Wednesday, 8 October 2025

जिस घर में नित्य निम्न ८ चौपाइयों का पाठ होता है, उस घर में कभी दरिद्रता नहीं आती ---

 राजस्थान के एक बहुत प्रसिद्ध महात्मा विजय कौशल जी महाराज के श्रीमुख से अनेक बार सुना है कि जिस घर में नित्य निम्न ८ चौपाइयों का पाठ होता है, उस घर में कभी दरिद्रता नहीं आती।

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"जब तें रामु ब्याहि घर आये। नित नव मंगल मोद बधाये॥
भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥
रिधि सिधि संपति नदी सुहायी। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आयी॥
मनिगण पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी॥
मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥
राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥"

"जब तक हम अपनी कामनाओं से निःस्पृह होकर निजस्वरूप आत्मा में स्थित नहीं होते, तब तक यह जीवन कष्टमय और अशांत ही रहेगा।" .

 "जब तक हम अपनी कामनाओं से निःस्पृह होकर निजस्वरूप आत्मा में स्थित नहीं होते, तब तक यह जीवन कष्टमय और अशांत ही रहेगा।"

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गीता के "आत्मसंयम योग" नामक छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण हमें केवल आत्मा में ही स्थित होने को कहते हैं। साथ साथ यह भी बता रहे हैं कि जब तक भोगों की तृष्णा है, तब तक यह संभव नहीं है।
"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥६:१८॥"
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥६:१९॥" (गीता)
इसका भावार्थ होगा कि जैसे वायुरहित स्थान में रखे हुये दीपक की लौ विचलित नहीं होती, वैसी ही हमारे चित्त की गति हो।
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हे प्रभु, मैं कभी तत्व से विचलित न होऊँ, सदा निरंतर आप में स्थित रहूँ, और विषय-वासनाओं का चिंतन भूल से भी न हो।
"नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे।
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥" (रामचरितमानस)
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ॐ तत्सत् !! सोहं !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥ श्रीमते रामचंद्राय नमः॥
कृपा शंकर
२५ सितंबर २०२५

"पूरे भारत में ही नहीं, पूरी सृष्टि में हमारी अस्मिता -- सत्य-सनातन-धर्म (हिंदुत्व) की रक्षा होगी ---

 "पूरे भारत में ही नहीं, पूरी सृष्टि में हमारी अस्मिता -- सत्य-सनातन-धर्म (हिंदुत्व) की रक्षा होगी। चारों ओर छायी हुई असत्य और अंधकार की शक्तियाँ निश्चित रूप से पराभूत होंगी। भारत अपने द्विगुणित परम-वैभव के साथ एक अखंड सत्यधर्मनिष्ठ राष्ट्र बनकर उभरेगा। सारी नकारात्मकतायें भारत से समाप्त होंगी।" --- यह एक दैवीय आश्वासन है, जो कभी असत्य नहीं हो सकता।

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हमारे निज जीवन में हम परमात्मा को निश्चित रूप से अवतरित करेंगे। हरिःकृपा भी निश्चित रूप से हमारे ऊपर फलीभूत होगी। हमारा जीवन परमात्मा को समर्पित है। परमात्मा से पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। हर समय (दिन में चौबीस घंटे, सप्ताह में सातों दिन) सूक्ष्म जगत में आज्ञाचक्र से बहुत ऊपर एक श्वेत ज्योतिः के प्रति सजग रहें। समय के साथ शनैः शनैः वह ज्योतिः एक अति प्रखर और विराट पंचकोणीय नक्षत्र के रूप में व्यक्त होगी जिसके चारों ओर फैला हुआ श्वेत प्रकाश एक नीले आवरण से ढका हुआ होगा। वह नीला आवरण भी एक स्वर्णिम आवरण से ढका हुआ होगा। यह सर्वव्यापी कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म है जिसकी ज्योतिः से प्रणव की ध्वनि भी धीरे धीरे निरंतर निःसृत हो रही है। सारी सृष्टि इनके भीतर और ये सारी सृष्टि के भीतर हैं।
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ये ही मेरी चेतना के केन्द्रबिन्दु और ध्यान के विषय हैं। इनके प्रति सजग रहते हुए ही "अजपा-जप" और "नादानुसंधान" करें। इसके अतिरिक्त मुझे कुछ भी अन्य नहीं कहना है। अंत में सदा एक बात याद रखें कि एकमात्र कर्ता वे परमात्मा ही हैं, हम केवल एक सतत् साक्षी और निमित्त मात्र हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२६ सितंबर २०२५

भगवान अपनी साधना स्वयं ही करते हैं। मैं कोई साधक नहीं हूँ ---

 भगवान अपनी साधना स्वयं ही करते हैं। मैं कोई साधक नहीं हूँ ---

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पूरे अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) की एक ही अभीप्सा है कि नित्य-सचेतन नित्य-नवीन नित्य-वर्तमान सच्चिदानंद परमशिव की चेतना हर समय निज-चैतन्य में छायी रहे। निज विचारों व भावों में भी निरंतर परमशिव रहें। लेकिन होता वही है जैसी उनकी इच्छा होती है। मैं ध्यान तो परमशिव का करने का प्रयास करता हूँ लेकिन एक छवि शांभवी मुद्रा में वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण की भी स्वतः ही आ जाती है। यह अनेक वर्षों से हो रहा है। वे स्वयं अपनी साधना स्वयं करते हैं। मैं केवल एक निमित्त साक्षीमात्र ही बन कर रह गया हूँ। अपनी स्वतंत्र इच्छा से मैं कुछ भी नहीं कर पाता। वैसे परमशिव और पुरुषोत्तम में कोई भेद नहीं है, दोनों एक हैं। वे ही परमब्रह्म हैं, और वे ही सच्चिदानंद हैं।
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मैं ईश्वर के अवतारों में श्रद्धा और विश्वास रखता हूँ। जब निज-चेतना सर्वव्यापी ब्रह्म के साथ एक होने लगती है, तब ही समझ में आता है कि सारे आकार जिसके हैं, वे ही निराकार हैं। जो भी सृष्ट हुआ है वह निराकार से साकार हुआ है। अतः साकार और निराकार दोनों में कोई भेद नहीं है। जो श्रीराम हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं, और वे ही शिव हैं। हरिः और हर में कोई भेद नहीं है।
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जब बात परमात्मा के मातृरूप की आती है, तब विषय थोड़ा सा जटिल होकर परिवर्तित हो जाता है। इस विषय को अपनी स्वयं की अनुभूतियों से समझना बड़ा सरल है, लेकिन किसी अन्य को समझाना बड़ा कठिन है।
तब भगवती स्वयं ही कर्ता होकर स्वयं को कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में व्यक्त कर परमशिव का ध्यान स्वयं करती हैं। दूसरे शब्दों में महाकाली ही एकमात्र कर्ता होकर सारे कर्मफल श्रीकृष्ण को अर्पित करती हैं।
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कुंडलिनी महाशक्ति और परमशिव का मिलन ही योग-साधना की अंतिम परिणिति है। तब स्वयं में और परमात्मा में कोई भेद नहीं रहता। इससे आगे कोई शब्द नहीं है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ सितंबर २०२५

यह ध्यान कौन कर रहा है? क्या यह मेरी "श्रद्धा और विश्वास है?" निजात्मा को प्रत्यगात्मा कहूँ या परमात्मा? वाणी मौन है।

 यह ध्यान कौन कर रहा है? क्या यह मेरी "श्रद्धा और विश्वास है?" निजात्मा को प्रत्यगात्मा कहूँ या परमात्मा? वाणी मौन है।

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"जहाँ है श्रद्धा वहाँ है प्रेम, जहाँ है प्रेम वहीं है शांति। जहाँ होती है शांति, वहीं विराजते हैं ईश्वर। जहाँ विराजते हैं ईश्वर, वहाँ किसी अन्य की आवश्यकता ही नहीं है।"
''भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥" (रा.मा.)
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श्रद्धा-विश्वास परमात्मा में ही सिमट गया है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सत्य का अनुसंधान परमात्मा में ही हो। गीता में भगवान कहते हैं --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
"अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४:४०॥"
अर्थात् -- श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है॥४:३९॥
अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख॥४:४०॥
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किसी में बुद्धिभेद उत्पन्न कर उसकी श्रद्धा को भंग नहीं करना चाहिए। दूसरों को सुधारने का प्रयास -- निज आचरण से ही होना चाहिए। भगवान कहते हैं --
"न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्॥
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥३:२६॥
अर्थात - ज्ञानी पुरुष कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण कर उनसे भी वैसा ही कराये॥
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इस से अधिक और लिखना आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो भी इस लेख को पढ़ रहे हैं, वे सब विवेकशील समझदार मनीषी हैं। परमात्मा के सर्वश्रेष्ठ साकार रूप आप सब को नमन।
"ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव॥"
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ सितंबर २०२५

मैं श्वास क्यों लेता हूँ? ---

 मैं श्वास क्यों लेता हूँ?

मैं आनंदित हूँ, मेरी साँसें चल रही हैं, क्योंकि हरेक साँस के साथ मेरे प्रभु मुझे याद करते हैं। हरेक श्वास के साथ मेरे प्रभु मुझे अपने महासागर की गहनतम गहराई में ले जाते हैं। हरेक प्रश्वास के साथ प्रभु फिर मुझे बापस छोड़ देते हैं। यह महासागर ऊर्ध्व में है, जिसके अस्तित्व का और मार्ग का मुझे बोध है। वास्तव में भगवान स्वयं ही हमारे माध्यम से सांस लेते हैं।

जीवन का सारा भटकाव भगवान विष्णु के चरण कमलों में समर्पित करें। हमारा समर्पण वहीं आकर पूर्ण हो। उनके चरण-कमल प्रकाशमय हैं। उस प्रकाश में ही हम समर्पित हों। यह बड़ी से बड़ी बात है जिसकी कल्पना मैं कर सकता हूँ। इससे आगे कहने के लिए और कुछ भी नहीं है।


हमारी समस्याएँ संसार में हैं, या हमारे मन में? ---

 हमारी समस्याएँ संसार में हैं, या हमारे मन में?

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यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर मैं नहीं दे सकूँगा। इसका उत्तर आप ही देकर मुझे अनुग्रहित कीजिये।
(१) आध्यात्मिक दृष्टी से तो सब समस्याएँ हमारे मन में हैं।
(२) सांसारिक दृष्टी से सब समस्याएँ हमारे चारों ओर की परिस्थितियों में हैं।
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मैनें एक जर्मन यहूदी की आत्मकथा पढी थी जिसकी आँखों के सामने ही उसके माता-पिता और भाई-बहिनों की हत्या कर दी गयी थी। उसके सारे सम्बन्धी प्रताड़ित और यंत्रणा देकर मार दिये गए थे। यंत्रणा शिविर में उसके सारे मित्र पागल होकर मर गये थे। सब तरह की यंत्रणाओं को सहकर और कई दिनों की भूख-प्यास के बावजूद भी उसने अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया, और दृढ़ मनोबल और परमात्मा में आस्था के कारण तब तक जीवित रहा जब तक जर्मनी की हार हुई और अमेरिकी सेनाओं द्वारा जीवित बचे यहूदी बंदियों को बचाया गया।
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भारत के विभाजन के समय हजारों हिन्दू महिलाओं ने नदी में या कुएँ में कूद कर अपने प्राण दे दिए, लाखों हिन्दुओं की हत्याएँ हुईं, रेलगाड़ियों में हज़ारों हिन्दुओं की लाशों को भरकर पकिस्तान से भारत भेजा गया। ऐसे दृश्य देखकर भी अनेक लोग विचलित नहीं हुए। इसके पीछे उनकी आस्था ही थी। यहाँ समस्या मन में नहीं परिस्थितियों में थीं।
किसी भी तरह की विकट से विकट परिस्थिति का हम बिना विचलित हुए सामना तभी कर सकते हैं जब हमारी परमात्मा में अति गहन आस्था हो, अन्यथा नहीं।
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यह संसार परमात्मा की रचना है। उसी के बनाये नियमों से और उसी की इच्छा से यह संसार चल रहा है और चलता रहेगा। बिना किसी अपेक्षा के जीवन में जो भी सर्वश्रेष्ठ हम कर सकते हैं वह ही हमें करना चाहिए और अन्य सब बातों की चिंता छोड़कर परमात्मा का ही चिंतन करना चाहिए। तभी हम सुखी हो सकते हैं।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ अक्तूबर २०२५