Saturday, 28 June 2025

भगवान का बड़े से बड़ा आश्वासन ---

 भगवान का बड़े से बड़ा आश्वासन ---

.
निम्न श्लोक स्वयं भगवान का आश्वासन है इस विश्व को। इससे बड़ा आश्वासन आज तक किसी ने भी नहीं दिया है। थोड़ा बहुत जो भी साधन हम करते है, वह इस संसार (भवसागर) के महाभय से हमारी रक्षा करेगा।
.
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् -- इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महा भय से रक्षण करता है॥
.
व्याख्या -- आरम्भका नाम 'अभिक्रम' है इस कर्मयोगरूप मोक्षमार्ग में अभिक्रम यानी आरंभ का नाश नहीं होता है। योगविषयक आरंभ का फल अनैकान्तिक (संशययुक्त) नहीं है। इसमें प्रत्यवाय (विपरीत फल) भी नहीं होता है। इस कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा सा भी अनुष्ठान (साधन) जन्म-मरण रूप महा संसारभय से हमारी रक्षा करता है।
On this Path, endeavour is never wasted, nor can it ever be repressed. Even a very little of its practice protects one from great danger.
.
वेदों के कर्मकाण्ड में वर्णित यज्ञयागादि के अनुष्ठान में क्रमानुसार क्रिया विधि न करने पर यज्ञ का फल नहीं मिलता। इतना ही नहीं यदि वेद प्रतिपादित कर्मों को न किया जाय तो वह "प्रत्यवाय दोष" कहलाता है जिसका अनिष्ट फल कर्त्ता (जीव) को भोगना पड़ता है। लौकिक फल प्राप्ति में यही बातें देखी जाती हैं। भौतिक जगत् में भी इसी प्रकार के अनेक उदाहरण हैं जैसे गलत औषधियों के प्रयोग से रोगी को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है। कर्म क्षेत्र में इन दोषों के होने से हमें इष्टफल नहीं मिल पाता। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ उपर्युक्त दोनों दोषों से सर्वथा मुक्त और सुरक्षित होने का आश्वासन देते हैं।
(उपरोक्त पंक्तियाँ लिखने से पूर्व मैंने दो महान भाष्यकारों के भाष्यों का स्वाध्याय किया था, इसलिए उनके भी अनेक शब्द और भाव यहाँ आ गये हैं। उन महान भाष्यकारों को नमन)
.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जून २०२५
पुनश्च : --- सभी से क्षमा याचना करता हूँ कि चाह कर भी इस विषय को मैं ठीक से समझा नहीं सका। यहाँ मेरा भाषा और शब्दों का ज्ञान काम नहीं आया। फिर भी जो समझना चाहते हैं वे सभी इसे समझ पायेंगे।

धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है ---

 जैसे जैसे मैं इस लोकयात्रा में आगे बढ़ता जा रहा हूँ, यह प्रत्यक्ष अनुभूत कर रहा हूँ कि धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है। हम यथासंभव अपने धर्म का पालन करें, यही रक्षा हम अपने धर्म की कर सकते हैं। हमारा समाज विश्व का सबसे अधिक जागृत, संगठित और प्रबुद्ध समाज है। इसे जगाने की नहीं, स्वयं के जागने की आवश्यकता है। हम स्वयं तो जागते नहीं, और बातें करते हैं समाज को जगाने की। यह अनुचित और गलत है।

.
एक षडयंत्र के अंतर्गत धर्म-निरपेक्षता के नाम पर कानूनी प्रावधानों द्वारा हमारे समाज को धर्म-शिक्षा से वंचित रखा गया है। जब हमारे बालक/बालिकाओं को धर्म की शिक्षा मिलने लगेगी तब हमारा समाज पुनश्च: चैतन्य हो जायेगा। धर्म ही हमारा जीवन है।
.
हम एक शाश्वत आत्मा हैं, यह शरीर नहीं। आत्मा का धर्म है -- परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा। हम परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करेंगे तो समय के साथ स्वयं को परमात्मा के साथ एक पायेंगे। हम कोई पापी नहीं, हम परमात्मा के अमृतपुत्र हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् के द्वितीय अध्याय का पाँचवाँ मंत्र हमें अमृत पुत्र कहता है --
"युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥"
.
गीता में भगवान कहते हैं --
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥२:२२॥"
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
.
भगवान के चरण -चिह्नों का अनुसरण करते हुए मैं प्रार्थना करता हूँ कि अनादि ब्रह्म में हम सब का विलयन हो, परमात्मा की महिमा हम सब में व्यक्त हो, और हम सब परमात्मा के दिव्य धाम में निवास करें॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ जून २०२४

मैं एक अज्ञात प्रेरणावश केवल आत्म-संतुष्टि के लिए कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ ---

 मैं एक अज्ञात प्रेरणावश केवल आत्म-संतुष्टि के लिए कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ। लिखने का अन्य कोई उद्देश्य नहीं है। एक अत्यधिक गहन जिज्ञासावश सनातन धर्म की सभी प्रमुख परम्पराओं के साहित्य का पर्याप्त स्वाध्याय, और प्रायः सभी प्रमुख संप्रदायों के महात्माओं के साथ सत्संग किया था।

.
अब तो कोई अन्य है ही नहीं। एकमात्र अस्तित्व मेरे प्रियतम का है। एक अतृप्त प्यास और तड़प (अभीप्सा) बनी हुई है, जिस का कारण मैं समझने में असमर्थ हूँ। वह अभीप्सा और परमप्रेम ही इस जीवन को चला रहे हैं। जब तक वह अभीप्सा और परमप्रेम तृप्त नहीं होते मैं आप सब के मध्य में हूँ। फिर मुझे आप अपने स्वयं में ही पाओगे।
.
अब और कुछ पढ़ने की इच्छा नहीं होती। भगवान की अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति और समर्पण -- ही मेरा आदर्श है। भगवान अपनी साधना स्वयं ही करते हैं, मैं तो एक निमित्त मात्र भी नहीं, उनका एक विचार और उनके साथ एक हूँ।
.
भगवान की सृष्टि में कोई कमी नहीं है। कमी अगर है तो मेरी समझ और मेरी स्वयं की सृष्टि में ही है। आप सब को मंगलमय शुभ कामनाएँ, नमन और जयगुरु !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ जून २०२२
.
पुनश्च : --- एक अतृप्त प्यास व तड़प (अभीप्सा), और परमप्रेम -- ने ही मुझे अब तक जीवित रखा है। उनकी कभी तृप्ति नहीं हुई। अब समझ में आ रहा है, कि उन का कारण क्या है। वह वेदना और पीड़ा मेरे प्राणों में है। मेरे प्राण तो भगवती स्वयं है, जिन्होंने पूरी सृष्टि को धारण कर रखा है। उनकी कृपा से ही यह पीड़ा शांत होगी।

स्वधर्म और परधर्म व अन्य संबन्धित विषय ---

 स्वधर्म और परधर्म व अन्य संबन्धित विषय ---

.
(१) परमात्मा से परमप्रेम, या आत्म-तत्व में स्थिति को ही हम "स्वधर्म" कह सकते हैं।
(२) इन्द्रिय सुखों की कामना और अहंकार की चेतना में जीना ही "परधर्म" है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार -- स्वधर्म में निधन होना श्रेयष्कर है, और परधर्म भयावह है। परधर्म में निधन से जीव को अत्यधिक भयावह कष्टों से गुजरना पड़ता है। स्वधर्म की चेतना अंतर में होती है।
.
"सर्वधर्म समभाव" क्या है? ---
यह किसी हिन्दुद्रोही सेकुलर मार्क्सवादी विचारक के मस्तिष्क की कल्पना है| धर्म तो एक ही है, वह अनेक कैसे हो सकता है? धर्म है और अधर्म है| धर्म का अर्थ Religion, मजहब या पंथ नहीं है।
.
यदि पंथों और मज़हबों की भी तुलना करें तो जिस भी पंथ या मज़हब की साधना पद्धति से दैवीय और मानवीय गुणों का सर्वाधिक विकास होगा, वह पंथ ही सर्वश्रेष्ठ होगा। यही सिद्ध कर सकता है कि सर्वश्रेष्ठ मार्ग कौन सा है, और सर्वधर्म समभाव क्या है। जो पंथ मनुष्य को असत्य और अन्धकार में ले जाए, वह किसी का आदर्श कैसे हो सकता है?
.
निष्पक्ष रूप से हर मज़हब/पंथ के दो-दो व्यक्तियों को लिया जाए और उन्हें बाहरी प्रभाव से दूर एकांत में कुछ महीनों के लिए रखा जाए। सब से कहा जाए की एकांत में रहते हुए अपने अपने मजहब/पंथ की साधना करें। फिर उन पर निष्पक्ष अध्ययन और शोध किया जाए की किस पंथ वाले में करुणा, प्रेम, सद्भाव और आनंद आदि गुणों का सर्वाधिक विकास हुआ है। आज तक किसी भी पंथ की श्रेष्ठता और सर्वग्राह्यता पर कोई वैज्ञानिक शोध नहीं हुआ है, जो होना ही चाहिए था।
.
किसी का जो भी स्वभाविक गुण-दोष है वह भी उसका धर्म है। शरीर का भी धर्म है -- भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, और सेहत आदि। इन्द्रियों के भी धर्म हैं। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के भी धर्म हैं। मन को यदि अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो मन इतना अधिक भटका देता है कि उस भटकाव से बाहर आना अति कठिन हो जाता है। मन नियंत्रण में है तो वह हमारा परम मित्र है, यह मन का धर्म है। बुद्धि का धर्म विवेक है, अन्यथा तो यह कुबुद्धि है। चित्त स्वयं को श्वास-प्रश्वास और वासनाओं के रूप में व्यक्त करता है, यह उसका धर्म है। यही चित्त की वृत्ति है, जिसके निरोध को योग कहा गया है। हमारा बल प्राणों का धर्म है। सब तरह की उलझनों को छोड़कर भगवान की शरण लेना ही सब धर्मों का परित्याग और शरणागति है। शरणागति भी बहुत बड़ा धर्म है। किसी का जो भी सर्वश्रेष्ठ स्वाभाविक गुण है वह उसका स्वधर्म है, जिसमें निधन को श्रेय दिया गया है।
.
स्वधर्म की चेतना अंतर में होती है, इसका उत्तर निष्ठावान को प्रत्यक्ष परमात्मा से मिलता है, बुद्धि से यह अगम है। नित्य परमात्मा का ध्यान करें, और स्वयं को हर दृष्टिकोण से शक्तिशाली बनायें -- शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक और आध्यात्मिक।
"धर्म" - धारण करने का विषय है, न कि सिर्फ चर्चा या वाद-विवाद का। जीवन में परमात्मा के प्रति परमप्रेम, सत्यनिष्ठा, श्रद्धा-विश्वास; और उन्हें पाने की अभीप्सा होगी, तभी जीवन की सार्थकता है, तभी जीवन में "धर्म" का अवतरण होगा।
परमात्मा हमारे जीवन के केन्द्रबिन्दु हों। निरंतर उनके प्रति समर्पण का भाव हो।
जिनके हृदय में परमात्मा और सनातन धर्म के प्रति प्रेम नहीं हैं, मेरा उनसे कोई संबंध नहीं है।
.
मैं अपने लघु आध्यात्मिक लेखों के साथ-साथ प्रखर राष्ट्र-भक्ति के ऊपर भी लिखता हूँ, क्योंकि मेरे लिए भारत ही सनातन धर्म है और सनातन धर्म ही भारत है। भारत के बिना आध्यात्म की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। परमात्मा की सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारत में ही हुई है। सनातन धर्म ही भारत का भविष्य है, और भारत का भविष्य ही इस पृथ्वी का भविष्य है। इस पृथ्वी का भविष्य ही इस सृष्टि का भविष्य है। भारत का पतन - धर्म का पतन है, और भारत का उत्थान - धर्म का उत्थान है। भारत और आध्यात्म भी एक दूसरे के पूरक हैं।
.
धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जून २०२५

अलादीन के चिराग का जिन्न और हमारा चित्त दोनों एक जैसे ही हैं ---

 अलादीन के चिराग का जिन्न और हमारा चित्त दोनों एक जैसे ही हैं...

=
अलादीन ने चिराग को रगडा तो एक जिन्न (ब्रह्मराक्षस की श्रेणी का एक प्रेत) प्रकट हुआ| जिन्न ने कहा ... मेरे आक़ा, मुझे हुक्म दो मैं क्या काम करूँ? अलादीन जो भी आदेश देता, जिन्न उसे तुरंत पूरा कर देता| जिन्न ने यह भी कहा कि जब तक तुम मुझसे निरंतर काम करवाते रहोगे मैं तब तक तुम्हारे वश में हूँ, जब कोई काम नहीं रहेगा तब मैं गला घोट कर तुम्हारी ह्त्या कर दूंगा| मनुष्य का चित्त वही जिन्न है| इसे निरंतर कहीं ना कहीं लगाए रखना पड़ता है| खाली होते ही यह मनुष्य को वासनाओं के जाल में ऐसा फँसाता है जहाँ से बाहर निकलना अति दुर्धर्ष हो जाता है| चित्त स्वयं को वासनाओं के रूप में व्यक्त करता है| वासनायें ही चित्त की वृत्तियाँ हैं जिन के निरोध को "योगः चित्तवृत्ति निरोधः" कहा गया है| इस की वृत्तियाँ अधोगामी हैं, जिन्हें साधना द्वारा ऊर्ध्वगामी बना देने पर यह मनुष्य को परमात्मा तक ले जाता है|
.
भगवान श्रीकृष्ण जो साकार रूप में परम ब्रह्म हैं, का आदेश है ....
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि| अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि||१८:५८||
अर्थात् मुझमें ही चित्त लगा चुकने पर तूँ मेरी कृपा से इस संसार रूपी दुर्ग के सारे संकटों को पार कर लेगा| पर यदि अहङ्कार के कारण मेरी बात नहीं मागेगा तो तू विनष्ट हो जायेगा|
.
चित्त का अधिष्ठान "सच्चिदानन्द ब्रह्म" ही है| सारी सृष्टि का एकमात्र प्रयोजन यही है कि हम सच्चिदानंद परमात्मा में स्थित हो जाएँ| सांसारिक भोगों के लिये यह संसार नहीं बनाया गया है, यह तो परमेश्वर के ज्ञान के लिये बनाया गया है| परमात्मा की सुन्दर सृष्टि को सब देखते हैं, पर उसे कोई नहीं देखता| भगवान के अनुग्रह से ही हम इस मायावी संसार को पार कर सकते हैं, निज प्रयास से नहीं| दूसरे शब्दों में जब तक हम जीव की चेतना में हैं, माया का अनंत आवरण नहीं हटेगा| परमात्मा को समर्पित होने के बाद ही उनकी ही कृपा से यह अनंत मायाजाल दूर होगा| अनंत विघ्नों को कहाँ तक पार करेंगे? अतः प्रकृति के आधीन न रहकर परमात्मा के आधीन रहें|
.
जहाँ अहंकार होगा वहाँ विनाश ही होगा| भगवान के वचन प्रमाण हैं| उनसे ऊपर कुछ नहीं है| अतः उनकी आज्ञा माननी ही पड़ेगी ....
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११:३३||
अर्थात् .... इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो| ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो||
.
मेरा बहुत अच्छा प्रेम एक बहुत ही उच्च कोटि के शक्ति-साधक महात्मा से था| अब तो वे इस संसार में नहीं हैं| दो बार नवरात्रों में उनके साथ रहा था| उनका आदेश था कि मैं सत्यनिष्ठा से कम से कम एकसौ माला नित्य अपने गुरुप्रदत्त बीजमंत्र की मानसिक रूप से जपूँगा| वे कहते थे कि एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाना चाहिए| हर समय भगवती का जप चलते रहना चाहिए| चित्त को अन्यत्र कहीं भी जाने का अवसर नहीं देना चाहिए|
.
स्वतन्त्रता सिर्फ परमात्मा में है, संसार में नहीं| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ जून २०२०

भारत को देसी गायों के गोवंश से विहीन करने का अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र ---

 जिस तरह भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और कृषि व्यवस्था नष्ट कर दी गयी थी, उसी तरह भारत को देसी गायों के गोवंश से विहीन करने का तो निश्चित रूप से एक अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र चल रहा है| एक देसी गाय को बहुत ऊँची कीमत पर खरीदा जाता है और उससे दुगुणी कीमत पर गोमांस का निर्यात कर दिया जाता है|

.
योरोपीय देशों में भारत की देसी गाय का मांस बहुत अधिक लोकप्रिय है पर वहाँ काटने के लिए गायें ही नहीं बची हैं, इसलिए वे भारत से गोमांस का आयात कर रहे है| विश्व में भारत गोमांस का सबसे बड़ा निर्यातक देश है| जब कोई यह प्रश्न उठाता है कि दूध कहाँ से आएगा तो कहा जाता है कि ऑस्ट्रेलिया से विलायती गायों का चाहे जितना दूध मोल मिल जाएगा| जहाँ गायें काटी जाती है उन कत्लखानों के मालिक बड़े बड़े प्रभावशाली सत्तासीन लोग हैं| उन्हें अपने लाभ से ही मतलब है| पश्चिम की सोच यह कि जो ईसाई नहीं हैं वे नष्ट भी हो जाए तो कुछ फर्क नहीं पड़ता|
.
धरती की प्राकृतिक खाद गोबर है| गोबर की खाद तो मिलती नहीं है अतः खूब रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जिससे केंसर की बीमारी बढ़ रही है| बहुत तेज़ी से गोवंश नष्ट हो रहा है| गोवंश के नष्ट होते ही भारत भी नष्ट हो जाएगा| अब न तो गौचर भूमियाँ बची हैं और न कुओं की खेळ जहाँ गायें पानी पीती थीं|
.
यह सभ्यता विनाश की ओर जा रही है जिसे कोई नहीं रोक सकता| जो मनुष्यता गोमाता की इतनी क्रूरता से हत्या कर रही है वह अगर नष्ट भी हो जाए कोई फर्क नहीं पडता| कम से कम दूसरे प्राणी तो सुख चैन से रहेंगे| नई मनुष्यता निश्चित रूप से अच्छी होगी|
.
ॐ ॐ ॐ ||
२९ जून २०१७

चित्त को कहाँ लगाएँ ---

 चित्त को कहाँ लगाएँ ---

अलादीन ने चिराग को रगडा तो एक जिन्न प्रकट हुआ| जिन्न ने कहा मेरे आक़ा मुझे हुक्म दो मैं क्या काम करूँ| अलादीन जो भी आदेश देता, जिन्न उसे तुरंत पूरा कर देता| जिन्न ने यह भी कहा कि जब तक तुम मुझसे निरंतर काम करवाते रहोगे मैं तब तक तुम्हारे वश में हूँ, जब कोई काम नहीं रहेगा तब मैं गला घोट कर तुम्हारी ह्त्या कर दूंगा|
.
मनुष्य का चित्त वही जिन्न है| इसे निरंतर कहीं ना कहीं लगाए रखना पड़ता है| खाली होते ही यह मनुष्य को वासनाओं के जाल में ऐसा फँसाता है जहाँ से बाहर निकलना अति दुर्धर्ष हो जाता है| इस चित्त की वृत्तियों के निरोध को ही योग साधना कहा गया है| इस की वृत्तियाँ अधोगामी हैं, जिन्हें साधना द्वारा ऊर्ध्वगामी बना देने पर यह मनुष्य को परमात्मा तक ले जाता है|
.
भगवान श्रीकृष्ण जो साकार रूप में परम ब्रह्म हैं, का आदेश है ....
"मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि |
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ||"
अर्थात् मुझमें ही चित्त लगा चुकने पर तूँ मेरी कृपा से इस संसार रूपी दुर्ग के सारे संकटों को पार कर लेगा| पर यदि अहङ्कार के कारण मेरी बात नहीं मागेगा तो तू विनष्ट हो जायेगा|
.
अतः चित्त का अधिष्ठान "सच्चिदानन्द ब्रह्म" ही है| सारी सृष्टि का एकमात्र प्रयोजन यही है कि हम सच्चिदानंद परमात्मा में स्थित हो जाएँ| सांसारिक भोगों के लिये यह संसार नहीं बनाया गया है, यह तो परमेश्वर के ज्ञान के लिये बनाया गया है|
.
परमात्मा की सुन्दर सृष्टि को सब देखते हैं, पर उसे कोई नहीं देखता|
भगवान के अनुग्रह से ही हम इस मायावी संसार को पार कर सकते हैं, निज प्रयास से नहीं| दूसरे शब्दों में जब तक हम जीव की चेतना में हैं, माया का अनंत आवरण नहीं हटेगा| परमात्मा को समर्पित होने के बाद ही उनकी ही कृपा से यह अनंत मायाजाल दूर होगा| अनंत विघ्नों को कहाँ तक पार करेंगे? अतः प्रकृति के आधीन न रहकर परमात्मा के आधीन रहें|
.
जहाँ अहंकार होगा वहाँ विनाश ही होगा| भगवान के वचन प्रमाण हैं| उनसे ऊपर कुछ नहीं है| अतः उनकी आज्ञा माननी ही पड़ेगी ....."निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्" |
स्वतन्त्रता सिर्फ परमात्मा में ही है, संसार में नहीं|
ॐ तत्सत् | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | ॐ नमः शिवाय | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२९ जून २०१६