अपने दिन का आरम्भ भगवान के गहनतम ध्यान से करें| पूरे दिन भगवान को अपनी स्मृति में रखें और रात्री को सोने से पूर्व पुनश्चः गहनतम ध्यान कर के ही सोयें| भगवान ने हमें एक दिन में २४ घंटे दिए हैं, उसका दस प्रतिशत भाग यानि लगभग २.५ घंटे तो एक दिन में भगवान को समर्पित होने ही चाहियें, जिनमें सिर्फ भगवान का ही ध्यान हो| जब तक भगवान हमारे हृदय में धड़क रहे हैं तभी तक बाहर का विश्व है| जिस क्षण भगवान हमारे हृदय में धड़कना बंद कर देंगे उसी क्षण हमारा सब कुछ छिन जाएगा, धन, संपत्ति, घर, परिवार मित्र, सगे-सम्बन्धी यहाँ तक कि यह पृथ्वी भी|
Friday, 13 June 2025
अपने दिन का आरम्भ भगवान के गहनतम ध्यान से करें ---
भगवान ही हमारे शाश्वत मित्र हैं, जन्म से पूर्व भी वे ही थे और मृत्यु के पश्चात भी वे ही रहेंगे| वे ही माता-पिता, भाई-बहिनों और सम्बन्धियों-मित्रों के रूप में आये और वे ही सदा साथ रहेंगे| हमें जो भी प्यार मिला है वह सब भगवान का ही प्यार था जो उन्होंने विभिन्न रूपों में दिया| अतः ऐसे शाश्वत प्रेमी से मित्रता और सम्बन्ध बनाए रखना सर्वोत्तम है|
यह संसार एक पाठशाला है जहाँ यह पाठ हमें निरंतर पढ़ाया जा रहा है| वह पाठ सबको एक न एक दिन तो सीखना ही पड़ेगा| यह हमारी मर्जी है कि हम उसे देरी से सीखें या शीघ्र| पर जो नहीं सीखेंगे, उन्हें प्रकृति ही सीखने को बाध्य कर देगी| अतः भगवान से प्रेम करो, यही इस जीवन का सार है|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
१४ जून २०१९
(प्रश्न) सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा कैसे करें ?
(प्रश्न) सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा कैसे करें ?
(उत्तर) सनातन हिन्दू धर्म का मूलभूत ज्ञान सब को होना चाहिए। जितना संभव हो उतना धर्म का पालन कीजिये। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है।
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हिन्दू कौन है? --- जो भी व्यक्ति (१) आत्मा की शाश्वतता, (२) कर्मफलों का सिद्धान्त, (३) पुनर्जन्म, (४) ईश्वर के अवतारों में आस्था, और (५) लोभ व अहंकार रूपी हिंसा से दूर है; -- वह हिन्दू है, चाहे वह पृथ्वी के किसी भी भाग पर रहता हो।
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एक षड़यंत्र के अंतर्गत हिंदुओं को धर्म शिक्षा से वंचित रखा गया। उन्हें अपने धर्म का ज्ञान नहीं है। धर्म के ज्ञान के लिए -- "महाभारत" और "रामायण" का स्वाध्याय अति अति अति आवश्यक है। बच्चों को बाल-महाभारत, बाल-रामायण, पंचतन्त्र, और अन्य सुलभ धार्मिक बाल साहित्य उपलब्ध करवाना चाहिए। यह माँ-बाप का दायित्व है। घर का वातावरण धार्मिक हो। हर घर में एक छोटा सा देवालय हो जहां दिन में कम से कम एक बार परिवार के सब सदस्य मिलकर भगवान की आराधना करें।
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अंतिम बात कहना चाहूँगा कि गाँव हो या शहर हो, हमें कर्मकांडी ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए। वे सनातन धर्म की अग्रिम सेना के सिपाही हैं। और जो भी धर्मरक्षा के लिए आवश्यक हो वह करें। भगवान आपकी रक्षा करेंगे। धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी आपकी रक्षा करेगा। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ जून २०२४
आध्यात्म की उच्चतम अनुभूति :---
आध्यात्म की उच्चतम अनुभूति :---
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इस विषय पर मुझे लिखना तो नहीं चाहिये, लेकिन फिर भी लिख रहा हूँ, जिसका परिणाम जो भी हो, मुझे स्वीकार्य है। अनेक वर्षों से आध्यात्मिक क्षेत्र में हूँ। अब तक के जीवन की एकमात्र उपलब्धि यही है कि अब कोई कामना शेष नहीं रही है। सब आकांक्षाएँ व अभिलाषाएँ -- परमात्मा में विलीन हो गयी हैं। केवल एक अति अति गहन स्थायी अभीप्सा और तड़प है पूरी तरह समर्पित होने की, जो हर समय बनी रहती है।
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जहां तक आध्यात्मिक साधना की बात है, यह बताने में मुझे कोई झिझक नहीं है कि श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में बताई हुई "पुरुषोत्तम योग" की साधना ही योगमार्ग की "उच्चतम साधना" है, जिससे ऊंची कोई अन्य साधना नहीं है। यह भगवान पुरुषोत्तम की परम कृपा से ही समझ में आ सकती है। यह बुद्धि का नहीं अनुभूतियों का विषय है। एक बार कूटस्थ सूर्यमण्डल में भगवान पुरुषोत्तम की अनुभूति हो जाये फिर साधक को इधर-उधर कहीं भी देखने या भटकने की आवश्यकता नहीं है। दिन-रात सोते-जागते हर समय चेतना उन्हीं में बनी रहे। इससे अधिक लिखने की मुझे और अनुमति नहीं है।
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मुझे किसी अन्य से कोई परामर्श या कोई सत्संग भी नहीं चाहिये, क्योंकि परमात्मा से निरंतर सत्संग में ही आनंद है। उनसे अन्य कोई है भी नहीं । पूर्व जन्म के व इस जन्म के कुछ संस्कार बचे हैं इसीलिए इन शरीर महाराज का साथ है। वे संस्कार नहीं रहेंगे तो ये शरीर महाराज भी साथ छोड़ देंगे। आप सब में मैं स्वयं को नमन करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ जून २०२५
परमात्मा से हमारा परमप्रेम अपनी पूर्णता के लिए होता है। यही हमारा स्वभाविक और वास्तविक स्वधर्म है।
परमात्मा से हमारा परमप्रेम अपनी पूर्णता के लिए होता है। यही हमारा स्वभाविक और वास्तविक स्वधर्म है।
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आध्यात्मिक उपलब्धियाँ परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होती हैं, अन्यथा नहीं। परमात्मा की कृपा हमारे प्रेम पर निर्भर है। परमात्मा से प्रेम करो। भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कि उनका विश्वरूप केवल उनकी कृपा से ही देखा जा सकता है। यह किसी भी तप, ध्यान, वेदाध्ययन आदि द्वारा सम्भव नहीं है।
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अपने स्व+भाव में रहना ही हमारी सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। आत्मस्वरूप में स्थिति समग्र शास्त्रों का सार है ।
आज के युवावर्ग की कुंठा का कारण उनकी आकांक्षाओं का अपनी क्षमता से बहुत अधिक होना है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जून २०२५
Thursday, 12 June 2025
मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण मनुष्य का "लोभ और अहंकार" है।
मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण मनुष्य का "लोभ और अहंकार" है। अन्य सब बुराइयाँ इनके पीछे-पीछे चलती हैं। मनुष्य की काम-वासना भी लोभ और अहंकार के अंतर्गत ही आती है। इनसे बचने का उपाय भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बताया है।
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जिसको प्यास लगती है वही जल पीता है। भगवान भी आध्यात्म रूपी जल उन्हीं मुमुक्षुओं को प्रदान करते हैं, जिनमें अभीप्सा रूपी प्यास है। अन्य को उपदेश देना मूर्खता है। राग-द्वेष आदि का कारण भी हमारा लोभ और अहंकार है।
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एक बार कुछ युवाओं (जो ध्यान आदि का अभ्यास करते थे) को मैंने विश्वास में लेकर पूछा कि ध्यान में उन्हें क्या अनुभूतियाँ होती हैं? उनके जीवन का लक्ष्य क्या है? लगभग सभी का उत्तर था कि उनके ध्यान का उद्देश्य अपनी एकाग्रता को बढ़ाना है ताकि खूब धन एकत्र कर सकें, न कि ईश्वर की प्राप्ति। उन्होने कहा कि गुरुजी तो कहते हैं कि भगवान की ज्योति का भ्रूमध्य में ध्यान करो, लेकिन हमें तो ध्यान में सुंदर युवतियाँ और युवक ही दिखाई देते हैं, जिन के साथ मौज-मस्ती के लिए धन चाहिए। उसी धन यानि रुपये-पैसे की प्राप्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं। भगवान की उपयोगिता यही है कि वह हमें विषय-वासना के साधन, हमारी इच्छाओं की पूर्ति, और धन प्रदान करे, व हमारी रक्षा करे। बाकी कुछ भी भगवान से नहीं चाहिए।
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यह कलियुग का लक्षण है जहाँ वेद, ब्राह्मणों और धर्म का सबसे अधिक विरोध और अहित होता है। फिर भी धर्म का कुछ अंश बचा रहता है। धर्म की रक्षा का वचन भगवान ने दिया है, अतः जब बचे-खुचे धर्म पर प्रहार होता है तो इस सृष्टि का विनाश ही होगा, और भगवान नए सिरे से सृष्टि की रचना करेंगे।
मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण दिये हैं। ये लक्षण जिस दर्शन में हैं, वही धर्म है, बाकी सब अधर्म है।
१३ जून २०२३
मेरा बाकी बचा हुआ सारा जीवन परमात्मा को समर्पित है, जो होगा सो देखा जायेगा ---
विश्व में घटनाक्रम बहुत तेजी से बदल रहा है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की अनेक बहुत अधिक महत्वपूर्ण बातें हैं, जिनका प्रभाव सीधा भारत पर पड़ता है।
लेकिन अब से मैं अपने नये निर्णय के अनुसार सिर्फ आध्यात्म और भक्ति पर ही लिखूंगा, किसी अन्य विषय पर नहीं। यह निर्णय मैंने दो दिनों पूर्व ही लिया था।
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मेरी पूरी आस्था, श्रद्धा और विश्वास, अब अन्य सब ओर से हट कर सिर्फ परमात्मा में ही स्थिर हैं। मुझे सारी प्रेरणा श्रीमद्भगवद्गीता और उपनिषदों से ही मिलती है। क्रियायोग और श्रीविद्या की साधना मेरे माध्यम से होती है। वेदांगों के स्वाध्याय का कभी अवसर नहीं मिला, इसलिए वेदों को समझने की बौद्धिक क्षमता मुझ में नहीं है। वेदों को मैं अंतिम प्रमाण मानता हूँ। मैं पूरी तरह सनातन धर्मावलम्बी आस्तिक हिन्दू ब्राह्मण हूँ।
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मेरी भौतिक आयु ७७+ वर्ष है। किसी से अनावश्यक बात नहीं करता। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी विषय में अब कोई रुचि नहीं है। परमात्मा की परम कृपा से मुझे पता है कि मुझे क्या करना है, किसी के मार्गदर्शन की मुझे आवश्यकता नहीं है। मेरा बाकी बचा हुआ सारा जीवन परमात्मा को समर्पित है। जो होगा सो देखा जायेगा। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ जून २०२४
भगवान ने गीता और रामायण में जब इतने बड़े शाश्वत वचन दिये हैं तब और क्या चाहिए ?
भगवान ने गीता और रामायण में जब इतने बड़े शाश्वत वचन दिये हैं तब और क्या चाहिए ?
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
"ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् --
"मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥"
"यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥"
"हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है, और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता॥"
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वाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम कहते हैं --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम॥६-१८-३३॥"
अर्थात् --
जो एक बार भी मेरी शरण में आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर रक्षा की याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देता हूँ – यह मेरा व्रत है॥
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अब भगवान को शरणागति द्वारा समर्पण के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प मेरे पास नहीं है। उनकी जय हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ जून २०२४
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