साकार या निराकार ? .....
Sunday, 29 June 2025
साकार या निराकार ? .....
मेरी अल्प व सीमित बुद्धि से साकार व निराकार में कोई अंतर नहीं है| जो कुछ भी सृष्ट हुआ है वह सब साकार है, चाहे वह परमात्मा की सर्वव्यापकता हो, या कोई मन्त्र या कोई ज्योति हो या कोई भाव हो| पूरी सृष्टि ही साकार है|
जिसकी सृष्टि ही नहीं हुई है सिर्फ वह ही निराकार है|
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आजकल भगवान की साधना कम, और भगवान के नाम पर व्यापार अधिक हो रहा है| निराकार ब्रह्म की परिकल्पना एक परिकल्पना ही है| हम भगवान के जिस भी रूप की उपासना करते हैं, उपास्य के गुण उपासक में निश्चित रूप से आते हैं|
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योगसुत्रों में भी कहा गया है कि किसी वीतराग पुरुष का चिंतन करने से हमारा चित्त भी वैसा ही हो जाता है| हम भगवान राम का ध्यान करेंगे तो भगवान राम के कुछ गुण हम में निश्चित रूप से आयेंगे| भगवान श्री कृष्ण, भगवन शिव, हनुमान जी, जगन्माता आदि जिस भी किसी के रूप को हम ध्यायेंगे हम भी वैसे ही बन जायेंगे| अतः हमारी क्या अभीप्सा है और स्वाभाविक रूप से हम क्या चाहते हैं, वैसी ही हमारी साधना हो|
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भगवान की साधना सिर्फ भगवान के प्रेम के लिए ही करें| भगवान को अपना अहैतुकी परम प्रेम दें, उनके साथ व्यापार ना करें| भगवान के साथ हम व्यापार कर रहे हैं इसीलिए सारे विवाद उत्पन्न हो रहे हैं| कई हिन्दू आश्रमों में भगवान् श्री कृष्ण के साथ साथ ईसा मसीह की भी पूजा और आरती होती है| कुछ काली मंदिरों में माँ काली की प्रतिमा के साथ मदर टेरेसा के चित्र की भी पूजा होती है| यह एक व्यापार है|
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साकार और निराकार में कोई भेद नहीं है| वास्तव में कुछ भी निराकार नहीं है| जो भी सृष्ट हुआ है वह साकार है| जो स्वयं को निराकार का साधक कहते हैं वे भी या तो भ्रूमध्य में प्रकाश का ध्यान करते हैं या किसी मंत्र का जप या ध्यान करते हैं| वह प्रकाश भी साकार है और मन्त्र भी साकार है| स्वयं को निराकार के साधक बताने वाले अपने गुरु के मूर्त रूप का ध्यान करते हैं, वह भी साकार है| किसी भाव का मन में आना ही उसे साकार बना देता है| अतः इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है| देव भूत्वा देवम यजेत, शिव भूत्वा शिवम यजेत|
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मुझे कोई निराशा, हताशा व संशय आदि नहीं हैं| मेरा चिंतन एकदम स्पष्ट है|
किसी से कोई कामना या अपेक्षा भी नहीं है| भगवान की साधना ही साधना का फल है| वे स्वयं ही साधक, साधना और साध्य हैं| साधना में कोई माँग नहीं बल्कि समर्पण होता है|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
३० जून २०१७
उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ---
उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ---
आसमान में एक उलटा कुआँ लटक रहा है जिसका रहस्य प्रभु कृपा से ध्यान योग साधक जानते हैं| उस कुएँ में एक चिराग यानि दीपक सदा प्रज्ज्वलित रहता है| उस दीपक में न तो कोई ईंधन है, और ना ही कोई बत्ती है फिर भी वह दीपक दिन रात छओं ऋतु और बारह मासों जलता रहता है|
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उस दीपक की अखंड ज्योति में से एक अखंड ध्वनि निरंतर निकलती है जिसे सुनते रहने से साधक समाधिस्थ हो जाता है|
संत पलटूदास जी कहते हैं कि उस ध्वनी को सुनने वाला बड़ा भाग्यशाली है| पर उस ज्योति के दर्शन और उस नाद का श्रवण सद्गुरु के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं करा सकता|
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उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ......
तिसमें जरै चिराग, बिना रोगन बिन बाती |
छह ऋतु बारह मास, रहत जरतें दिन राती ||
सतगुरु मिला जो होय, ताहि की नजर में आवै |
बिन सतगुरु कोउ होर, नहीं वाको दर्शावै ||
निकसै एक आवाज, चिराग की जोतिन्हि माँही |
जाय समाधी सुनै, और कोउ सुनता नांही ||
पलटू जो कोई सुनै, ताके पूरे भाग |
उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ||
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पानी का कुआँ तो सीधा होता है पर यह उलटा कुआँ मनुष्य कि खोपड़ी है जिसका मुँह नीचे की ओर खुलता है| उस कुएँ में हमारी आत्मा यानि हमारी चैतन्यता का नित्य निवास है| उसमें दिखाई देने वाली अखंड ज्योति ..... ज्योतिर्मय ब्रह्म है, उसमें से निकलने वाली ध्वनि ..... अनाहत नादब्रह्म है| यही राम नाम की ध्वनी है|
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'कूटस्थ' में इनके साथ एकाकार होकर और फिर इनसे भी परे जाकर जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त होती है| इसका रहस्य समझाने के लिए परमात्मा श्रोत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सदगुरुओं के रूप में अवतरित होते हैं| यह चैतन्य का दीपक ही हमें जीवित रखता है, इसके बुझ जाने पर देह मृत हो जाती है|
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बाहर हम जो दीपक जलाते हैं वे इसी कूटस्थ ज्योति के प्रतीक मात्र हैं| बाहर के घंटा, घड़ियाल, टाली और शंख आदि की ध्वनी उसी कूटस्थ अनाहत नाद की ही प्रतीक हैं|
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ह्रदय में गहन भक्ति और अभीप्सा ही हमें राम से मिलाती हैं|
ब्रह्म के दो स्वरुप हैं| पहला है "शब्द ब्रह्म" और दूसरा है "ज्योतिर्मय ब्रह्म"| दोनों एक दूसरे के पूरक हैं| आज्ञा चक्र में नियमित रूप से ध्यान लगाने से ही ज्योतिर्मय और शब्द ब्रह्म की अनुभूति होती है|
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प्रिय निजात्मगण, आप सब की भावनाओं को नमन और मेरे लेख पढने के लिए आप सब का अत्यंत आभार| आप सब सदा सुखी एवं सम्पन्न रहें| आप की कीर्ति सदा अमर रहे|
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ॐ तत्सत् | अयमात्मा ब्रह्म | ॐ ॐ ॐ ||
३० जून २०१६
भारत और विश्व में हिंदुओं की और सनातन धर्म की रक्षा कौन करेगा ?
भारत और विश्व में हिंदुओं की और सनातन धर्म की रक्षा कौन करेगा ?
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हमारी सबसे बड़ी पीड़ा है भारत में निरंतर हो रही तमोगुण में वृद्धि, और धर्मांतरण (Religious conversion)। भारत से धर्म का ह्रास -- भारत का विनाश कर देगा। भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। विश्व में कहीं पर भी किसी हिन्दू का, धर्म के आधार पर यदि उत्पीड़न होता है तो उसकी रक्षा भारत सरकार को ही करनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है। यह अति दुःखद है। यूरोप का हर देश और अमेरिका -- ईसाईयों की रक्षा करते हैं, और विश्व का हरेक मुसलमान देश -- मुसलमानों की रक्षा करता है।
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वर्तमान परिस्थितियों में हम असहाय हैं। और तो कुछ नहीं कर सकते लेकिन परमात्मा की साधना तो कर ही सकते हैं। परमात्मा से प्रार्थना करेंगे कि पूरे विश्व में सनातनी हिंदुओं की और धर्म की रक्षा हो।
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धर्म की जय हो॥ अधर्म का नाश हो॥
"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्। दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जून २०२५
Saturday, 28 June 2025
जैसे चुम्बक की सूई का मुख सदा उत्तर दिशा की ओर होता है, ---
जैसे चुम्बक की सूई का मुख सदा उत्तर दिशा की ओर होता है, वैसे ही मेरी चेतना स्वाभाविक रूप से सदा परमशिव परमात्मा की ओर ही रहती है। वे उत्तर दिशा (सहस्त्रारचक्र से बहुत ऊपर ऊर्ध्वस्थ) में परम ज्योतिर्मय रूप में विराजमान हैं, और दक्षिणामूर्ति गुरु रूप में उनका अनुग्रह निरंतर वरष रहा है। मैं धन्य हूँ, मेरा यह जीवन धन्य है कि मुझे उनकी परम कृपा अनुभूत हो रही है।
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सांसारिक रूप से मैं विवश और विकल्पहीन हूँ। पता नहीं किस जन्म में क्या पाप किये थे, जो इस तमोगुणी संसार में जन्म लिया और घर-गृहस्थी, व कुटिल समाज में आकर त्रिशंकु की गति में फँस गया हूँ। कोई बात नहीं, यह इस जीवन का संध्याकाल है, फिर कभी इस ओर मुड़ कर भी नहीं देखूंगा। मेरा एकमात्र आश्रय परमशिव परमात्मा के पद्मपाद (चरण-कमल) हैं, जिनमें शरण मिली हुई है। सुख और शांति के एकमात्र स्त्रोत भी वे ऊर्ध्वस्थ परमशिव ही हैं। वे ही पुरुषोत्तम वासुदेव हैं, और वे ही श्रीराम हैं।
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥१८:५४॥"
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥१८:५५॥"
"सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥१८:५६॥"
"चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥१८:५७॥"
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् --
ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक। समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है॥
(उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है॥
जो पुरुष मदाश्रित होकर सदैव समस्त कर्मों को करता है, वह मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है॥
मन से समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करके मत्परायण होकर बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम सतत मच्चित्त बनो॥
मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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सतत परमात्मा का स्मरण करते हुए (भक्तियोग) हमें परमात्मा के ध्यान आदि का निरंतर अभ्यास (कर्मयोग) करना चाहिये। मच्चित्त होने पर (ज्ञानयोग) परमात्मा की कृपा से समस्त कठिनाइयाँ भी पार हो जायेंगी।
मन का परमात्मस्वरूप में समाहित होना ही गुरुकृपा है। इस गुरुकृपा से अन्तःकरण शुद्ध होता है और विवेक जागृत होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण की चेतावनी भी हमें सदा याद रहे कि यदि अहंकारवश उनके उपदेश का पालन नहीं किया तो हम अपना ही नाश कर लेंगे। यहाँ नाश का यह अर्थ है कि अहंकारवश अपने जीवन के परम पुरुषार्थ को नहीं प्राप्त कर सकेंगे।
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परमात्मा रूपी महासागर में जल की एक बूंद की तरह इसी क्षण छलांग लगा लेते हैं। जो होगा सो देखा जाएगा। उनका आकर्षण बहुत अधिक प्रबल है। ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२३ जून २०२५
"अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥"
"अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥"
अब इस संसार से मन तृप्त हो गया है, और कुछ भी नहीं चाहिये। सप्ताह में सातों दिन, दिन में चौबीस घंटे, हर क्षण चेतना परमात्मा से जुड़ी रहे और परमात्मा का स्मरण करते हुए उन्हीं में विलीन हो जाये। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई विचार भी मन में नहीं आये।
इस संसार के अनुभव अच्छे नहीं थे। दुबारा इधर मुड़कर देखने की भी इच्छा नहीं है।
ॐ तत्सत्॥
२४ जून २०२५
अब इस संसार से मन तृप्त हो गया है, और कुछ भी नहीं चाहिये। सप्ताह में सातों दिन, दिन में चौबीस घंटे, हर क्षण चेतना परमात्मा से जुड़ी रहे और परमात्मा का स्मरण करते हुए उन्हीं में विलीन हो जाये। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई विचार भी मन में नहीं आये।
इस संसार के अनुभव अच्छे नहीं थे। दुबारा इधर मुड़कर देखने की भी इच्छा नहीं है।
ॐ तत्सत्॥
२४ जून २०२५
भगवान यदि मुझसे प्रसन्न नहीं हैं तो कोई दूसरा भक्त ढूंढ़ लें ---
भगवान यदि मुझसे प्रसन्न नहीं हैं तो कोई दूसरा भक्त ढूंढ़ लें। इससे अधिक भक्ति और समर्पण मेरे द्वारा संभव नहीं है। यह उनकी समस्या है, मेरी नहीं।
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पुनश्च : --- सारी सृष्टि कृष्णमय है। वे ही यह विश्व बन गए हैं। कोई अन्य है ही नहीं। मेरे कारण किसी भी प्राणी को कोई कष्ट नहीं हो। मेरे रहने या न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
मेरी प्रथम, अंतिम और एकमात्र प्रार्थना यही है कि "धर्म की जय हो और अधर्म का नाश हो"। जीवन और मृत्यु दोनों में मेरी चेतना परमात्मा के साथ एक रहे। इसके अतिरिक्त मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए।
पुनश्च: --- मेरी किसी भी कमी के लिए भगवान स्वयं ही जिम्मेदार हैं, मैं नहीं। मेरी हर कमी उन की ही कमी है, और मेरा हर गुण उनका ही गुण है। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जून २०२५
"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो।"
"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो।"
यह कोई नारा मात्र ही नहीं, हमारी साधना का एकमात्र उद्देश्य है। ईश्वर के सारे अवतार -- धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए ही अवतृत हुए हैं। सारे महान योगी इसी उद्देश्य के लिए साधना करते हैं। आत्मा का स्वधर्म होता है -- समर्पण द्वारा परमात्मा की प्राप्ति। यह परमात्मा की प्राप्ति यानि भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म है, जिसके लिए हम साधना करते हैं। अनादि काल से भारत के सभी सम्राटों के शासन का लक्ष्य "धर्मरक्षा" ही था। भारत में ऐसे ऐसे महान राजा हुए हैं जिनके राज्य में कोई चोरी नहीं करता था, कोई मदिरापान नहीं करता था, और कोई किसी भी तरह का दुराचार नहीं करता था। धर्म क्या है, इसे मनुस्मृति और महाभारत में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है। वैशेषिक सूत्रों में दी गयी इसकी परिभाषा सर्वमान्य है। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
२६ जून २०२५
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