Saturday, 28 June 2025

जैसे चुम्बक की सूई का मुख सदा उत्तर दिशा की ओर होता है, ---

 जैसे चुम्बक की सूई का मुख सदा उत्तर दिशा की ओर होता है, वैसे ही मेरी चेतना स्वाभाविक रूप से सदा परमशिव परमात्मा की ओर ही रहती है। वे उत्तर दिशा (सहस्त्रारचक्र से बहुत ऊपर ऊर्ध्वस्थ) में परम ज्योतिर्मय रूप में विराजमान हैं, और दक्षिणामूर्ति गुरु रूप में उनका अनुग्रह निरंतर वरष रहा है। मैं धन्य हूँ, मेरा यह जीवन धन्य है कि मुझे उनकी परम कृपा अनुभूत हो रही है।

.
सांसारिक रूप से मैं विवश और विकल्पहीन हूँ। पता नहीं किस जन्म में क्या पाप किये थे, जो इस तमोगुणी संसार में जन्म लिया और घर-गृहस्थी, व कुटिल समाज में आकर त्रिशंकु की गति में फँस गया हूँ। कोई बात नहीं, यह इस जीवन का संध्याकाल है, फिर कभी इस ओर मुड़ कर भी नहीं देखूंगा। मेरा एकमात्र आश्रय परमशिव परमात्मा के पद्मपाद (चरण-कमल) हैं, जिनमें शरण मिली हुई है। सुख और शांति के एकमात्र स्त्रोत भी वे ऊर्ध्वस्थ परमशिव ही हैं। वे ही पुरुषोत्तम वासुदेव हैं, और वे ही श्रीराम हैं।
.
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥१८:५४॥"
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥१८:५५॥"
"सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥१८:५६॥"
"चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥१८:५७॥"
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् --
ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक। समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है॥
(उस परा) भक्ति के द्वारा मुझे वह तत्त्वत: जानता है कि मैं कितना (व्यापक) हूँ तथा मैं क्या हूँ। (इस प्रकार) तत्त्वत: जानने के पश्चात् तत्काल ही वह मुझमें प्रवेश कर जाता है, अर्थात् मत्स्वरूप बन जाता है॥
जो पुरुष मदाश्रित होकर सदैव समस्त कर्मों को करता है, वह मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से शाश्वत, अव्यय पद को प्राप्त कर लेता है॥
मन से समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करके मत्परायण होकर बुद्धियोग का आश्रय लेकर तुम सतत मच्चित्त बनो॥
मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
.
सतत परमात्मा का स्मरण करते हुए (भक्तियोग) हमें परमात्मा के ध्यान आदि का निरंतर अभ्यास (कर्मयोग) करना चाहिये। मच्चित्त होने पर (ज्ञानयोग) परमात्मा की कृपा से समस्त कठिनाइयाँ भी पार हो जायेंगी।
मन का परमात्मस्वरूप में समाहित होना ही गुरुकृपा है। इस गुरुकृपा से अन्तःकरण शुद्ध होता है और विवेक जागृत होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण की चेतावनी भी हमें सदा याद रहे कि यदि अहंकारवश उनके उपदेश का पालन नहीं किया तो हम अपना ही नाश कर लेंगे। यहाँ नाश का यह अर्थ है कि अहंकारवश अपने जीवन के परम पुरुषार्थ को नहीं प्राप्त कर सकेंगे।
.
परमात्मा रूपी महासागर में जल की एक बूंद की तरह इसी क्षण छलांग लगा लेते हैं। जो होगा सो देखा जाएगा। उनका आकर्षण बहुत अधिक प्रबल है। ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२३ जून २०२५

"अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥"

 "अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति। सब तजि भजनु करौं दिन राती॥"

अब इस संसार से मन तृप्त हो गया है, और कुछ भी नहीं चाहिये। सप्ताह में सातों दिन, दिन में चौबीस घंटे, हर क्षण चेतना परमात्मा से जुड़ी रहे और परमात्मा का स्मरण करते हुए उन्हीं में विलीन हो जाये। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई विचार भी मन में नहीं आये।
इस संसार के अनुभव अच्छे नहीं थे। दुबारा इधर मुड़कर देखने की भी इच्छा नहीं है।
ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
२४ जून २०२५
अब इस संसार से मन तृप्त हो गया है, और कुछ भी नहीं चाहिये। सप्ताह में सातों दिन, दिन में चौबीस घंटे, हर क्षण चेतना परमात्मा से जुड़ी रहे और परमात्मा का स्मरण करते हुए उन्हीं में विलीन हो जाये। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई विचार भी मन में नहीं आये।
इस संसार के अनुभव अच्छे नहीं थे। दुबारा इधर मुड़कर देखने की भी इच्छा नहीं है।
ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
२४ जून २०२५

भगवान यदि मुझसे प्रसन्न नहीं हैं तो कोई दूसरा भक्त ढूंढ़ लें ---

 भगवान यदि मुझसे प्रसन्न नहीं हैं तो कोई दूसरा भक्त ढूंढ़ लें। इससे अधिक भक्ति और समर्पण मेरे द्वारा संभव नहीं है। यह उनकी समस्या है, मेरी नहीं।

.
पुनश्च : --- सारी सृष्टि कृष्णमय है। वे ही यह विश्व बन गए हैं। कोई अन्य है ही नहीं। मेरे कारण किसी भी प्राणी को कोई कष्ट नहीं हो। मेरे रहने या न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
मेरी प्रथम, अंतिम और एकमात्र प्रार्थना यही है कि "धर्म की जय हो और अधर्म का नाश हो"। जीवन और मृत्यु दोनों में मेरी चेतना परमात्मा के साथ एक रहे। इसके अतिरिक्त मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए।
पुनश्च: --- मेरी किसी भी कमी के लिए भगवान स्वयं ही जिम्मेदार हैं, मैं नहीं। मेरी हर कमी उन की ही कमी है, और मेरा हर गुण उनका ही गुण है। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जून २०२५

"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो।"

"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो।"
यह कोई नारा मात्र ही नहीं, हमारी साधना का एकमात्र उद्देश्य है। ईश्वर के सारे अवतार -- धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए ही अवतृत हुए हैं। सारे महान योगी इसी उद्देश्य के लिए साधना करते हैं। आत्मा का स्वधर्म होता है -- समर्पण द्वारा परमात्मा की प्राप्ति। यह परमात्मा की प्राप्ति यानि भगवत्-प्राप्ति ही हमारा स्वधर्म है, जिसके लिए हम साधना करते हैं। अनादि काल से भारत के सभी सम्राटों के शासन का लक्ष्य "धर्मरक्षा" ही था। भारत में ऐसे ऐसे महान राजा हुए हैं जिनके राज्य में कोई चोरी नहीं करता था, कोई मदिरापान नहीं करता था, और कोई किसी भी तरह का दुराचार नहीं करता था। धर्म क्या है, इसे मनुस्मृति और महाभारत में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है। वैशेषिक सूत्रों में दी गयी इसकी परिभाषा सर्वमान्य है। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
२६ जून २०२५

भगवान का बड़े से बड़ा आश्वासन ---

 भगवान का बड़े से बड़ा आश्वासन ---

.
निम्न श्लोक स्वयं भगवान का आश्वासन है इस विश्व को। इससे बड़ा आश्वासन आज तक किसी ने भी नहीं दिया है। थोड़ा बहुत जो भी साधन हम करते है, वह इस संसार (भवसागर) के महाभय से हमारी रक्षा करेगा।
.
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महा भय से रक्षण करता है॥
.
व्याख्या -- आरम्भका नाम 'अभिक्रम' है इस कर्मयोगरूप मोक्षमार्ग में अभिक्रम यानी आरंभ का नाश नहीं होता है। योगविषयक आरंभ का फल अनैकान्तिक (संशययुक्त) नहीं है। इसमें प्रत्यवाय (विपरीत फल) भी नहीं होता है। इस कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी अनुष्ठान (साधन) जन्म-मरण रूप महा संसारभय से हमारी रक्षा करता है।
On this Path, endeavour is never wasted, nor can it ever be repressed. Even a very little of its practice protects one from great danger.
.
वेदों के कर्मकाण्ड में वर्णित यज्ञयागादि के अनुष्ठान में क्रमानुसार क्रिया विधि न करने पर यज्ञ का फल नहीं मिलता। इतना ही नहीं यदि वेद प्रतिपादित कर्मों को न किया जाय तो वह "प्रत्यवाय दोष" कहलाता है जिसका अनिष्ट फल कर्त्ता (जीव) को भोगना पड़ता है। लौकिक फल प्राप्ति में यही बातें देखी जाती हैं। भौतिक जगत् में भी इसी प्रकार के अनेक उदाहरण हैं जैसे गलत औषधियों के प्रयोग से रोगी को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है। कर्म क्षेत्र में इन दोषों के होने से हमें इष्टफल नहीं मिल पाता। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उपर्युक्त दोनों दोषों से सर्वथा मुक्त और सुरक्षित होने का आश्वासन देते हैं।
(उपरोक्त पंक्तियाँ लिखने से पूर्व मैंने दो महान भाष्यकारों के भाष्यों का स्वाध्याय किया था, इसलिए उनके भी अनेक शब्द और भाव यहाँ आ गये हैं। उन महान भाष्यकारों को नमन)
.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जून २०२५
पुनश्च : --- सभी से क्षमा याचना करता हूँ कि चाह कर भी इस विषय को मैं ठीक से समझा नहीं सका। यहाँ मेरा भाषा और शब्दों का ज्ञान काम नहीं आया। फिर भी जो समझना चाहते हैं वे सभी इसे समझ पायेंगे।

धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है ---

 जैसे जैसे मैं इस लोकयात्रा में आगे बढ़ता जा रहा हूँ, यह प्रत्यक्ष अनुभूत कर रहा हूँ कि धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है। हम यथासंभव अपने धर्म का पालन करें, यही रक्षा हम अपने धर्म की कर सकते हैं। हमारा समाज विश्व का सबसे अधिक जागृत, संगठित और प्रबुद्ध समाज है। इसे जगाने की नहीं, स्वयं के जागने की आवश्यकता है। हम स्वयं तो जागते नहीं, और बातें करते हैं समाज को जगाने की। यह अनुचित और गलत है।

.
एक षडयंत्र के अंतर्गत धर्म-निरपेक्षता के नाम पर कानूनी प्रावधानों द्वारा हमारे समाज को धर्म-शिक्षा से वंचित रखा गया है। जब हमारे बालक/बालिकाओं को धर्म की शिक्षा मिलने लगेगी तब हमारा समाज पुनश्च: चैतन्य हो जायेगा। धर्म ही हमारा जीवन है।
.
हम एक शाश्वत आत्मा हैं, यह शरीर नहीं। आत्मा का धर्म है -- परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा। हम परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करेंगे तो समय के साथ स्वयं को परमात्मा के साथ एक पायेंगे। हम कोई पापी नहीं, हम परमात्मा के अमृतपुत्र हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् के द्वितीय अध्याय का पाँचवाँ मंत्र हमें अमृत पुत्र कहता है --
"युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥"
.
गीता में भगवान कहते हैं --
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥२:२२॥"
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
.
भगवान के चरण -चिह्नों का अनुसरण करते हुए मैं प्रार्थना करता हूँ कि अनादि ब्रह्म में हम सब का विलयन हो, परमात्मा की महिमा हम सब में व्यक्त हो, और हम सब परमात्मा के दिव्य धाम में निवास करें॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ जून २०२४

मैं एक अज्ञात प्रेरणावश केवल आत्म-संतुष्टि के लिए कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ ---

 मैं एक अज्ञात प्रेरणावश केवल आत्म-संतुष्टि के लिए कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ। लिखने का अन्य कोई उद्देश्य नहीं है। एक अत्यधिक गहन जिज्ञासावश सनातन धर्म की सभी प्रमुख परम्पराओं के साहित्य का पर्याप्त स्वाध्याय, और प्रायः सभी प्रमुख संप्रदायों के महात्माओं के साथ सत्संग किया था।

.
अब तो कोई अन्य है ही नहीं। एकमात्र अस्तित्व मेरे प्रियतम का है। एक अतृप्त प्यास और तड़प (अभीप्सा) बनी हुई है, जिस का कारण मैं समझने में असमर्थ हूँ। वह अभीप्सा और परमप्रेम ही इस जीवन को चला रहे हैं। जब तक वह अभीप्सा और परमप्रेम तृप्त नहीं होते मैं आप सब के मध्य में हूँ। फिर मुझे आप अपने स्वयं में ही पाओगे।
.
अब और कुछ पढ़ने की इच्छा नहीं होती। भगवान की अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति और समर्पण -- ही मेरा आदर्श है। भगवान अपनी साधना स्वयं ही करते हैं, मैं तो एक निमित्त मात्र भी नहीं, उनका एक विचार और उनके साथ एक हूँ।
.
भगवान की सृष्टि में कोई कमी नहीं है। कमी अगर है तो मेरी समझ और मेरी स्वयं की सृष्टि में ही है। आप सब को मंगलमय शुभ कामनाएँ, नमन और जयगुरु !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ जून २०२२
.
पुनश्च : --- एक अतृप्त प्यास व तड़प (अभीप्सा), और परमप्रेम -- ने ही मुझे अब तक जीवित रखा है। उनकी कभी तृप्ति नहीं हुई। अब समझ में आ रहा है, कि उन का कारण क्या है। वह वेदना और पीड़ा मेरे प्राणों में है। मेरे प्राण तो भगवती स्वयं है, जिन्होंने पूरी सृष्टि को धारण कर रखा है। उनकी कृपा से ही यह पीड़ा शांत होगी।