मैंने भारत के इतिहास को कभी कभी जब भी अवसर मिला, अपनी बौद्धिक क्षमतानुसार विस्तार से पढ़ने का प्रयास किया है। दूसरे देशों -- तिब्बत, रूस, मध्य-एशिया, मंगोलिया और तुर्की के इतिहास में भी रुचि रही है। सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) और खिलाफ़त (खलीफ़ाओं की हुकूमत) के बारे में भी काफी कुछ पढ़ा है। मुझे इस्तांबूल (तुर्की) में ऐतिहासिक आकर्षण के सबसे बड़े केंद्र सोफिया हागिया को भी देखने का अवसर मिला है। तुर्की के कमाल अतातुर्क उर्फ मुस्तफ़ा कमाल पाशा (१८८१-१९३८) के उस साक्षात्कार के बारे में भी पढ़ा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर भारत पर ब्रिटिश काबिज नहीं होते तो गज़वा-ए-हिन्द यानी भारत पर इस्लामिक राज्य के रूप में तुर्की के खलीफा के शासन की स्थापना हो जाती।
Wednesday, 17 September 2025
मैंने भारत के इतिहास को कभी कभी जब भी अवसर मिला, अपनी बौद्धिक क्षमतानुसार विस्तार से पढ़ने का प्रयास किया है।
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मैं कमाल पाशा का सम्मान करता हूँ, लेकिन उनका उपरोक्त वक्तव्य अज्ञान पर आधारित असत्य था। सत्य तो यह है कि अंग्रेजों ने भारत की सत्ता मराठों से ली थी।
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मराठों ने मुगल सत्ता को पूरी तरह परास्त कर के सारी सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। कूटनीतिक कारणों से दिल्ली के लालकिले में नाममात्र के मुगल बादशाह को बैठाकर मराठे उसके संरक्षक बन गए थे। मराठा पेशवा यदि अंग्रेजों के छल-कपट के शिकार नहीं हुये होते तो पूरे भारत पर मराठों का हिंदवी साम्राज्य होता।
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पंजाब में पठानों से सिखों की प्राणरक्षा मराठा सेनाओं ने ही की, और मराठा सेना की सहायता से ही महाराजा रणजीतसिंह पंजाब के शासक बने थे।
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जयपुर के महाराजा ने खामखाँ (बिना किसी कारण के) मराठों का विरोध किया तो दौसा जिले में मनोहरपुरा के पास तुंगा नामक गाँव में जयपुर की सेना और मराठों के मध्य एक अनिर्णायक युद्ध हुआ। बाद में सीकर जिले के पाटन नाम के गाँव के पास जयपुर व जोधपुर की संयुक्त सेनाओं के साथ मराठा सेना का युद्ध हुआ, जिसमें मराठा सेना विजयी रही। पाटन के किले पर मराठों ने अधिकार कर लिया। बाद में जयपुर पर भी मराठों ने अपना अधिकार कर लिया। जयपुर और जोधपुर के शासकों ने चौथ (एक-चौथाई खजाना) भेंट में देकर और माफी मांग कर मराठों को अपने यहाँ से विदा किया। मराठों की शत्रुता सिर्फ मुगलों और पठानों से थी, औरों से नहीं। वे औरों से लड़ना भी नहीं चाहते थे।
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औरंगजेब के मरने के बाद शाह वलीउल्लाह देहलवी ने अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह दुर्रानी उर्फ अहमद शाह अब्दाली को यह संदेश भेजा कि आप भारत पर हमला करो भारत के मुसलमान आपका साथ देंगे। फिर पानीपत की तृतीय लड़ाई में पेशवा की सेना को भारत के मुगलों की मदद से विदेशी अहमद शाह दुर्रानी उर्फ अहमद शाह अब्दाली ने हरा दिया और दिल्ली के तख्त पर काबिज हो गया।
(इस विषय पर फिर कभी आऊँगा कि किस तरह मराठों ने प्रतिकार और बदला लिया। यहाँ मैं अपने मूल विषय से भटक गया हूँ, अतः बापस अपने मूल विषय पर आता हूँ)
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प्रथम विश्व युद्ध के समय जब अंग्रेजों से गैलिपोली की लड़ाई में तुर्की हार रहा था, तब तुर्की के खलीफा ने पूरी दुनिया के मुसलमानों के नाम एक मार्मिक अपील की थी कि सारी इस्लामिक उम्मत आकर मेरी सहायता करे। लेकिन खलीफा के आधीन रहे सऊदी अरब, सीरिया, जॉर्डन, बहरीन, कुवैत, लेबनान, मिश्र, मोरक्को आदि सभी देशों ने अंग्रेजों का साथ दिया। किसी भी इस्लामी देश ने खलीफा का समर्थन नहीं किया।
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लेकिन गांधी के नेतृत्व में भारत के मुसलमान तुर्की के खलीफा के लिए आंदोलन करने लगे जिसे खिलाफत आंदोलन कहते हैं। यह आंदोलन भारत की आजादी के लिए नहीं बल्कि तुर्की के खलीफा को बापस अपनी गद्दी पर बैठाने के लिए था। इसी खिलाफत आंदोलन की आड़ में केरल में मोपला मुस्लिमों ने दस-पंद्रह हजार हिंदुओं की हत्या कर दी, क्योंकि अंग्रेजों का तो वे कुछ भी बिगाड़ने में असमर्थ थे। अतः निरीह हिंदुओं को मारकर ही उन्होने खलीफा की हार का बदला लिया।
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उत्तर प्रदेश (उस समय यूनाइटेड प्रोविन्स) से हजारों कट्टर सुन्नी मुसलमानों ने एक फौज बनाई और अफगानिस्तान के रास्ते तुर्की पहुँच कर, खलीफा की सहायता करने का निर्णय लिया। वे अपने हथियारों, धन और परिवारों के साथ अफगानिस्तान पहुंचे। रात के समय अफगान कबीलों के लड़ाकू डकैतों ने आकर उस खलीफा-समर्थक सेना से उनके धन और औरतों को छीन लिया, और सभी आदमियों के गले काट दिये। यह हाल हुआ भारत की इस्लामिक उम्मत का। यहाँ गले काटने वाले भी उम्मत के ही आदमी थे।
कृपा शंकर
१८ सितंबर २०२१
भारत का दुर्भाग्य ---
भारत का दुर्भाग्य ---
भारत के तथाकथित "राष्ट्रपिता महात्मा" ने तुर्की के इस अंतिम खलीफा सुल्तान अब्दुल मजीद (द्वितीय) को बापस अपनी गद्दी पर बैठाने के लिए "खिलाफ़त आंदोलन" आरंभ किया था। इसी आंदोलन ने पाकिस्तान की नींव डाली। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप केरल में मोपला मुसलमान इतने अधिक उत्तेजित हो गये कि अंग्रेजों का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाये, लेकिन लाखों निरीह हिंदुओं की हत्या कर दी। विश्व के किसी भी इस्लामी देश ने इस खलीफे का समर्थन नहीं किया था।
तुर्की की सल्तनत-ए-उस्मानिया से भारत को क्या लेना-देना था? तथाकथित "महात्मा" जी को तुर्की की सल्तनत से प्यार कैसे हो गया?
तुर्की की सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) का ३६ वां खलीफा सुल्तान महमूद (छठा) वहिदेद्दीन अपने महल के पिछवाड़े से अपने प्राण बचाकर भागते हुए। इसका बेटा अब्दुल मजीद (द्वितीय) २३ अगस्त १९४४ को पेरिस में निर्वासित जीवन जीता हुआ मर गया। भारत में गांधी ने उसी को बापस राजगद्दी दिलवाने के किए खिलाफत आंदोलन शुरू किया था।
तुर्की की सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman Empire) का ३६ वां खलीफा सुल्तान महमूद (छठा) वहिदेद्दीन अपने महल के पिछवाड़े से अपने प्राण बचाकर भागते हुए। इसका बेटा अब्दुल मजीद (द्वितीय) २३ अगस्त १९४४ को पेरिस में निर्वासित जीवन जीता हुआ मर गया। भारत में गांधी ने उसी को बापस राजगद्दी दिलवाने के किए खिलाफत आंदोलन शुरू किया था।
जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं, और जहाँ धनुर्धर पार्थ है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है॥
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
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भावार्थ :-- जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं, और जहाँ धनुर्धर पार्थ है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है॥
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यही अंतिम सत्य है। इस से आगे कुछ है ही नहीं। धनुर्धर पार्थ कौन है? हम स्वयं हैं। हमारे समक्ष कौन है? स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। जहाँ ये दोनों हैं, वहीं विजय-विभूति है। बाकी कुछ बचा ही नहीं है। सब कुछ यहीं समाहित हो गया है। समस्त योग और उनके बीज योगेश्वर भगवान से उत्पन्न हुए हैं। सब योगों के ईश्वर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं। जिस पक्ष में गाण्डीव धनुर्धारी पृथापुत्र अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण हैं, उस पक्ष में ही "श्री" और "विजय" रूपी विभूति है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ सितंबर २०२४
Sunday, 14 September 2025
साधना तो शक्तिरूपा माँ भगवती स्वयं कर रही हैं ---
साधना तो शक्तिरूपा माँ भगवती स्वयं कर रही हैं ---
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साधना तो शक्तिरूपा माँ भगवती स्वयं कर रही हैं, प्राण-तत्व के रूप में| जिनकी साधना वे कर रही हैं, वे आकाश-तत्व से भी परे परमशिव हैं| वे ही विष्णु हैं, वे ही नारायण हैं, और वे ही परमब्रह्म हैं|
फिर हम कौन हैं? हम उनकी विराट अनंतता हैं, यह भौतिक देह नहीं| कर्ताभाव से मुक्त हों| परमात्मा की अनंतता में स्थिर रहो, लक्ष्य हमारा परमशिव है, कर्ता तो जगन्माता हैं| वे ही साधक हैं, हम नहीं| हम तो निमित्त मात्र हैं| जैसे जैसे समर्पण में पूर्णता आयेगी, यह बात भी समझ में आने लगेगी|
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अपने सच्चिदानंद रूप में स्थित हो जाना ही मोक्ष है| परब्रह्म ही जीव और जगत् के सभी रूपों में व्यक्त है| वही जीवरूप में भोक्ता है और वही जगत रूप में भोग्य| जीवन में हम एक-दूसरे के रूप में स्वयं से ही मिलते रहते हैं| हम सब जो में व्यक्त है, वही परमात्मा है| हम उन के साथ एक हैं| ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
सितंबर १४, २०२०
हम पाशों से बंध कर पशु बन जाते हैं ---
हम पाशों से बंध कर पशु बन जाते हैं| मुख्य पाश तीन हैं :---
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(१) पहला सबसे बड़ा पाश जिसने हमें पशु बना रखा है वह है ..... "काम वासना"| "काम" और "राम" दोनों विपरीत बिंदु हैं|
"जहाँ राम तहँ काम नहीं, जहाँ काम नहीं राम |
तुलसी कबहूँ होत है, रवि रजनी एक धाम ||"
जिस प्रकार सूर्य और रात्री एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही काम और राम एक साथ नहीं रह सकते| यह जीवन भी काम से राम के बीच की यात्रा है|
मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में वासनाएँ नीचे के तीन चक्रों में रहती हैं| गुरु का स्थान आज्ञाचक्र और सहस्त्रार है| परमात्मा की अनुभूति सहस्त्रार से भी ऊपर होती है| परमात्मा के मार्ग में काम-वासना सबसे बड़ी बाधा है| कामजयी ही राम को पा सकता है| जिसने काम जीता, उसने जगत को जीता| ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है, जिसके लिए देवता भी तरसते हैं|
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(२) दूसरा पाश है .... राग-द्वेष | इसे समझना थोड़ा कठिन है| फिर भी शांत मन से चिंतन किया जाए तो यह समझ में आ जाता है|
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(३) तीसरा पाश है ... अहंकार| क्रोध इसी का भाई है| और भी छोटे-मोटे इसके कई साथी हैं|
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इन सब पाशों में जो बंधा है वह पशु है| इन सब पाशों से मुक्त होकर अपने सच्चिदानंद स्वरुप में स्थित होना ही "मुक्ति" है, और उपरोक्त पाशों से से मुक्त होना ही "ज्ञान" है| जो इन पाशों से मुक्त है वही वास्तविक "ज्ञानी" है |
जो विद्या हमें इस मार्ग पर ले चलती है वही "पराविद्या" है और जो उसका उपदेश देकर हमें साथ ले चलता है वही "सद्गगुरु" है|
ॐ तत्सत् ! बहुत बड़ी बात कर गया जो नहीं करनी चाहिए थी| छोटे मुंह बड़ी बात हो गयी| कुछ अधिक ही कह गया जिसके लिए क्षमा चाहता हूँ|
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आप सब मेरी निजात्मा हो, परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हो, सच्चिदानंद स्वरुप हो| आप सब को नमन! भगवान "पशुपति" सदाशिव हम सबका कल्याण करें|
ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ सितंबर २०१९
वर्तमान परिस्थितियों में सनातन धर्म के लिए हम क्या कर सकते हैं ?
प्रश्न : वर्तमान परिस्थितियों में सनातन धर्म के लिए हम क्या कर सकते हैं ?
उत्तर : वर्तमान परिस्थितियों में एकमात्र कार्य जो हम सनातन धर्म के लिए कर सकते हैं वह है .... "निज जीवन में धर्म का पालन" | अन्य लोग क्या कर रहे हैं और क्या नहीं कर रहे हैं इसकी चिंता छोड़कर निज जीवन को धर्ममय बनाओ | इसे हम सब अच्छी तरह समझते हैं | स्वयं को धोखा न दें | दुर्भाग्य से वर्तमान में भारत की शिक्षा व्यवस्था और भारत के समाचार माध्यम सनातन धर्म के विरुद्ध हैं, उन पर धर्म विरोधियों का अधिकार है, इस कारण हमारे दिमाग में गलत बातें भरी हुई हैं |
आज़ादी के पश्चात् पहली बार देश में एक राष्ट्रवादी सरकार आई है, जिसका निकट भविष्य तक कोई विकल्प नहीं है | व्यवस्था में अति शीघ्र परिवर्तन नहीं लाया जा सकता, धीरे धीरे सब सुधरेगा | शीघ्र परिवर्तन लाने वाली क्रांतियों ने सर्वत्र विनाश ही विनाश किया है | माली चाहे वृक्ष में सौ घड़े जल नित्य दे पर फल तो ऋतू आने पर ही होंगे |
हर साँस परमात्मा को समर्पित हो | हम अकेले भी होंगे तो भी परमात्मा सदा हमारे साथ रहेंगे |
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
१४ सितम्बर २०१७
रोहिंग्या शरणार्थियों से यह क्यों नहीं कहा जाता कि जिस देश में तुम रहते हो ... उस देश की संस्कृति, सभ्यता और धर्म का सम्मान करो
रोहिंग्या शरणार्थियों से यह क्यों नहीं कहा जाता कि जिस देश में तुम रहते हो ... उस देश की संस्कृति, सभ्यता और धर्म का सम्मान करो, वहाँ लूटमार और हत्याएँ मत करो, महिलाओं का अपहरण और दुराचार मत करो ?
द्वीतीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों ने रोहिंग्या लोगों को खूब हथियार दिए थे जापानियों के विरुद्ध लड़ने के लिए, क्योंकि ये रोहिंग्ये एक दुर्दांत लड़ाकू श्रेणी की जाति है जो अपने से अलग दूसरों के वर्चस्व को स्वीकार नहीं कर सकती| रोहिंग्यों ने उन हथियारों का प्रयोग जापानियों के विरुद्ध तो नहीं किया पर अन्य स्थानीय लोगों को मारने, उनकी महिलाओं का अपहरण करने, और उनकी भूमि पर अधिकार करना आरम्भ कर दिया| सारे आपराधिक कृत्य ये लोग करने लगे, और एक स्वतंत्र "इस्लामिक अराकान देश" के लिए इन्होने गृहयुद्ध छेड़ दिया|
यह गृह युद्ध कई वर्षों तक चला और उसी का परिणाम यह वर्त्तमान समस्या है|
१४ सितंबर २०१७
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