Friday, 10 April 2026

माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है ---

सत्रहवीं शताब्दी में बंगाल में एक भक्त कवि हुए हैं जिनका नाम रामप्रसाद सेन था| बँगला भाषा में लिखी उनकी रचनाओं को रामप्रसादी बोलते हैं| उनके भक्त बताते हैं कि जगन्माता नित्य उन्हें काली के रूप में दर्शन देतीं और बात भी करती| उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद करवा कर मैनें कई वर्षों पूर्व अध्ययन भी किया था| उनसे जगन्माता कोई वरदान माँगने के लिए कहतीं तो वे माँ से सिर्फ उनका पूर्ण प्रेम ही माँगते| सदा माँ का उत्तर यही होता कि यदि मैं तुम्हें अपना पूर्ण प्रेम दे दूँगी तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा|

माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है| कृपा शंकर
१० अप्रेल २०१९

श्रीराम नवमी की शताधिक मंगलमय शुभकामनाएँ ---

 श्रीराम नवमी की शताधिक मंगलमय शुभकामनाएँ

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"बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥"
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥
गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥
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"सियाराम-मय, सब जग जानी, करहूँ प्रणाम, जोरी जुग-पानी॥"
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२२

Thursday, 2 April 2026

भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है ---

भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष देवता हैं। सफलता उनके पीछे-पीछे चलती है। उन्होंने कभी कोई विफलता नहीं देखी। असत्य और अंधकार की कोई आसुरी शक्ति, उनके समक्ष नहीं टिक सकती। उनसे अधिक शक्तिशाली और ज्ञानी अन्य कोई नहीं है। हनुमान जी की शक्ति ही हम सब की और इस राष्ट्र की रक्षा करेगी।

"अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥"
श्रीहनुमान जी की अनुभूतियाँ हमें गहरे ध्यान में होती है। जब भी हम सांस लेते हैं, तब हम पाते हैं कि वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य विचरण कर रहे हैं। और भी गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र के ऊपर का आवरण हट जाता है, और सूक्ष्म जगत में ईश्वर की अनंतता से भी परे एक ज्योतिर्मय जगत के दर्शन होते हैं जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
श्रुति भगवती जिसके बारे में कठोपनिषद (२.२.१५) व मुंडकोपनिषद (२.२.१०) में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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उपरोक्त अनुभूतियाँ हमें हनुमान जी की परम कृपा से ही होती हैं जो प्राण-तत्व और वायु-तत्व के देवता हैं। वे हमें भक्ति, शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें निस्वार्थ सेवा और समर्पण सिखाते हैं। वे हमारी हर सांस में जीवित और अमर हैं। उनका निवास मेरे हृदय (विचारों व भावों) में और मेरी साँसों में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। ध्यान में उनकी निरंतर अनुभूति मुझे अपनी चेतना में होती है। मुझे अपना माध्यम बना कर वे भगवान श्रीराम का ध्यान स्वयं करते हैं। यह उनकी परम अनुकंपा है। मैं उन्हें नमन करता हूँ। उन्हीं की परम कृपा मुझे राम जी का बोध कराती है।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥" ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर / २ अप्रेल २०२६

Wednesday, 1 April 2026

भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है ---

लोग मुझसे पूछते हैं कि आपने भगवान को क्यों पकड़ रखा है? वास्तविकता यह है कि मैंने भगवान को नहीं पकड़ा, भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है। अब मैं असहाय हूँ। किसी को घने वन में कोई सिंह या व्याघ्र पकड़ ले तो वह मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। जो करना है वह तो सिंह या व्याघ्र ही करेगा। भगवान की पकड़ से मैं बहुत अधिक आनंदित हूँ। उनकी पकड़ बनी रहे, और उसमें निरंतर वृद्धि हो। ॐ तत् सत् !!

कृपा शंकर
२८ मार्च २०२६

उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---

 उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---

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लगता है कि मैंने कभी किसी पूर्वजन्म में कोई पुण्यकार्य किया होगा, जिसका फल अब मिल रहा है। इस जन्म में यदि भूल से भी कुछ अच्छा काम किया है तो वह मुझे याद नहीं है। इस संसार के लिए एक अनुपयुक्त व्यक्ति (Misfit person) मात्र बन कर रह गया हूँ। कहीं भी जाऊँ, कुछ भी करूँ, मन अनायास ही पुराण-पुरुष परमात्मा के चरण-कमलों में स्वतः ही लिप्त हो जाता है। कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ता।
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अब जैसी उन पुराण-पुरुष परमात्मा की इच्छा, जो अनायास ही मुझे प्राप्त हो रहे हैं। अब इसमें आनंद भी आने लगा है। आध्यात्म का कोई भी रहस्य अपने आप में अब रहस्य नहीं रहा है। भगवान सहज रूप से स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं
(यहाँ सहज का अर्थ है— जिसने साथ-साथ जन्म लिया है)।
मैं उन पुराण-पुरुष की शरण में हूँ, जिनकी शरणागति से सभी श्रद्धालुओं ने कृतकृत्य होकर निज जीवन को कृतार्थ किया है। वे पुराण-पुरुष ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। मैं एक अकिंचन निमित्त साक्षी-मात्र, उन्हें नमन करता हूँ। आचार्य शंकर ने अपने ग्रंथ "विवेक चूड़ामणि" के १३१ वें मंत्र में पुराण-पुरुष की वंदना की है --
"एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्ड-सुखानुभूति |
सदा एकरूपः प्रतिबोधमात्र येनइषिताः वाक्असवः चरन्ति ||" ॐ ॐ ॐ !!
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श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन ने पुराण-पुरुष की स्तुति इस प्रकार की है --
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
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मैं पुराण-पुरुष भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व अर्पित करता हूँ। ये मन बुद्धि चित्त अहंकार, कारण सूक्ष्म व भौतिक देह, अपनी तन्मात्राओं सहित सारी इंद्रियाँ, सारा धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे सारे कर्म और उनके फल, सब कुछ उन्हें अर्पित है। स्वयं को भी शरणागति द्वारा उन्हें समर्पित करता हूँ। वे मेरा समर्पण स्वीकार करे।
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"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च,
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
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"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् ,
पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् ,
कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
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कृपा शंकर
२९ मार्च २०२६

नास्तिक व आस्तिक कौन हैं? .

 (प्रश्न) : नास्तिक व आस्तिक कौन हैं?

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(उत्तर) : जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानते, वे नास्तिक हैं। जो वेदों को अपौरुषेय मानते हैं, वे आस्तिक हैं।
भारत के नास्तिक मतों में प्रमुख हैं -- जैन , बौद्ध, व चार्वाक मत।
आज यहाँ चार्वाक मत की ही चर्चा कर रहा हूँ, अन्य नास्तिक मतों की बाद में किसी दिन करूँगा। वर्तमान में चार्वाक मत संगठित मत नहीं है, लेकिन चार्वाक मतानुयायी छद्म रूप से भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में भरे पड़े हैं। भारत में तो उनकी संख्या बहुत अधिक है।
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जीवन में दुख से बचकर अधिकतम इंद्रिय सुख पाने को ही बुद्धिमानी मानना— चार्वाक मत है। यह दर्शन 'भोगवाद' और 'सुखवाद' पर जोर देता है और मृत्यु के बाद जीवन को नहीं मानता। चार्वाक मत केवल प्रत्यक्ष प्रमाण (जो आँखों से दिखे) को स्वीकार करता है। यह आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क और वेदों को पूरी तरह नकारता है। इसका मुख्य सिद्धांत "यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" (जब तक जीओ तब तक सुख से जीओ, उधार लेकर भी घी पीओ) है। किसी भी युक्ति से दूसरों का पैसा हड़पो और खूब मौज-मस्ती करो। दूसरों का पैसा कभी वापस मत करो। ये लोग यदि किसी भगवान को मानते भी हैं तो उसी को मानते हैं, जो उनकी चोरी में सहायक हो। ऐसे लोग भारत में कदम-कदम पर हैं, जो दूसरों को ठगने का अवसर ढूंढते रहते हैं। चार्वाक का नाम उन्होंने कभी सुना नहीं होगा, लेकिन वे कार्य सारा उसी के मतानुसार करते हैं। ये वामपंथी भी चार्वाक से कम नहीं हैं।
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६

ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?

 ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?

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कुछ देर पूर्व ही मन में एक प्रश्न उठा कि हम भटकते क्यों हैं? तभी निम्न पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई, जिन्हें लिख रहा हूँ। आध्यात्मिक साधना में भटकाव का एकमात्र कारण -- हमारा राग-द्वेष और अहंकार है। अन्य कोई कारण नहीं है। भगवान ने इसका निदान "वीतरागता" बतलाया है। राग, द्वेष और अहंकार से मुक्ति ही वीतरागता है। हमारी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित रहे तो हम स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं। वहाँ कोई भटकाव नहीं है। लेकिन एक वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ हो सकता है। वीतराग व्यक्ति ही महत् तत्व से जुड़कर महात्मा कहलाता है। वीतरागता ही महात्मा होने का लक्षण है।
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गुरुकृपा से हम कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते हुए अजपा-जप, और पूर्ण या अर्धखेचरी मुद्रा में ओंकार का श्रवण व जप करते है। यह साधना हमें वीतरागता की ओर अग्रसर करती है। अंततः भगवान की अनुकंपा ही हमें सिद्धि प्रदान करती है। मुख्य बात भगवान की कृपा है। हमें भगवान की परम कृपा कैसे प्राप्त हो? यही हमारे विचार का विषय हो।
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हमारे वश में एक ही बात है, और वह है— भगवान से परम प्रेम। भक्ति-सूत्रों का छठा सूत्र कहता है -- "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति।" यहाँ आत्माराम का अर्थ है आत्मा में रमण। जो आत्माराम है वह बाहरी विषयों की खोज छोड़ देता है, व अपने भीतर ही आत्मा के परमानंद में निरंतर संतुष्ट और लीन रहता है। यह आत्मा में रमण यानि आत्माराम होना भी एक बहुत बड़ी साधना है जो हमें वीतराग बनाती है।
कठोपनिषद में भी इस विषय पर कुछ उपदेश हैं जो हमें -- ''ज्ञानवान, सचेतनमना तथा सदा शुचिमान् होकर परम पद को प्राप्त करने को कहते हैं।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६