंतर अपनी स्मृति में रखें। फिर भगवान को आना ही पड़ेगा। जैसे कोई माता-पिता अपनी संतान के बिना नहीं रह सकते, वैसे ही भगवान भी हमारे बिना नहीं रह सकते। लेकिन वे तभी आयेंगे जब हम उन्हें अपने हृदय का पूर्ण प्यार देंगे।
भगवान कहते हैं ---
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् - "इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥"
(यहाँ 'युद्ध करो' से अभिप्राय है, हर कार्य करो। यह जीवन भी एक युद्धभूमि है जहाँ भगवान स्वयं ही कर्ता हैं, हम तो निमित्त मात्र हैं)
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भगवान को पाने की एक तीब्र अभीप्सा हृदय में निरंतर हो। अभीप्सा का अर्थ है - एक अतृप्त प्यास और तड़प। हमारी साँसें चल रही हैं, यह भगवान की हमारे ऊपर सबसे बड़ी कृपा, और उनकी उपस्थिती का प्रमाण है। भगवान समान भाव से सर्वत्र व्याप्त हैं। उनकी माया के आवरण और विक्षेप ने हमें उन से दूर कर रखा है। यह सारी सृष्टि, सारा ब्रह्मांड, सारा विश्व ही विष्णु का रूप है --
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥" (विष्णु सहस्त्र्नाम प्रथम मंत्र)
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ईशावास्योपनिषद का प्रथम मंत्र कहता है ---
"ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥"
उपरोक्त मंत्र का अर्थ बहुत व्यापक है। इसका सार यही है कि इस सारे जगत में ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। यह उन्हीं के आवास के लिए है। त्यागपूर्वक यानि यह मेरा नहीं है, के भाव से जीवनयापन करें। किसी भी दूसरे की धन-सम्पत्ति पर ललचाई दृष्टि न डालें।
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जैसी हमारी पात्रता है उसके अनुसार भगवान हमारा मार्गदर्शन करते हैं। यह मैं मेरे निजी अनुभव द्वारा कह रहा हूँ। जैसा और जो भी उनसे प्रेरणा मिलती है, वही मेरे माध्यम से लिखा जाता है। मैं अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं लिखता। मेरे हर विचार के पीछे परमात्मा हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२२
हमें भगवान की आवश्यकता अभी इसी समय तुरंत है ---
हमें भगवान की आवश्यकता अभी इसी समय तुरंत है। उनके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते। उनके सिवाय और कुछ चाहिए भी नहीं।
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यह भौतिक-शरीर तो एक आधार है। वास्तविक साधना सूक्ष्म-शरीर में होती है। जब मुझे कारण-शरीर और उससे परे के अनुभव होने लगे थे तब कुछ भ्रम की सी स्थिति उत्पन्न हो गई थी , जो गुरुकृपा से अब नहीं है। थोड़ा बहुत तो अहंकार रहता ही है, क्योंकि यह सृष्टि अहंकार से ही चल रही है। जिस दिन अहंकार नहीं रहेगा उस दिन यह भौतिक शरीर ही नहीं, सूक्ष्म और कारण शरीर व उनकी तन्मात्राएं भी नष्ट हो जायेंगी; और आत्मा का परमात्मा में विलय हो जाएगा।
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गुरुकृपा से इस विषय पर कोई शंका अवशिष्ट नहीं है, लेकिन इसकी सार्वजनिक चर्चा का निषेध है। गुरुकृपा से अनुभूतिजन्य ज्ञान खूब हुआ है, इसलिए उनको सदा नमन करता हूँ। उनके स्मरणमात्र से वेदान्त की अनुभूतियाँ होने लगती हैं।
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जिनके हृदय में नारायण यानि भगवान विष्णु का निवास है, वे ही श्रीमान हैं, क्योंकि नारायण ने अपने हृदय में श्री को रखा हुआ है। जिनके हृदय में नारायण का निवास है, श्री का अनुग्रह यानि कृपा उन्हीं पर होती है। अतः अपने हृदय मंदिर में नारायण को सदा बिराजित रखें। इसी मंगलमय शुभ कामना के साथ आप सब के हृदय में नारायण को नमन !!
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२२
भगवान का ध्यान -- निष्काम कर्मयोग, और सर्वश्रेष्ठ कर्म है ---
भगवान का ध्यान -- निष्काम कर्मयोग, और सर्वश्रेष्ठ कर्म है ---
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यह संसार सृष्टिकर्ता के बनाये हुए नियमों के अनुसार ही चल रहा है, और उन्हीं के अनुसार चलता रहेगा। हम प्रकृति के नियमों को नहीं बदल सकते। कोई कुछ भी कहे, इससे क्या अंतर पड़ता है? हमारा सबसे बड़ा धर्म -- ईश्वर की प्राप्ति है। यही हमें जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकता है। जीवन में हम जो भी हैं, जहाँ भी हैं, अपने संचित और प्रारब्ध कर्मों के कारण हैं। भविष्य में जो भी होंगे, और जहाँ भी होंगे, वह अपने वर्तमान कर्मों के कारण ही होंगे। हमारे विचार और सोच ही हमारे कर्म हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२२
ध्यान साधना क्या है? ---
ध्यान साधना क्या है? ---
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अपने आप को सम्पूर्ण हृदय से, बिना किसी शर्त, और बिना किसी माँग के, भगवान के हाथों में सौंप देना ही ध्यान साधना है। यही उपासना है; और यही एकमात्र निष्काम कर्म है। किसी भी कामना की पूर्ति हमें कभी तृप्त नहीं करती। कामनाओं से मुक्ति ही तृप्ति है। परमात्मा में स्थित होकर ही हम तृप्त हो सकते हैं।
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मार्ग में आने वाली बाधाओं से घबराएँ नहीं। भगवान के आश्वासन हैं --
(१) "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् - "मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥"
(२) "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणम् व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥"
अर्थात् - समस्त धर्मों (सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों का) परित्याग कर और एकमात्र मेरी शरण में आजा; मैं तुम्हें समस्त पापों और दोषों से मुक्त कर दूंगा --- शोक मत कर।
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एक आध्यात्मिक रहस्य ---
"जो लोग भगवान से कुछ माँगते हैं, उन्हें वे वही चीज़ देते हैं जो वे माँगते हैं। परन्तु जो अपने आप को दे देते हैं, और कुछ भी नहीं माँगते, भगवान उन्हें अपना सब कुछ दे देते हैं।"
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न केवल कर्ताभाव, कर्मफल आदि, बल्कि कर्म, और साक्षीभाव या दृष्टाभाव तक भगवान को समर्पित कर दो। साध्य भी वे ही हैं, साधक भी वे ही हैं और साधना भी वे ही है। यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं।
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शांतिपाठ ---
"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥"
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२२
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