Saturday, 21 January 2023

भारत में सत्य-धर्मनिष्ठ क्षत्रिय राजाओं का धर्मपरायण राज्य पुनश्च स्थापित हो ---

 मेरी पूर्ण हृदय से भगवान से प्रार्थना है कि भारत में सत्य-धर्मनिष्ठ क्षत्रिय राजाओं का धर्मपरायण राज्य पुनश्च स्थापित हो ---

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वर्तमान शासन व्यवस्था सनातन हिन्दू धर्म के विरुद्ध है। धर्मनिष्ठ क्षत्रिय राजाओं के राज्य में
(१) गोहत्या नहीं होती थी, गोसंवर्धन होता था। गोचर भूमियों पर किसी का अवैध अधिकार नहीं होता था, गायों के चरने के लिए भूमि छोड़ी जाती थी, जिनमें गायों के लिए चारे और पानी की व्यवस्था होती थी।
(२) हिन्दू मंदिरों की सरकारी लूट नहीं थी। बड़े बड़े मंदिरों के साथ -- पाठशाला, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, गोशाला और यज्ञशाला होती थी। पाठशाला में निःशुल्क धार्मिक शिक्षा दी जाती थी। अन्नक्षेत्र में विद्यार्थियों को अन्नदान दिया जाता था। सदावर्त में विरक्त साधुओं को उनकी आवश्यकता का सामान दिया जाता था। गोशाला में गोसंवर्धन का कार्य होता था। यज्ञशाला में धार्मिक अनुष्ठान होते थे। हिन्दू मंदिरों की सरकारी लूट के साथ उपरोक्त सब बंद होगए।
(३) विद्वान तपस्वी संत-महात्माओं का संरक्षण होता था।
(४) सब को न्याय मिलता था। किसी के साथ अन्याय नहीं होता था।
(५) उच्च शिक्षा के लिए गुरुकुलों की व्यवस्था थी।
(६) वर्णाश्रम धर्म का पालन होता था।
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आलोचना करने वाले तो यों ही आलोचना करते रहेंगे। सबसे खराब कोई शासन प्रणाली, और सबसे अधिक खराब कोई सिद्धांत हो सकता है तो वह मार्क्सवाद है। यह मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ। मार्क्सवाद जब अपने चरम शिखर पर था, उस समय के सोवियत संघ, चीन, उत्तरी कोरिया, और रोमानिया में भ्रमण का व्यक्तिगत अनुभव है मुझे। विश्व में जहाँ जहाँ मार्क्सवादियों का प्रभाव था, वहाँ वहाँ विनाश ही विनाश हुआ है।
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सत्य-सनातन-धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो। भारत अपने द्विगुणित परम वैभव के साथ एक सत्यनिष्ठ धर्मावलम्बी राष्ट्र बने। असत्य का अंधकार दूर हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२३
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वेद पाठ कैसे करें ?

वेद पाठ कैसे करें ?
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प्रत्येक बालक को उपनयन संस्कार के साथ साथ संध्या विधि सिखा देनी चाहिए। फिर अभ्यास कराते कराते निम्न पाँच वैदिक सूक्तों का पाठ भी कंठस्थ करा देना चाहिए --
(१) भद्र सूक्त, (२) पुरुष सूक्त, (३) श्री सूक्त, (४) रुद्र सूक्त और (५) सूर्यसूक्त॥
सायं प्रातः दिन में दो बार संध्या/गायत्रीजप/प्राणायाम; और दिन में एक बार उपरोक्त पांचों सूक्तों का पाठ -- अपने धर्म पर अडिग बना देगा। ये वैदिक सूक्त बहुत छोटे छोटे हैं, लेकिन बहुत अधिक प्रभावशाली हैं।
जो बालक अङ्ग्रेज़ी स्कूलों में पढे हैं, और संस्कृत नहीं पढ़ सकते, उन्हें भी अभ्यास द्वारा ये सिखा देने चाहियें।
किसी भी परिस्थिति में एक दिन में कम से कम दस (की संख्या में) गायत्री मंत्र का जप तो अनिवार्य है।
ॐ तत्सत् !!
१० जनवरी २०२३

आध्यात्म में समस्त अनर्थों का मूल आसुरी भाव है; इस से कैसे बचें? ---

 आध्यात्म में समस्त अनर्थों का मूल आसुरी भाव है; इस से कैसे बचें? ---

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आज भगवान ने एक बहुत अधिक महत्वपूर्ण विचार सामने रखा है, इसलिए यह लेख लिखने को बाध्य हूँ। भगवान कहते हैं कि तुम्हारा यश, प्रसिद्धि, सम्मान पाने और कुछ होने या बनने की सूक्ष्मातिसूक्ष्म आकांक्षा एक आसुरी भाव है जो आध्यात्म में तुम्हारे समस्त अनर्थों का कारण है। इससे तुम्हें मुक्त होना पड़ेगा, तभी आगे की प्रगति तुम कर पाओगे।
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विहंगावलोकन करने पर यह बात मैं सत्य पाता हूँ। भगवान ने करुणावश अपनी परम कृपा कर के आगे का मार्ग भी बतला दिया है, जो व्यक्तिगत है। हम जब यह संकल्प या विचार करते हैं कि मैं यह साधना करता हूँ, यह साधना और करूंगा, ईश्वर को प्राप्त करूँगा आदि आदि, ये सब आसुरी भाव है।
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ईश्वर तो हमें सदा ही प्राप्त है, हम उन्हें क्या प्राप्त करेंगे? गीता के १६वें अध्याय में यह बात बहुत अच्छी तरह से समझाई गई है। साधना करने और साधक होने का भाव भ्रामक और मिथ्या है। एक नया आयाम खुल गया है।
हे प्रभु, अब यह मैं नहीं, तुम ही तुम हो। मैं आपकी शरणागत हूँ। मेरी रक्षा करो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२३

भगवान हमें अपने प्रेम से वंचित नहीं कर सकते ---

 हे परमशिव, आप मुझे कितना भी दर्द और पीड़ा दो, लेकिन कभी भी अपने प्रेम से वंचित नहीं कर सकते। संसार में यदि कष्ट कम हैं तो आप मुझे घोर नर्क में डाल सकते हो, लेकिन आप कभी मेरा साथ नहीं छोड़ सकते। जहाँ भी आपने मुझे रखा है, वहाँ किसी भी तरह के असत्य का अंधकार हो ही नहीं सकता। मैं आपका परमप्रेम, आपकी अनंत विराटता, और प्रकाशों का प्रकाश, ज्योतियों की ज्योति - ज्योतिषाम्ज्योति हूँ; यह नश्वर देह नहीं।

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अनेक जन्मों का पुण्य जब फलीभूत होता है तब भगवान के प्रति भक्ति जागृत होती है। भक्ति और समर्पण से ही भगवान की कृपा प्राप्त होती है। भगवान की कृपा से ही भगवान की प्राप्ति होती है, न कि स्वयं के प्रयासों से। भगवान की कृपा से ही ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय सद्गुरु लाभ होता है जो हमें भगवान की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है और ब्रह्मज्ञान देता है। गुरु वही है जो हमारे चैतन्य से अज्ञान का अंधकार मिटाता है। अन्य कोई गुरु नहीं हो सकता।
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वास्तव में भगवान स्वयं ही हमारे गुरु हैं। हम उनमें गुरुभाव रखेंगे तो वे भी हमारे में शिष्य भाव रखेंगे। हमारा लक्ष्य भगवान की प्राप्ति है, न कि इधर-उधर की फालतू बातें। गुरु महाराज का स्पष्ट सीधा आदेश है कि -- "जो मैं हूँ, तुम वही बनो।" मुझे पता है कि वे भगवान के साथ एक हैं, और मुझे भी भगवान के साथ एक होने का आदेश दे रहे हैं। स्पष्ट रूप से उन्होंने एक प्रकाशमय मार्ग दिखाया है, जहाँ कोई अंधकार नहीं है। किसी भी तरह का कोई संशय उन्होनें मुझमें नहीं छोड़ा है। सब कुछ स्पष्ट है।
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करुणावश अब वे ही सारी उपासना कर रहे हैं। वे एक प्रवाह है जो मेरे माध्यम से प्रवाहित हो रहे हैं। मैं तो एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ। हे प्रभु, मैं आपके साथ एक हूँ। जो आप हैं, मैं भी वही हूँ। आप मुझमें व्यक्त हो रहे हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२३

स्वामी विवेकानंद और खेतड़ी नरेश ---

 कल स्वामी विवेकानंद के ऊपर अनेक लेख लिखे गए थे। लेकिन कुछ बातों का लोग उल्लेख नहीं करते।

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स्वामी विवेकानंद को "स्वामी विवेकानंद" का नाम खेतड़ी के राजा अजीत सिंह ने दिया था। इससे पूर्व उनका नाम "स्वामी विविदिशानन्द था। खेतड़ी के राजा अजीत सिंह, अलसीसर के ठाकुर साहब के पुत्र थे जो खेतड़ी ठिकाने में गोद गए थे। स्वामी विवेकानंद को अमेरिका जाने की प्रेरणा और सारा खर्च राजा अजीत सिंह ने दिया था। स्वामी विवेकानंद को मारवाड़ी पगड़ी भी उन्होंने ही पहनाई थी, जिसे स्वामी विवेकानंद बाहर हर समय पहिनते थे।
खेतड़ी के ही एक परम विद्वान पंडित जी थे जिन्होंने स्वामी विवेकानंद को संस्कृत भाषा और संस्कृत व्याकरण का ज्ञान कराया था। उन्होंने ही स्वामी विवेकानंद को अनेक धर्म-शास्त्रों/ग्रंथों का अध्ययन करवाया था।
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जसरापुर के स्व.पंडित झाबरमल जी शर्मा को भी धन्यवाद देना चाहिए। विवेकानंद जी का सारा उपलब्ध साहित्य खेतड़ी ठिकाने के अभिलेखागारों में छिपा हुआ था, जिसे पंडित झाबरमल जी शर्मा ने विश्व के समक्ष उजागर किया। आज जो कुछ भी हम स्वामी विवेकानंद के बारे में जानते हैं, उसके पीछे पंडित झाबरमल जी शर्मा की तपस्या है।
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उस काल में पास ही के चिड़ावा नगर में अनेक बहुत बड़े विद्वान पंडित हुआ करते थे। उस समय चिड़ावा में पंडित स्नेही राम जी लाटा भी रहते थे, जो वेद-वेदांगों के प्रख्यात विद्वान थे। चिड़ावा के वचनसिद्ध महात्मा पंडित गणेशनारायण जी शर्मा भी उसी काल में थे। पता नहीं इन दोनों की कभी स्वामी विवेकानंद जी से भेंट हुई या नहीं। इस बारे में कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
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मैं रामकृष्ण मिशन के मंदिरों और आश्रमों में कुछ निजी कारणों से नहीं जाता। वहाँ माँ काली के साथ मदर टेरेसा का भी चित्र होता है। पूरा मिशन लगता है अमेरिकन ईसाईयों के प्रभाव में है। मैं इस संस्था का पूरा सम्मान करता हूँ, लेकिन मदर टेरेसा के चित्रों और संस्था के ईसाईकरण के कारण मेरी कोई रुचि इस संस्था में नहीं है। इस संस्था के सन्यासियों को मैंने मांस-मच्छी खाते हुए देखा है जो मेरी आस्था के विरुद्ध है। अतः उनमें मेरी कोई श्रद्धा नहीं है।
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कोई गलत बात मैंने लिखी है तो क्षमा चाहता हूँ। धन्यवाद। जयसियाराम !!
१३ जनवरी २०२३
May be an image of 2 people, turban and text that says 'खेतड़ी नरेश और विवेकानंद पं. झाबरमल्ल शर्मा'
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बंद आँखों के अंधकार के पीछे दिखाई दे रही पूरी प्रकाशमय अनंतता हम स्वयं हैं ---

 बड़ी से बड़ी बात जो भगवान की परम कृपा से मैं लिख सकता हूँ, वह यह है कि -

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खुली आँखों से हमें जो कुछ भी दिखाई दे रहा है; और बंद आँखों के अंधकार के पीछे दिखाई दे रही पूरी प्रकाशमय अनंतता -- हम स्वयं हैं; यह नश्वर शरीर नहीं। जहाँ तक भी हमारी कल्पना जाती है, और जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह सब परमात्मा है, और वही हम स्वयं हैं। हम में और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। हम यह नश्वर देह नहीं, परमात्मा के साथ एक हैं।
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हर साँस के साथ, और जब साँस नहीं चल रही तब भी हम परमात्मा के साथ उन की ज्योतिर्मय अनंतता हैं। पूरा स्पष्ट मार्गदर्शन भगवान ने गीता में और उपनिषदों में दिया है। उनको अपना सर्वश्रेष्ठ परम प्रेम दो। वे अपनी परम कृपा कर के सब कुछ समझा देंगे।
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इससे बड़ी बात और कुछ नहीं हो सकती। सब पर भगवान की परम कृपा हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जनवरी २०२३

Friday, 20 January 2023

भगवान से भूल कर भी कभी कुछ मांगों मत ---

 सभी को धन्यवाद !! मेरी हरेक साँस के साथ, और बिना साँस के भी समष्टि का निरंतर कल्याण हो रहा है। अपनी चेतना को हर समय भ्रूमध्य पर रखो। चेतना को वहीं पर रखते हुए संसार में अपने सारे कर्तव्यों का निर्वहन होने दो। हमारा सारा काम भगवान स्वयं कर रहे हैं, हम तो उनके एक उपकरण यानि निमित्त मात्र हैं। भगवान एक प्रवाह हैं, जिन्हें अपने माध्यम से प्रवाहित होने दो। कर्ताभाव सबसे बड़ी बाधा है। सारी आध्यात्मिक साधना भी भगवान स्वयं ही कर रहे हैं, हम नहीं।

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भगवान से भूल कर भी कभी कुछ मांगों मत। मांगने के स्थान पर अपना सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हें समर्पित कर दो। जो कुछ भी भगवान का है, वह हम स्वयं हैं। इस सृष्टि की अनंतता में जो कुछ भी हमें दिखाई दे रहा है, और जहाँ तक भी हमारी कल्पना जाती है, वह सब हम स्वयं हैं, यह नश्वर शरीर महाराज नहीं। यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। यह शरीर महाराज तो एक मोटर-साइकिल है जो भगवान ने हमें इस लोकयात्रा के लिए दी है। हमारी पहिचान इस मोटर-साइकिल से है, लेकिन हम यह मोटर साइकिल नहीं है। इस मोटर-साइकिल यानि इस शरीर महाराज की देखरेख भी आवश्यक है। इसके बिना इस लोकयात्रा को हम पूर्ण नहीं कर सकेंगे।
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अंततः हमें धर्म और अधर्म से भी ऊपर उठना पड़ेगा। निरंतर परमात्मा में रमण ही धर्म है, निरंतर परमात्मा में रमण ही सदाचार है। इस संसार की नीरवता में प्रणव की एक ध्वनी गूंज रही है, उसे सुनते रहो, उसमें अपना विलय कर दो, उस के साथ एक हो जाओ। विष्णु-सहस्त्रनाम के अनुसार यह विश्व वे ही हैं। जो वे हैं, उनके साथ वही हम है --
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१६ जनवरी २०२३