Wednesday, 14 October 2026

शक्ति का स्थूल और सूक्ष्म रूप ---

 शक्ति का स्थूल और सूक्ष्म रूप ---

.
बचपन से ही धार्मिकता के संस्कार तो पूर्व जन्म से ही थे। किशोरावस्था से ही ईश्वर की उपासना अकिंचन-भाव से होती थी। कालांतर में यह अकिंचन भाव ही सर्वस्व-भाव बन गया। जीवन की युवावस्था के आरंभ में अंधकार का एक काल आया। युवावास्था के आरंभ में ही मैंने जीवन में अनेक विसंगतियाँ, अभाव और अन्याय देखे थे, जिनका परिणाम यह हुआ कि मैं मार्क्सवाद के घने अंधकार से घिर कर नास्तिक हो गया। यह जीवन का एक अंधकारमय काल था।
.
मेरे साथ सूक्ष्म जगत के संपर्क की अनेक ऐसी अलौकिक असामान्य दिव्य घटनाएँ घटित हुईं हैं जिन पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा। अतः उनकी चर्चा मैं नहीं करूंगा। लगता है पूर्व जन्म में कुछ अच्छे कर्म किए थे, जिनके फल मिलने आरंभ हो गये। पूर्व जन्म की कुछ स्मृतियाँ जागृत हुईं। सूक्ष्म जगत में पूर्व जन्म के जो गुरु थे उनकी भी कृपा हुई। उनकी कृपा से ही जीवन का अंधकार दूर होना आरंभ हो गया। आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, और पुनर्जन्म के सत्य का बोध भी अपने अनुभवों से हुआ।
.
आध्यात्म के इस मार्ग पर जब पदार्पण किया तब साधना का आरंभ मैंने गुरु के आदेशानुसार "अजपा-जप" से किया। फिर उनके आदेशानुसार ही ज्योतिर्मय-ब्रह्म का ध्यान आरंभ किया। यह करते करते गुरु-कृपा से एक तीसरी चीज और जुड़ गई, वह था प्रणव मंत्र का श्रवण। जो बाद में बिना प्रयास के स्वतः ही होने लगा। ये तीनों चीजें आपस में जुड़कर एक हो गईं। निराशा के भी अनेक क्षण आए लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। एक दिन ध्यान करते करते गुरु कृपा से कूटस्थ में ब्रह्म-ज्योति के दर्शन हुए। धीरे-धीरे वह ब्रह्म-ज्योति भी साधना का भाग हो गई। गुरु के आदेशानुसार फिर हठयोग की कुछ मुद्राओं, आसनों, व प्राणायामों आदि का अभ्यास किया। खेचरी मुद्रा मुझे सिद्ध नहीं हुई। तब अर्ध-खेचरी से ही काम चलाने लगा। सन १९८१ के दिसंबर माह में मुझे सूक्ष्म जगत से ही क्रियायोग की दीक्षा प्राप्त हुई। विधिवत दीक्षा सन १९८५ में ली।
.
गीता में भगवान कहते हैं --
"त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥४:२०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष, कर्मफलासक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है॥
"निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४:२१॥"
अर्थात् -- जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है, जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है, ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है॥
"यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥४:२२॥"
अर्थात् -- यदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला, द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित, सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बंधता है॥
.
मेरा अनुभव कहता है कि एक साधक को सर्वप्रथम ईश्वर की शक्ति के स्थूल रूप की साधना द्वारा अनुभूति प्राप्त करनी चाहिए। ईश्वर की शक्ति का स्थूल रूप -- श्वास-प्रश्वास है। हर सांस के साथ ईश्वर का स्मरण हो। उस समय चेतना कूटस्थ में हो। यह साधना अजपा-जप या हंस-गायत्री द्वारा सम्पन्न होती है।
तत्पश्चात् -- शक्ति के सूक्ष्म रूप का ध्यान होता है जो प्राण-तत्व पर होता है। प्राण-तत्व का घनीभूत रूप ही कुंडलिनी महाशक्ति है। इस विषय की सार्वजनिक चर्चा का निषेध है क्योंकि इस साधना में यम-नियमों का पालन अनिवार्य है। बिना यम नियमों के पालन के प्राण-तत्व की सूक्ष्म साधना से मस्तिष्क के विकार हो सकते हैं, जो इस जन्म में ठीक नहीं होते। उन्हें ठीक करने के लिए नया जन्म ही लेना पड़ता है।
गीता के इस विषय पर गीता का एक कूट श्लोक है --
"अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४:२९॥"
अर्थात् -- अन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं, प्राण और अपान की गति को रोककर, वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं॥
गीता में इस विषय पर और भी संकेत हैं ---
"स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥५:२७॥"
अर्थात् -- बाह्य विषयों को बाहर ही रखकर नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके॥"
"यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥५:२८॥"
अर्थात् -- जिस पुरुष की इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयत हैं, ऐसा मोक्ष परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह सदा मुक्त ही है॥
.
उपरोक्त साधनाओं में सिद्ध गुरु का मार्ग दर्शन अनिवार्य है। श्रुति भगवती कहती है कि गुरु वही हो सकता है जो श्रौत्रीय हो यानि जिसे श्रुतियों का ज्ञान हो, और जो ब्रह्मनिष्ठ हो ---
"परीक्ष्य लोकान्‌ कर्मचितान्‌ ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन |
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌ ||"
(मुण्डक. १:२:१२)
अतः किसी ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय गुरु से ही मार्गदर्शन प्राप्त करें।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१४ अक्तूबर २०२६
.
पुनश्च: -- शक्ति का स्थूल रूप शरीर में - श्वास है। शक्ति का सूक्ष्म रूप शरीर में - प्राण है। श्वास का ज्ञान किये बिना प्राण का बोध नहीं किया जा सकता। श्वासों की उपासना करके ही धीरे धीरे शाश्वत परमप्राण (महाप्राण) की अनुभूति होती है।
साधना का परम लक्ष्य है कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन। जो श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं, तंत्र में वे ही परमशिव हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों एक हैं। जो शिव हैं वे ही विष्णु हैं, और जो विष्णु हैं वे ही शिव हैं।
"ॐ शिवाय विष्णु रूपाय शिव रूपाय विष्णवे ।
शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः ॥
यथा शिवमयो विष्णुरेवं विष्णुमयः शिवः ।
यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्तिरायुषि ॥
यथाऽन्तरं न भेदाः स्युः शिवराघवयोस्तथा ॥"

No comments:

Post a Comment