(१) दूसरों से सम्मान की अपेक्षा सबसे बड़ा धोखा है, इससे बचकर रहो।
(२) अंतगति सो मति सो गति।
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अपनी पढ़ाई-लिखाई, धन-संपत्ति और पद का अभिमान, यहाँ तक कि पुण्य का अभिमान भी पतन का सबसे बड़ा कारण है। गीता में भगवान कहते हैं ---
"अमानित्वम् अदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:७॥"
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३:८॥"
"असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||१३:९॥"
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यमराज को सामने देखकर बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। कहते हैं कि यमराज के भैंसे के गले की घंटी की कर्कश ध्वनि सुनकर पूरे जीवन की तस्वीर सामने आ जाती है। इतने में यमराज प्राण हर लेते हैं। इसलिए ईश्वर का स्मरण हर समय रखो। ये पंक्तियाँ पढ़कर (यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो) कृपा कर के गीता के आठवें अध्याय "अक्षरब्रह्म योग" का स्वाध्याय आज से ही कीजिये, बार बार करते रहिए जब तक याद न हो जाये।
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नर्क अनेक हैं और अनेक तरह के हैं। स्वर्ग की कामना भी एक नर्क ही है। ईश्वर की कृपा से एक नर्क की यात्रा मैंने भी की है, इससे स्वर्ग जाने की कामना का कभी जन्म ही नहीं हुआ। इन से परे केवल परमब्रह्म परमात्मा की ही सोचिये।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२६
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