Wednesday, 9 February 2022

हृदय से प्रार्थना करने पर देवता भी प्रार्थना स्वीकार कर कल्याण करते हैं---

 हृदय से प्रार्थना करने पर देवता भी प्रार्थना स्वीकार कर कल्याण करते हैं---

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इस जीवन में इस घटना से पूर्व पहले कभी किसी देवता का न तो आवाहन किया था, और न ही कभी किसी देवता की साधना की थी| पूजा-पाठ में जो करते हैं, वह दूसरी बात है| इस अनुभव से पता चला कि देवता भी मनुष्य का कल्याण करने को आतुर रहते हैं|
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जीवन में पहली और अंतिम बार किसी देवता का एक बार आवाहन और ध्यान किया था, जिसका फल भी तुरंत मिला| बात सितंबर २०२० की है| मैं अपने ब्रह्मलीन बड़े भाई के अस्थि-विसर्जन के लिए परिवार के कुछ अन्य सदस्यों के साथ हरिद्वार गया था| वहाँ ब्रहमकुंड पर तीर्थ-पुरोहित से अस्थि-विसर्जन के समय की पूजा तो परिवार के अन्य सदस्य करवा रहे थे, मैं थोड़ी दूर एकांत में गंगा जी में खड़े होकर पित्तरों के देवता भगवान अर्यमा का ध्यान करने लगा| जैसे-जैसे ध्यान की गहराई बढ़ी, मुझे इस शरीर की चेतना नहीं रही| मेरी ओर किसी ने भी नहीं देखा| अचानक ही मुझे लगा जैसे मेरे चारों ओर एक अति तीब्र प्रकाश है; इतना तीब्र कि नंगी आँखों से उसे कोई देख नहीं सकता| सामने उस तीब्र प्रकाश के मध्य मुझे अति श्वेत प्रकाशमय किसी देवता की अनुभूति हुई जिसकी दृष्टि मेरी ओर थी| आत्म-प्रेरणा से मेरे हृदय से यही प्रार्थना निकली कि "मेरे बड़े भाई की सद्गति हो, और मुझे कुछ भीे नहीं चाहिए|"
वे देव पुरुष यह स्पष्ट आश्वासन मुझे देकर कि मेरे बड़े भाई की सदगति हुई है, और मुझे निश्चिंत रहने को कहकर अनंत में विलीन हो गए|
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मैं जब सामान्य स्थिति में आया तब मुझे पता चला कि समाधि की उस स्थिति में मैं गिर कर पानी में बह भी सकता था, चोट भी लग सकती थी, पर किसी अज्ञात शक्ति ने मेरी रक्षा भी की थी| सबसे बड़ी प्रसन्नता तो इस बात की हुई कि मेरे हृदय से की गई प्रार्थना सुनी गई और फलीभूत भी हुई|
पित्तरों के देवता भगवान अर्यमा को नमन|
ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः|
--- ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय|| ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ फरवरी २०२१

Tuesday, 8 February 2022

मेरी सदगति होगी या दुर्गति ?? मुक्ति किसे मिलती है ?? ---

🥀मेरी सदगति होगी या दुर्गति ?? मुक्ति किसे मिलती है ?? ---
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🥀मेरी जो भी गति होगी वह मेरे कर्मफलों से होगी, न कि किसी कर्मकांड से| श्राद्ध या पिंडदान आदि मुझे मोक्ष नहीं दिला सकते| अपने सारे कर्मफल और सर्वस्व, यहाँ तक कि स्वयं को भी मैंने परमात्मा को अर्पित कर दिया है, अतः परमात्मा की कृपा ही मेरे काम आयेगी, अन्य कुछ भी नहीं| किसी सदगति/दुर्गति या स्वर्ग/नर्क आदि से मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि ये मेरे किसी काम के नहीं हैं| मेरा एकमात्र संबंध केवल परमात्मा से है, वे ही मेरे माँ-बाप, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्री, सगे-संबंधी, मित्र-शत्रु आदि सब रूपों में व्यक्त हुए हैं, अतः उन्हीं का साथ शाश्वत है, अन्य कुछ भी नहीं| इस जन्म से पूर्व भी वे मेरे साथ थे, और इस देह की मृत्यु के पश्चात भी वे ही मेरे साथ रहेंगे| उन्हीं का प्रेम सभी के माध्यम से व्यक्त हुआ है, अतः मेरा एकमात्र संबंध सिर्फ उन्हीं से है| बाकी सब उन्हीं की अभिव्यक्तियाँ हैं|
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🥀किसी का कोई ऋण मुझ पर नहीं है| मेरे सारे पितृगण अब तक मुक्त हो चुके हैं| मैं यह देह नहीं, परमशिव की अनंतता व पूर्णता हूँ| मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे याद करे| किसी को याद ही करना है तो परमात्मा को याद करें| किसी को कुछ अर्पण ही करना है तो स्वयं को ही परमात्मा को अर्पित कर दें|
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🥀मुक्ति किसे मिलती है?? ---
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🥀श्रुति भगवती का कथन है कि जब तक परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं होती, तब तक किसी को मुक्ति नहीं मिल सकती ---
"वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌ |
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ||"
(श्वेताश्वतरोपनिषद्तृतीयोऽध्यायः मंत्र ८)
अन्वय :-- तमसः परस्तात् आदित्यवर्णम् एतत् महान्तं पुरुषम् अहं वेद | तमेव विदित्वा अतिमृत्युम् एति अयनाय अन्यः पन्थाः न विद्यते ||
भावार्थ :-- मैं उस परम पुरुष को जान गया हूँ जो सूर्य के समान देदीप्यमान है और समस्त अन्धकार से परे है| जो उसे अनुभूति द्वारा जान जाता है वह मृत्यु से मुक्त हो जाता है| जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारे का कोई अन्य मार्ग नहीं है|
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🥀सार की बात :--- निज विवेक के प्रकाश में अपने पिण्ड अर्थात् इस शरीर व अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को ईश्वरार्पण कर दें| पहले तो यह भाव रखें कि इस शरीर से मैं जो कुछ भी करूंगा, वह परमात्मा के लिए ही करूंगा| फिर यह भाव दृढ़ करें कि स्वयं परमात्मा ही इस देह को धारण किए हुए हैं| तभी कल्याण हो सकता है, अन्यथा नहीं|
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🥀ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
🥀कृपा शंकर
🥀८ फरवरी २०२१

Wednesday, 26 January 2022

हम किसी की क्या सहायता कर सकते हैं? ---

 हम किसी की क्या सहायता कर सकते हैं? ---

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जब तक हमारे में लोभ और अहंकार है, तब तक हम किसी की कुछ भी सहायता यथार्थ में नहीं कर सकते, स्वयं की भी नहीं| सबसे बड़ी सहायता की आवश्यकता तो असत्य और अज्ञान के अंधकार में डूबे हुये हम स्वयं को है| आध्यात्मिक रूप से एक वीतराग (राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त) व्यक्ति ही किसी की सहायता कर सकता है|
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गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण हमें स्थितप्रज्ञ होने का उपदेश देते हैं| बिना स्थितप्रज्ञ हुए हम परमात्म तत्व को उपलब्ध नहीं हो सकते| परमात्व तत्व की उपलब्धि, यानि आत्म-साक्षात्कार ही सबसे बड़ी सेवा है, जो हम समष्टि की कर सकते हैं| इसके लिए हमें वीतराग, विगतस्पृह, और स्थितप्रज्ञ होना पड़ेगा| यही समत्व है, यही ज्ञान है, यही योग की सिद्धि है, यही ब्राह्मी स्थिति है, यही कूटस्थ-चैतन्य में स्थिति है, और यही ईश्वर की प्राप्ति है| 🌹🕉🌹
सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जनवरी २०२१

जीवन का मूल उद्देश्य है --- शिवत्व की प्राप्ति ---

 जीवन का मूल उद्देश्य है --- शिवत्व की प्राप्ति ---

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हम शिव कैसे बनें एवं शिवत्व को कैसे प्राप्त करें? इस का उत्तर है --- किन्हीं ब्रहमनिष्ठ वेदज्ञ सिद्ध सद्गुरु के मार्गदर्शन व सान्निध्य में कूटस्थ ओंकार रूप शिव का ध्यान, और अजपा-जप| यह किसी कामना की पूर्ती के लिए नहीं, बल्कि कामनाओं के नाश के लिए है| आते जाते हर साँस के साथ उनका चिंतन-मनन और समर्पण -- उनकी परम कृपा की प्राप्ति करा कर आगे का मार्ग प्रशस्त करता है| ऊर्ध्व चेतना की जागृति होने पर अपने आप ही स्पष्ट मार्गदर्शन प्राप्त होने लगता है|
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जिन से जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में व्याप्त है, वे शिव हैं| जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, वे ही शिव हैं| 'शिव' शब्द का अर्थ है -- आनन्द, परम मंगल और परम कल्याण| जिसे सब चाहते हैं और जो सबका कल्याण करने वाला है वही ‘शिव’ है|
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तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है| गीता के भगवान वासुदेव ही वेदान्त के ब्रह्म हैं| वे ही परमशिव हैं| योगमार्ग के पथिकों को ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ यानि शिव बनकर ही शिव की उपासना करनी पड़ती है| जिन्होने वेदान्त को निज जीवन में अनुभूत किया है वे तो इस तथ्य को समझ सकते हैं, पर जिन्होने गीता का गहन स्वाध्याय और ध्यान किया है वे भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे|
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ॐ तत्सत् | शिवोहं शिवोहं अयमात्मा ब्रह्म | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२७ जनवरी २०२१

Monday, 24 January 2022

वाणलिंग क्या होता है? ----

 वाणलिंग क्या होता है? ----

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ओंकारेश्वर के पास में एक "धावड़ी कुंड" नामक स्थान था। वह किसी युग में वाणासुर नाम के एक परम शिवभक्त असुर राक्षस का यज्ञकुंड हुआ करता था। उसने भगवान शिव को प्रसन्न कर के यह वरदान प्राप्त किया कि इस यज्ञकुंड से नर्मदा जी प्रवाहित हों, और यहाँ से निकले शिवलिंग सबसे अधिक पवित्र हों।
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उसका यज्ञकुंड बहुत विशाल था, जिसमें ऊंची-नीची और घुमावदार बहुत सारी चट्टानें थीं। नर्मदा जी बहुत अधिक वेग से वहाँ से बहने लगीं, और वहाँ की ऊंची-नीची-घुमावदार चट्टानों से टूट टूट कर असंख्य शिवलिंग बनने लगे। वैसे तो नर्मदा का हर पत्थर शिवलिंग है जिनको किसी प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन धावड़ी कुंड से निकला शिवलिंग वाणलिंग कहलाता है और सबसे अधिक पवित्र माना जाता है।
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नर्मदा पर बांध बनने से अब तो वह धावड़ी कुंड पानी में डूब गया है, अतः वाणलिंग मिलने बंद हो गए हैं। लेकिन जब पानी का स्तर थोड़ा नीचे होता है तब आसपास के गांवों के कुछ गोताखोर तैराक आपसे कुछ रुपये लेकर गोता लगाकर नीचे से एक विलक्षण शिवलिंग ला देंगे।
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वाणलिंग की पहिचान ---
वाणलिंग को एक तराजू में चावलों से चार-पाँच बार तौला जाता है। जितनी बार भी तोलोगे उतनी ही बार चावलों का परिमाण अलग अलग होगा। यही उसकी पहिचान है। नर्मदा तट पर तपस्या करने वाले अनेक साधु अपनी जटा में वाणलिंग बांध कर रखते हैं। उसकी नित्य पूजा कर बापस अपनी जटा में बांध लेते हैं।
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एक बार घर में वाणलिंग स्थापित करने के बाद उसकी नित्य पूजा होनी चाहिए। घर में रखे वाणलिंग की पूजा न करने से गृहस्थ को पाप लगता है और उसका अनिष्ट होता है।
१० जनवरी २०२२

अपनी कमियों व कर्मों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं ---

 अपनी कमियों व कर्मों के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं ---

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भगवान की कोई इच्छा या अनिच्छा नहीं होती, उनकी कृपा सब पर बराबर है। हम अपनी असफलता/असमर्थता/असहायता के लिए भगवान को दोष देते हैं, यह गलत है। यह झूठ है कि -- वही होता है जैसी भगवान की इच्छा होती है। यहाँ भगवान की कोई इच्छा या अनिच्छा नहीं है, यह सृष्टि अपने नियमों के अनुसार चल रही ही। प्रकृति अपने नियमों से कोई समझौता नहीं करती। उन नियमों को न समझना हमारा अज्ञान है। जिसे हम नहीं समझते, उसे अपना भाग्य कह देते हैं। उस दुर्भाग्य या सौभाग्य के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं, भगवान नहीं।
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गुरुकृपा से मैंने कर्मफलों व पुनर्जन्म को बहुत अच्छी तरह से समझा है, और बहुत कुछ अनुभूत किया है जो अनिर्वचनीय है। मेरी भी अपनी सीमाएँ हैं, विवशता है। अपनी अनुभूतियों को शब्द देने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है। इसमें दोष किसी अन्य का या भगवान का नहीं है; मेरे अपने ही कर्मों का ही है, जिन का फल मैं भुगत रहा हूँ। अपने कई अनुभवों को मैं व्यक्त करना चाहता हूँ, लेकिन अपनी स्वयं कि कमजोरियों के कारण नहीं कर सकता। भगवान ने तो अपनी परमकृपा कर के अपने कई रहस्य मुझ पर अनावृत किए हैं -- जिनकी मुझमें पात्रता थी भी या नहीं, मुझे नहीं पता।
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सब बंधनों को तोड़ने का एकमात्र उपाय है - भगवान की भक्ति (परमप्रेम) और समर्पण; जैसा भगवान ने गीता में बताया है ---
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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इस से अधिक कुछ लिखने की आंतरिक अनुमति मुझे नहीं है। आप सब में परमात्मा को नमन !! ॐ तत्सत् !! हरिः ॐ !!
कृपा शंकर
११ जनवरी २०२२ (23:32hrs.)

मेरे आज्ञाकारी शिष्य, मेरे अनुयायी, मेरे मित्र, और मेरी संतान कौन हैं? ---

 मेरे आज्ञाकारी शिष्य, मेरे अनुयायी, मेरे मित्र, और मेरी संतान कौन हैं? ---

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मेरे विचार ही अब मेरे आज्ञाकारी शिष्य, अनुयायी और मेरी संतान बन गए हैं। उन्हें मैं सजाऊँगा, संवारूंगा, और सर्वश्रेष्ठ बनाऊँगा। मुझे उन पर गर्व है कि वे परमशिव से प्रेम करने लगे हैं। उन्होने मेरा सदा साथ दिया है। उनके भरोसे ही मैं अब निश्चिंत होकर जीवित रहते हुए ही इस भौतिक देह की चेतना से भी बहुत ऊपर उठ सकता हूँ। रात्री में जब तक भगवान की गहनतन अनुभूति न हो तब तक मुझे सोना नहीं चाहिए। यह शरीर याद दिलाएगा कि मैं थक गया हूँ, और विश्राम की आवश्यकता है। लेकिन मुझे उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए, क्योंकि मैं यह शरीर नहीं हूँ। अधिक से अधिक क्या होगा? कुछ भी नहीं, क्योंकि इस शरीर का साथ तो तब तक नहीं छूट सकता जब तक इसके साथ रहने का प्रारब्ध है। लेकिन भगवान का नियमित ध्यान नहीं करने से भगवान को पाने की अभीप्सा ही समाप्त हो सकती है। नित्य नियमित परमशिव में स्थित रहने की उपासना अति अनिवार्य है। इस संसार में सबसे अधिक सुंदर कौन है? जिस के हृदय में भगवान के प्रति कूट कूट कर प्रेम भरा पड़ा है, वही इस संसार का सबसे अधिक सुन्दर व्यक्ति है, चाहे उस की भौतिक शक्ल-सूरत कैसी भी हो। जिसके हृदय में भगवान से प्रेम नहीं हैं है, वह सबसे अधिक वीभत्स और भयावह है।
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"तेरे भावे जो करे भलो-बुरो संसार। नारायण तू बैठ के अपनो भुवन बुहार॥"
मेरे वश में कोई बात नहीं है तो मैं अपनी कमी को ढकने के लिए कभी सृष्टिकर्ता को दोष न दूँ। जो करेगा सो भरेगा। भगवान की चेतना में किया गया हरेक कार्य शुभ ही है। मेरा कार्य भगवान का प्रकाश फैलाना है, न कि अंधकार। जितना अधिक मैं भगवान का ध्यान करता हूँ, उतना ही अधिक मैं स्वयं का ही नहीं, पूरी समष्टि का उपकार करता हूँ। यही एकमात्र और सबसे बड़ी सेवा है जो मैं कर सकता हूँ। किसी भी परिस्थिति में निज विवेक से सर्वश्रेष्ठ कर्म करना मेरा अधिकार व कर्त्तव्य है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२२