Monday, 24 January 2022

योगक्षेमं वहाम्यहम् ---

 योगक्षेमं वहाम्यहम् ---

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यदि श्रीमद्भगवद्गीता के निम्न श्लोक में मेरी सत्यनिष्ठा, पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से हो जाये तो संसार में मेरे लिए कभी किसी भी परिस्थिति में कोई चिंता की बात ही नहीं है। लेकिन स्वयं में ही एक बहुत बड़ी कमी दृष्टिगोचर होती है, जिसे दूर करना है। भगवान श्रीकृष्ण ने यहाँ दो शर्तें रख दी हैं -- एक तो नित्ययुक्त होने की, और दूसरी अनन्यभाव की। दोनों की ही सिद्धि पूर्ण समर्पण माँगती हैं। वेदान्त के दृष्टिकोण से हर बात को बौद्धिक स्तर पर तो बहुत अच्छी तरह समझता हूँ, लेकिन व्यवहार रूप में लाना हरिःकृपा से ही संभव है।
भगवान कहते हैं ---
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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यह श्लोक गीता का मध्यबिन्दु है। यदि यह जीवन में चरितार्थ हो जाये तो आध्यात्मिक और भौतिक क्षेत्र में निश्चित रूप से महान सफलता प्राप्त की जा सकती है। भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में जो कहा है, उसका सार यह है --
"जो निष्कामी अनन्यभाव से युक्त हुए मुझ नारायण को आत्मरूप से जानते हुए मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरी श्रेष्ठ -- निष्काम उपासना करते हैं; निरन्तर मुझ में ही स्थित उन परमार्थज्ञानियों का योगक्षेम मैं चलाता हूँ। अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम क्षेम है। उनके ये दोनों काम मैं स्वयं किया करता हूँ। ज्ञानी को तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूँ, और वह मेरा प्यारा है। इसलिये वे उपर्युक्त भक्त मेरे आत्मरूप और प्रिय हैं। अन्य भक्तों का योगक्षेम भी तो भगवान् ही चलाते हैं, यह बात ठीक है; अवश्य भगवान् ही चलाते हैं किंतु उसमें यह भेद है कि जो दूसरे भक्त हैं, वे स्वयं भी अपने लिये योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा करते हैं। पर अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते; क्योंकि वे जीने और मरने में भी अपनी वासना नहीं रखते। केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।"
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यहाँ एक सामान्य साधक के लिए आचार्य शंकर को समझना कठिन है, लेकिन मुझे तो वे ही समझ में आते हैं। अब मेरा समय आ गया है। इस आयु में स्मृति तेजी से कम होने लगी है। अब निज स्वाध्याय यानि उपासना को क्रमशः गुणवत्ता के हिसाब से भी, और समय की दीर्घता के हिसाब से भी बढ़ाना है। आज ही दिन में मैं एक संबंधी के दाह-संस्कार में गया हुआ था जहाँ अनेक पूर्व घनिष्ठ परिचित मिले। मैंने पाया कि मैं अधिकांश के नाम भूल गया हूँ। मुझे उनके नाम याद करने के लिए चलभास (मोबाइल) की सहायता लेनी पड़ी। यह खतरनाक स्थिति है। अब उपासना काल को यथासंभव अधिकाधिक हर दृष्टि से बढ़ाना है। पता नहीं कौन सी सांस अंतिम हो।
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अंत समय में परमात्मा की पूर्ण चेतना में स्थित, सचेतन रूप से, योगस्थ होकर ही मैं देह-त्याग करूंगा। यह मेरा संकल्प है, कोई अहंकार नहीं। परमात्मा को पूर्णतः समर्पित तो इसी क्षण से होना पड़ेगा।
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आप सब का आशीर्वाद प्रार्थित है। ॐ नमो नारायण !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१६ जनवरी २०२१

वास्तविक मृत्यु तो परमात्मा से विमुखता है ---

शास्त्रों के अनुसार प्रमाद ही मृत्यु है, पर वास्तविक मृत्यु तो परमात्मा से विमुखता हैे। परमात्मा का ध्यान भ्रूमध्य में ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में अजपा-जप (हंस-योग/ हंसवती-ऋक) के साथ कीजिये। इसकी विधि किसी अच्छे संत-महात्मा से सीख लें।

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साथ साथ यह भी आदेश और अनुमति भी किसी अच्छे संत-महात्मा से ले लें कि आपको कम से कम जप इतनी संख्या में अपने स्वभाव के अनुकूल किसी मंत्र का करना ही है। उस संख्या को धीरे धीरे क्रमशः बढ़वाते रहें। मंत्र की दीक्षा भी किसी अच्छे संत-महात्मा से लें।
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देश में अच्छे-अच्छे संत-महात्माओं की कोई कमी नहीं है। जैसी आपकी भावना होगी वैसे ही संत आपको मिलेंगे। भगवान को आप ठगना चाहते हैं तो ठग गुरु ही मिलेंगे। सत्यनिष्ठापूर्वक भगवान से प्रेम करते हैं, तो आपको अच्छे संत मिलेंगे।
मंगलमय शुभ कामनाएँ !!
१७ जनवरी २०२२

मुझे सिर्फ तीन बातें कहनी हैं। कोई चौथी बात नहीं है ---

 मुझे सिर्फ तीन बातें कहनी हैं। कोई चौथी बात नहीं है।

(१) भगवान से प्रेम करो। (२) भगवान से खूब प्रेम करो। (३) भगवान से हर समय प्रेम करो।
अब और कहने को कुछ भी नहीं है। इतना ही पर्याप्त है। . मुझे पिछले साठ-पैंसठ वर्षों से अधिक की स्पष्ट स्मृतियां हैं। देशभक्ति की और भगवान की भक्ति की जो भावनाएं पिछले पाँच-छह वर्षों में बढ़ी हैं, वे अभूतपूर्व हैं। पहले ऐसे कभी भी नहीं हुआ था। लोगों की समझ बढ़ी है। अब का समाज पहले से अधिक जागरूक है। विशेषकर आज की युवा पीढ़ी पहले की युवा पीढ़ी से बहुत अधिक समझदार है।.
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"Free" की राजनीति बंद हो। मुफ्तखोरी देश को बर्बाद कर देगी। सारा बोझ देश के सामान्य श्रेणी के निम्न-मध्यम-वर्ग पर पड़ रहा है। उनकी ही जेब काट कर उन्हीं को देशसेवा, और त्याग-बलिदान का उपदेश दिया जाता है। सभी को समान सुविधाएं दो, या फिर मुफ्तखोरी वाली योजनाएँ बंद करो। चाहते तो यही हैं कि वृद्धावस्था शांति से व्यतीत हो और भगवान का भजन ही करें। लेकिन घर का खर्च ही बड़ी मुश्किल से चला पाते हैं।
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ॐ तत्सत् !!
१७ जनवरी २०२२

देवता हमारी सहायता क्यों नहीं करते? ---

क्योंकि उनकी दृष्टि में हम चोर हैं। देवताओं को हमारा कल्याण करने की शक्ति हमारे द्वारा किए हुए यज्ञों आदि से ही प्राप्त होती है। हम उन्हें यज्ञ आदि द्वारा शक्ति देंगे तो वे उचित समय पर वृष्टि आदि से हमारा कल्याण करेंगे। गीता में भगवान कहते हैं --

"देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥३:११॥"
"इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥३:१२॥"
"यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥३:१३॥"
अर्थात् -- तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे॥ --
यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है॥ --
यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं॥
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मंगलमय शुभ कामनायें और सप्रेम नमन !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१७ जनवरी २०२२

आध्यात्म में कुछ पाने या प्राप्ति की कामना एक मरीचिका है ----

आध्यात्म में कुछ पाने या प्राप्ति की कामना एक मरीचिका है। जो कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है, वह तो हम "स्वयं" हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर मार्ग-दर्शन सब को प्राप्त होता है। कोई यदि यह कहे कि उसे मार्ग-दर्शन नहीं मिला है तो वह झूठ बोल रहा है। भगवान की कृपा सब पर समान रूप से है।

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भगवान गीता में कहते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् - हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
(अनन्यचित्त अर्थात् नित्य-समाधिस्थ जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा का स्मरण करता है। सततम् का अर्थ है निरंतरता। नित्यशः का अर्थ है नित्य जीवन पर्यंत। ऐसे व्यक्ति को भगवान की प्राप्ति अनायास ही हो जाती है)
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यह विषय बहुत अधिक गहन और बहुत अधिक लंबा है जिसका कोई अंत नहीं है। अतः इसका समापन यहीं कर रहा हूँ। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२२

हमारी मौन प्रार्थना निश्चित रूप से कब सुनी जाती है? ---

 (प्रश्न) : हमारी मौन प्रार्थना निश्चित रूप से कब सुनी जाती है?

(उत्तर) : संध्या काल में। (संध्याकाल क्या है? इसे समझाने का प्रयास कर रहा हूँ)
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एक बड़े रहस्य की बात है। हमारे भाव ही हमारी मौन प्रार्थनाएँ हैं। साधनाकाल में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब हमारी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से दैवीय शक्तियों तक पहुँचती हैं, और वे हमारा कल्याण करती हैं। हमारा आचरण सही है तो स्वयं भगवती हमारा कल्याण करती हैं। बात चल रही थी 'संध्या काल' की। वैसे तो सूर्योदय से पूर्व के २४ मिनट, और सूर्यास्त के बाद के २४ मिनट 'संध्या काल' होते हैं। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से हमारे हर श्वास-प्रश्वास और प्रश्वास-श्वास के मध्य के वे संधिक्षण जब बिना किसी प्रयास के स्वतः ही सांस नहीं चल रही है, संध्याकाल हैं। उन क्षणों में हम अहंकार से मुक्त होते हैं, और हमारे भाव यानि मौन प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से परमात्मा तक पहुँचती हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य 'भगवत्-प्राप्ति है, अतः हमें उन क्षणों में भगवान में स्थित होना चाहिए।
वैसे तो हर समय हमें भगवान में स्थित होना चाहिए। जो सांसें हम ले रहे हैं या छोड़ रहे हैं, वे भगवान स्वयं ही ले और छोड़ रहे हैं। हमारी हर सांस परमात्मा की अभिव्यक्ति है। लेकिन जिन संधि क्षणों में हमारी सांसें स्वभाविक रूप से थमी हुई हैं, हम भगवान के साथ एक हैं। उन संधि क्षणों में की गई उपासना सर्वश्रेष्ठ संध्या है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२२

सारी साधनाएँ एक बहाना मात्र है, वैसे ही जैसे किसी बच्चे के हाथ में खिलौना ---

 सारी साधनाएँ एक बहाना मात्र है, वैसे ही जैसे किसी बच्चे के हाथ में खिलौना ---

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सारी आध्यात्मिक सिद्धियाँ और ज्ञान, यहाँ तक की हमारा कल्याण भी हरिःकृपा पर निर्भर है, न कि किसी साधना पर। सारी साधनाएँ तो एक बहाना मात्र ही हैं, वैसे ही जैसे किसी बच्चे के हाथ में कोई खिलौना पकड़ा देते हैं। आवश्यक नहीं है कि शरणागति से भी कल्याण हो जाये। भगवान सिर्फ हमारा प्रेम और सत्यनिष्ठा देखते हैं।

जीवन का हर पल परमात्मा को निरंतर समर्पित है। कभी मृत्यु होगी तो वह इस देह की ही होगी, मैं तो शाश्वत आत्मा हूँ, जो परमात्मा के साथ एक है। मेरा अस्तित्व ही परमात्मा की अभिव्यक्ति है। अब तक के सभी जन्मों के सारे गुण-दोष, संचित व प्रारब्ध कर्मफल, और सर्वस्व परमात्मा को समर्पित है। मेरा एकमात्र संबंध परमात्मा से है। परमात्मा के अतिरिक्त मेरा अन्य किसी से किसी भी तरह का कोई संबंध अब नहीं रहा है। मेरा कोई पृथक अस्तित्व भी नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२२