Sunday, 11 June 2017

जीवन में परमात्मा ही परमात्मा हो, अन्य कुछ भी नहीं .....

जीवन में परमात्मा ही परमात्मा हो, अन्य कुछ भी नहीं ......
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हमारा जीवन प्रभु की चेतना से भरा हुआ हो, जीवन में परमात्मा ही परमात्मा हो, अन्य कुछ भी नहीं| प्रातःकाल भोर में उठते ही परमात्मा को पूर्ण ह्रदय से पूर्ण प्रेममय होकर नमन करें, और संकल्प करें ....... "आज का दिन मेरे इस जीवन का सर्वश्रेष्ठ दिन होगा| मेरा प्रभु को समर्पण बीते हुए कल से बहुत अधिक अच्छा होगा| आज के दिन प्रभु की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति मुझमें होगी| आज की ध्यान साधना बीते हुए कल से और भी अधिक अच्छी होगी|"
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साधना की गहनता और दीर्घता से कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए| सदा ब्रह्मानंद में निमग्न रहने वाले योगी रामगोपाल मजूमदार ने बालक मुकुंद लाल घोष (जो बाद में परमहंस योगानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए) से कहा ......."20 वर्ष तक मैं हिमालय की एक निर्जन गुफा में नित्य 18 घंटे ध्यान करता रहा| उसके पश्चात मैं उससे भी अधिक दुर्गम गुफा में चला गया| वहां 25 वर्ष तक नित्य 20 घंटे ध्यान में मग्न रहता| मुझे नींद की आवश्यकता नहीं पडती थी, क्योंकि मैं सदा ईश्वर के सान्निध्य में रहता था| ...... फिर भी ईश्वर की कृपा प्राप्त होने का विश्वास नहीं है|...."
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परमात्मा अनंत रूप है| एक जीवन के कुछ वर्ष उसकी साधना में बीत जाना कोई बड़ी बात नहीं है| हमारा जीवन ही प्रभु की चेतना से भरा हुआ हो| जीवन में परमात्मा ही परमात्मा हो, अन्य कुछ भी नहीं| उस अनंत के स्वामी के दर्शन समाधी में अवश्य होंगे| उसकी कृपा भी अवश्य होगी| उसके आनंद सागर में स्थिति भी अवश्य होगी| उसके साथ स्थायी मिलन भी अवश्य होगा| जितना हम उसके लिए बेचैन हैं, उससे अधिक वह भी हमारे लिए व्याकुल है|
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ॐ तत्सत् | गुरु ॐ, गुरु ॐ, गुरु ॐ || ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
१० जून २०१६

धर्म की रक्षा ......

धर्म की रक्षा ......
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मैंने पूर्व में कई बार अपना यह विचार व्यक्त किया है कि हम स्वधर्म की रक्षा, स्वधर्म का पालन कर के ही कर सकते हैं| अन्य कोई उपाय नहीं है| इसके लिए सर्वप्रथम तो हमें स्वयं को अपने निज जीवन में सदाचार लाने के लिए यथासंभव यम-नियमों का पालन करना होगा| अपने संस्कारों के बारे में सीखना होगा और उन्हें स्वयं के निज जीवन में उतारना होगा|
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हमारे बच्चे धर्म-रक्षक बनें इसके लिए उनके मन में बाल्यकाल से ही अच्छे संस्कार देने होंगे| बच्चों को किशोरावस्था में प्रवेश करते ही बाल रामायण, बाल महाभारत, पंचतंत्र की कहानियाँ और अच्छे से अच्छा बाल-साहित्य उपलब्ध कराना होगा| साथ साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बालक में आरम्भ से ही अच्छे संस्कार पड़ें| उन्हें भगवान से प्रेम करना और ध्यान साधना भी सिखानी होगी|
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जो वैदिक सनातन धर्म के अनुयायी हैं वे अपने बच्चों की युवावस्था आरम्भ होने से पूर्व ही उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराएँ ताकि वे गायत्री मन्त्र जाप के अधिकारी बनें| किशोरावस्था से ही गायत्री का विधि-विधान से नियमित जप करने से वे मेधावी होंगे|
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अंत में यह बात मैं बार बार दोहराऊँगा कि धर्म की रक्षा धर्म के पालन से ही हो सकती है, सिर्फ बातों से नहीं|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
९ जून २०१७

परमात्मा के ध्यान में जो आनंद मिलता है वही वास्तविक सुख है .....

परमात्मा के ध्यान में जो आनंद मिलता है वही वास्तविक सुख है .....
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सुख और दुःख ये दोनों ही मन की एक अवस्था है| ये अवचेतन मन द्वारा आनंद की खोज का प्रयास है| मेरा अब तक का अनुभव तो यही कहता है कि हम जिस सुख को इन्द्रियों में ढूँढ रहे हैं, अंततः वह दुखदायी है| हमें ध्यान साधना द्वारा स्वयं ही आनंदमय होना होगा| इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सुख हमारे आत्मबल को क्षीण करता है| उससे बुद्धि भी क्षीण होती है, और किसी भी परिस्थिति का सामना करने की सामर्थ्य कम हो जाती है| एक आध्यात्मिक साधक के लिए यह उसे परमात्मा से विमुख करने वाला है| परमात्मा के ध्यान में जो आनंद मिलता है वही वास्तविक सुख है|
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सभी साधक अन्तर्मुखी साधना में समय अधिक से अधिक दें| साधना के नाम पर इन्द्रियों के मनोरंजन को विष के सामान त्याग दें, क्योंकि यह माया का एक धोखा है| परमात्मा से हमारा वही सम्बन्ध है जो जल की एक बूँद का महासागर से है| जल की बूँद का महासागर से वियोग ही दुःखदाई है|
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भगवान की पराभक्ति, और वेदांत व योग दर्शन की बड़ी बड़ी बातें सुनने में और चर्चा करने में बहुत मीठी और अमृत के समान लगती हैं| पर व्यवहारिक रूप से साधना पक्ष अति कठिन है| परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग ऐसा है जिसमें साधना तो स्वयं को ही करनी पड़ती है जो एक बार तो अत्यधिक कष्टमय परिश्रम है| गुरु तो मार्गदर्शन करते हैं, पर चलना तो स्वयं को ही पड़ता है| इसमें कोई लघुमार्ग यानि Short cut नहीं है| बाद में तो यह स्वभाव बन जाता है| प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठना, संध्या, नामजप, अष्टांग योग आदि में बहुत अधिक उत्साह और ऊर्जा चाहिए| कहीं हम साधना के स्थान पर आध्यात्मिक/धार्मिक मनोरंजन में न फँस जाएँ| अतः सतर्क रहें| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
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कृपा शंकर
९ जून २०१७

जब तेल ही बेचना है तब फारसी पढने से क्या लाभ ?

जब तेल ही बेचना है तब फारसी पढने से क्या लाभ ?
यह बात बहुत देरी से समझ में आ रही है|
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"पढ़ें फ़ारसी बेचें तेल" एक बहुत पुराना मुहावरा है| देश पर जब मुसलमान शासकों का राज्य था तब उनका सारा सरकारी और अदालती कामकाज फारसी भाषा में ही होता था| उस युग में फारसी भाषा को जानना और उसमें लिखने पढने की योग्यता रखना एक बहुत बड़ी उपलब्धी होती थी| फारसी जानने वाले को तुरंत राजदरबार में या कचहरी में अति सम्मानित काम मिल जाता था| बादशाहों के दरबार में प्रयुक्त होने वाली फारसी बड़ी कठिन होती थी, जिसे सीखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी|
बादशाहों के उस जमाने में तेली और तंबोली (पान बेचने वाला) के काम को सबसे हल्का माना जाता था| अतः यह कहावत पड़ गयी कि "पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो यह कुदरत का खेल"| अर्थात जब तेल ही बेचना है तो इतना परिश्रम कर के फारसी पढने का क्या लाभ हुआ?
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आध्यात्मिक अर्थ :---
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किसी को आत्मज्ञान ही प्राप्त करना है गुरु प्रदत्त आध्यात्मिक उपासना के द्वारा, तब उसे अपना सम्पूर्ण समय आध्यात्मिक साधना में ही लगाना चाहिए| उसके लिए गहन शास्त्रों का अध्ययन अनावश्यक है| आत्मज्ञान के पश्चात अन्य सारा ज्ञान तो वैसे ही प्राप्त हो जाता है| अतः एक मुमुक्षु को गुरुप्रदत्त उपासना ही करनी चाहिए| जब तेल ही बेचना है यानि आत्मज्ञान ही प्राप्त करना है तब साधना न कर के फारसी पढ़ना यानि शास्त्रों का गहन अध्ययन अनावश्यक है| इति|
ॐ ॐ ॐ ||

विपरीततम परिस्थितियों में महानतम कार्य संभव है, यदि ह्रदय में परमात्मा हो .....


विपरीततम परिस्थितियों में महानतम कार्य संभव है, यदि ह्रदय में परमात्मा हो .....
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कुछ दिन पूर्व इंदौर की प्रातःस्मरणीया, परमभक्त और इस मृत्युलोक की शिव पुत्री महारानी अहिल्याबाई होलकर के बारे में पढ़ रहा था| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है| व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विकटतम कष्ट और प्रतिकूलताओं के पश्चात् भी इन्होने महानतम कार्य किये| इतने महान कार्य कि जिनकी तुलना नहीं की जा सकती|
इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी| इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे| इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए|
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अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की मृत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थी और राज्य संभाला|
अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया| अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया| राजधानी इंदौर उन्हीं की बसाई हुई नगरी है| जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर दिया और उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन कल्याण के व्रत का पालन करती रही| उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया|
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सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की| वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से बने| हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू लोग इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे| सेंकडों असहाय लोगों और साधू संतों को अन्न वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी| पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए| नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं| महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना| अमर कंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया| परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएं कीं| ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की| वहां प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था|
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यहाँ दो शब्द उनके श्वसुर मल्हार राव के बारे में भी लिखना उचित रहेगा|
छत्रपति शिवाजी के पोते साहू जी ने एक चित्तपावन ब्राह्मण बालाजी बाजीराव (प्रथम) को पेशवा नियुक्त किया| बालाजी बाजीराव वेश बदल कर बिना सुरक्षा व्यवस्था के तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े| मार्ग के एक गाँव में उनको मुगलों के जासूसों ने पहचान लिया और उनकी हत्या के लिए बीस मुग़ल सैनिक पीछे लगा दिए| मल्हार राव ने कुछ भैंसे पाल रखीं थीं और उस गाँव में दूध बेच कर गुजारा करते थे| वे मुग़ल जासूस भी उन्हीं से दूध खरीदते थे| उनकी आपसी बातचीत से मल्हार राव को सब बातें स्पष्ट हो गईं| उनकी देशभक्ति जागृत हो गयी और चुपके से उनहोंने पेशवा को ढूंढकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी| यही नहीं पेशवा को एक संकरी घाटी में से सुरक्षित निकाल कर भेज दिया और उनकी तलवार खुद लेकर उन बीस मुगलों को रोकने खड़े हो गए| उस तंग घाटी से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति निकल सकता था| ज्यों ही कोई मुग़ल सैनिक बाहर निकलता, मल्हार राव की तलवार उसे यमलोक पहुंचा देती| उन्होंने पांच मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया| इसे देख बाकी पंद्रह मुग़ल सैनिक गाली देते हुए बापस लौट गए| उन्होंने मल्हार राव के घर को आग लगा दी, उसके बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी व भैंसों को हाँक कर ले गए|
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मल्हार राव, पेशवा बाजीराव के दाहिने हाथ बन कर उनके साथ हर युद्ध में रहे| समय के साथ बाजीराव विश्व के सफलतम सेनानायक बने| उन्होंने अनेक युद्ध लड़े और कभी पराजित नहीं हुए| वे महानतम हिन्दू सेनानायकों में से एक थे| उन्होंने कभी पराजय का मुंह नहीं देखा| उनकी असमय मृत्यु नहीं होती तो भारत का इतिहास ही अलग होता| पेशवाओं ने वर्त्तमान इंदौर क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी|
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हमें गर्व है ऐसी शासिका पर| दुर्भाग्य से भारत में धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ऐसे महान व्यक्तियों के इतिहास को नहीं पढाया जाता| भारत के अच्छे दिन भी लौटेंगे| इस लेख को लिखने के पीछे यही स्पष्ट करना था की यदि ह्रदय में भक्ति और श्रद्धा हो तो व्यक्ति कैसी भी मुसीबतों का सामना कर जीवन में सफल हो सकता है| इति| ॐ स्वस्ति| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
June 08, 2013

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा, किएँ जोग तप ग्यान बिरागा .....

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा, किएँ जोग तप ग्यान बिरागा .....
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बिना परम प्रेम यानि बिना भक्ति के भगवान नहीं मिल सकते| अन्य सभी साधन भी तभी सफल होते हैं जब ह्रदय में भक्ति होती है| जीवन की हर कमी, विफलता, अभाव, दुःख और पीड़ा एक रिक्त स्थान है जिसकी भरपाई सिर्फ प्रभुप्रेम से ही हो सकती है| अपने समस्त अभाव, दुःख और पीड़ाएँ प्रभु को समर्पित कर दो| अपने प्रारब्ध और संचित कर्म भी उन्हें ही सौंप दो| हमारा स्वभाव प्रेम है जिसकी परिणिति आनंद है| कर्ता वे हैं, हम नहीं| सारे कर्म भी उन्हीं के हैं और कर्मफल भी उन्हीं के| साक्षी ही नहीं अपितु दृष्टी, दृष्टा और दृष्य भी वे ही हैं| इस मायावी दुःस्वप्न से जागो और अपने जीवत्व को परम शिवत्व में समर्पित कर दो| संसार में सुख की खोज ही सब दुःखों का कारण है| मनुष्य संसार में सुख ढूंढ़ता है पर निराशा ही हाथ लगती है| यह निराशा सदा दुःखदायी है|
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परमात्मा से अहैतुकी परम प्रेम, आनंददायी है| उस आनंद की एक झलक पाने के पश्चात ही संसार की असारता का बोध होता है| प्रभुप्रेमी की सबसे बड़ी सम्पत्ति, 'उनके' श्री-चरणों में आश्रय पाना है|
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जो योग-मार्ग के पथिक हैं उनके लिए सहस्त्रार ही गुरुचरण है| आज्ञाचक्र का भेदन और सहस्त्रार में स्थिति बिना गुरुकृपा के नहीं होती| जब चेतना उत्तरा-सुषुम्ना यानि आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य विचरण करने लगे तब समझ लेना चाहिए कि गुरु की कृपा हो रही है|
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जब स्वाभाविक और सहज रूप से सहस्त्रार में व उससे ऊपर की ज्योतिर्मय विराटता में ध्यान होने लगे तब समझ लेना चाहिए कि श्रीगुरुचरणों में अर्थात प्रभुचरणों में आश्रय प्राप्त हो रहा है| तब भूल से भी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए| एक साधक योगी की चेतना वैसे भी अनाहत चक्र से ऊपर ही रहती है| सहस्त्रार व उससे ऊपर की स्थायी स्थिति "परमहंस" होने का लक्षण है|
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एकमात्र मार्ग है ..... परम प्रेम, परम प्रेम और परम प्रेम| इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है|
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा, किएँ जोग तप ग्यान बिरागा| बिना प्रेम के राम (परमात्मा) की प्राप्ति नहीं है चाहे कितना भी योग जप तप कर लिया जाये|
रामही केवल प्रेम पिआरा, जान लेहु जो जाननिहारा ||
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गुरु भी कोई हाड -मांस की देह नहीं होती| वह तो एक तत्व चेतना होती है| भगवन शिव ही गुरु रूप में आते हैं| उन्नत अवस्था में गुरु शिष्य में कोई भेद नहीं होता| योगियों के लिए कूटस्थ ही गुरु होता है| समाधी की उन्नत ब्राह्मी अवस्था में कूटस्थ में एक पञ्चकोणीय नक्षत्र के दर्शन होते हैं जो पंचमुखी महादेव हैं| वे ही सद्गुरु हैं| उस नक्षत्र का भेदन कर योगी स्वयं शिवस्वरुप हो जाता है|
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आज के परिप्रेक्ष्य में ब्राह्मण भी वही है जो निरंतर समष्टि के कल्याण की कामना करता है, जिसकी चेतना ऊर्ध्वगामी है, और जिसके ह्रदय में परमात्मा के प्रति कूट कूट कर प्रेम भरा है|
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ॐ शिव ! ॐ शिव ! ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
08June2016

ध्यान करो, मन ध्यान करो, गुरु के वचन का ध्यान करो .......

ध्यान करो, मन ध्यान करो, गुरु के वचन का ध्यान करो .......
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जो हमारे माध्यम से साँस ले रहा है, वह परमात्मा ही है |
जो हमारी आँखों से देख रहा है वह परमात्मा ही है |
जो हमारे ह्रदय में धड़क रहा है वह परमात्मा ही है |
जो हमारे माध्यम से सोच विचार कर रहा है वह परमात्मा ही है |
जो इस देह की सारी क्रियाओं का संचालक है, वह परमात्मा ही है |
जो हमारा प्राण और अस्तित्व है, वह परमात्मा ही है |
जो हमारा प्रेम और आनंद है, वह परमात्मा ही है |
जो कुछ भी हमारा है वह परमात्मा ही है |
हम तो कुछ हैं ही नहीं, सब कुछ तो परमात्मा ही है |
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उस परमात्मा के एक उपकरण मात्र बन जाओ |
उसे स्वयं में प्रवाहित होने दो |
उठते, बैठते, सोते, जागते और सर्वदा उसी के चैतन्य में रहो |
उसे अपना सब कुछ अर्पित कर दो |
कुछ भी बचा कर अपने पास न रखो |
हर साँस पर उसका नाम हो, हर साँस उसी की है, वो ही तो साँस ले रहा है |
वह ही हमारे माध्यम से यह जीवन जी रहा है |
वह ही इस जीवन का एकमात्र कर्ता है |
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सारा प्रेम उसी को दे दो, अपना सारा अस्तित्व उसी को समर्पित कर दो |
उससे पृथकता उसके प्रति परम प्रेम को व्यक्त करने के लिए ही है |
सार की बात यह है कि परमात्मा के एक उपकरण मात्र बन कर परमात्मा को अपना स्वयं का ध्यान करने दो |
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हम कुछ पाने के लिए परमात्मा का ध्यान नहीं कर रहे है, बल्कि उसका दिया सब कुछ उसी को बापस लौटाने के लिए कर रहे हैं, हमें उसी को उपलब्ध होना है क्योंकि हम उसे प्रेम करते हैं |
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उसी के प्रेम में मत्त, स्तब्ध और आत्माराम (आत्मा में रमण करने वाला) हो जाओ |
उस की चेतना में स्वयं को विसर्जित कर दो |
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गुरु रूप में उन्होंने ही ऐसा करने का आदेश दिया है | यह गुरु का आदेश और उपदेश है | कौन क्या कहता है और क्या सोचता है इस का कोई महत्व नहीं है |
हम गुरु और परमात्मा की दृष्टी में क्या हैं, महत्व सिर्फ इसी का है|
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ॐ श्रीगुरवे नमः | ॐ श्रीपरमात्मने नमः | ॐ शिव | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
07June 2016